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राजपाट- लालू की ललकार

कोशिश उनकी भाजपा के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर एक ताकतवर मोर्चा बनाने की है। बिहार में तो खैर नीतीश के खिलाफ वे साझा अभियान चलाएंगे ही। कांग्रेस ने सूबे के पहले मुख्यमंत्री की याद में समारोह किया तो लालू यादव खास मेहमान थे।

Author October 23, 2017 4:37 AM
आरजेडी अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव (PTI Photo)

लालू की ललकार
लालू यादव चैन से नहीं बैठे हैं। अपनी ताकत बढ़ाने और दिखाने की ठान ली है। उसके लिए दिन-रात एक कर रहे हैं। दो महीने पहले भी रैली कर ताकत दिखाई थी। नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार दोनों के खिलाफ खूब गरजे थे। अब फिर महारैली करने की जुगत में हैं। हां, तारीख का एलान बाकी है। करीबी कहते हैं कि ताकत दिखाना लालू की सधी रणनीति रही है। इससे वे अपनी ताकत को और बढ़ाते हैं। नेताओं और कार्यकर्ताओं की सक्रियता बढ़ती है। अब तो भाजपा का विरोध करने वाली कई छोटी पार्टियों को भी अपने साथ जोड़ा है। इससे मुहिम को गति देने में आसानी हो रही है। कोशिश उनकी भाजपा के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर एक ताकतवर मोर्चा बनाने की है। बिहार में तो खैर नीतीश के खिलाफ वे साझा अभियान चलाएंगे ही। कांग्रेस ने सूबे के पहले मुख्यमंत्री की याद में समारोह किया तो लालू यादव खास मेहमान थे। बेबाकी से कांग्रेसी मंच का मोदी और नीतीश पर प्रहार के लिए इस्तेमाल किया। बोले कि नीतीश तो चुक गया। अब मोदी और लालू में ही होगी बिहार में जंग।

सीबीआइ और दूसरी केंद्रीय एजंसियों की भी खिंचाई की। फरमाया कि उनके अबोध बेटे को नोटिस भेज कर तंग करने वाली सीबीआइ अमित शाह के बेटे को नोटिस भेज कर दिखाए। उधर उपेंद्र कुशवाहा से हुई उनकी गुपचुप बैठक के भी बिहार में चर्चे हैं। नीतीश से नाराज होकर पिछड़े नेता कुशवाहा ने जनता दल (एकी) से नाता तोड़ अपनी अलग रालोसपा बनाई थी। भाजपा से गठबंधन भी किया था। पर नीतीश की दोबारा भाजपा से दोस्ती के बाद वे खुद को हाशिए पर पा रहे हैं। नीतीश तो उनकी जगह अपनी पार्टी के किसी दूसरे पिछड़े नेता को केंद्र में मंत्री बनाने के इच्छुक थे। गनीमत है कि मोदी ने मंत्रिमंडल के पिछले विस्तार में उन्हें कोई भाव नहीं दिया। पर भाजपा और नीतीश की दोस्ती के बाद कुशवाहा जान गए हैं कि अब उनकी दाल नहीं गलेगी। सो, बिहार सरकार के खिलाफ एक तरह से अघोषित जनजागरण तो वे पहले ही शुरू कर चुके हैं। मोदी से नाराज तो जीतन राम मांझी भी बताए जा रहे हैं। वे राज्यपाल नहीं बनाए जाने का अपना दर्द कब तक छिपाएंगे। सो, लालू उन पर भी डोरे डाल रहे हैं।
किरकिरी बहुगुणा की
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का उत्तराखंड दौरा सूबे के पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा को हर बार सवालों के घेरे में खड़ा कर जाता है। पिछले साल दिसंबर में भी देहरादून की भाजपाई रैली को संबोधित करने आए थे परेड ग्राउंड में मोदी। तब भी विजय बहुगुणा को ही कर गए थे कठघरे में खड़ा। बेशक उससे पहले ही कांग्रेस छोड़ बहुगुणा भाजपाई चोला पहन चुके थे। तब मोदी ने केदारनाथ में हुई तबाही के बाद कांग्रेस सरकार पर घोटाला करने का आरोप जड़ा था। मिसाल भी दी थी कि स्कूटर की टंकी पांच लीटर की होती है तो क्या तब की उत्तराखंड सरकार ने उसमें 15 लीटर पेट्रोल भरना दिखा दिया था। इस बार तो मोदी केदारनाथ पहुंचे थे। फिर कुरेद दिया घोटाले का सवाल। फरमाया कि गुजरात के मुख्यमंत्री के नाते उन्होंने केदारनाथ घाटी के जीर्णोद्धार का प्रस्ताव भेजा था पर सूबे की तबकी कांग्रेस सरकार ने उसे ठुकरा दिया था। इस तरह हमला मोदी का विजय बहुगुणा पर ही माना जाएगा। कांग्रेस ने पलटवार करने में तभी तो देर भी नहीं लगाई।

हरीश रावत ने विजय बहुगुणा पर तंज कसा कि मोदी बाबा की पार्टी के एक बड़े नेता विजय बहुगुणा हैं। अच्छा होता कि केदारनाथ हादसे के बाद वे घोटाले की बाबत उन्हीं से पूछ लेते। केदारनाथ में मोदी ने वहां के अपनी ही पार्टी के सांसद भुवनचंद खंड़ूड़ी को भी नहीं बुलाया। पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज को तो क्यों बुलाते। हां, प्रोटोकाल की मजबूरी के कारण मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत और राज्यपाल केके पाल को तो हाजिरी बजानी ही थी। पर शिक्षा राज्यमंत्री धन सिंह रावत को अहमियत दिया जाना हर किसी को हैरान कर गया। प्रधानमंत्री ने जिन योजनाओं का शिलान्यास किया, उनके पत्थरों पर भी अंकित था धन सिंह रावत का नाम। खंड़ूड़ी और इलाके के विधायक मनोज रावत का नाम गायब था। मोदी के दौरे से भाजपा की अंदरूनी गुटबाजी भी सतह पर आ गई। संकेत साफ चला गया कि सतपाल महाराज, विजय बहुगुणा और भुवनचंद्र खंड़ूड़ी जैसे अपने दौर के कद्दावर नेताओं की अब कोई कद्र नहीं भाजपा आलाकमान की नजर में।

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