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राजपाट: वक्त का फेर, रिहर्सल बेमानी

सतपाल सत्ती हिमाचल में भाजपा के सूबेदार जरूर हैं पर उनकी कार्यकारिणी में भरमार तो प्रेम कुमार धूमल के समर्थकों की है।

वीरभद्र सिंह, सीबीआई, CBI, Virbhadra Singh, Virbhadra Singh CBI Investigation, CBIराजनीतिक प्रतिशोध: मुझे और मेरे परिजनों को राजनीतिक प्रतिशोध की भावना से निशाना बनाया जा रहा है। सीबीआइ की प्रारंभिक जांच का मामला भी इसी का हिस्सा है, जिसे पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल के कहने पर राजग सरकार चालाकी से अंजाम दे रही है। -वीरभद्र सिंह, मुख्यमंत्री (फोटो: जनसत्ता)

वक्त का फेर

सतपाल सत्ती हिमाचल में भाजपा के सूबेदार जरूर हैं पर उनकी कार्यकारिणी में भरमार तो प्रेम कुमार धूमल के समर्थकों की है। तभी तो हर कार्यक्रम में नारे धूमल जिंदाबाद के ही गूंजते हैं। केंद्रीय मंत्री जगत प्रकाश नड्डा और खुद सत्ती दोनों को ही क्यों न अखरे यह कवायद। हद तो तब हो गई जब पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह सोलन में त्रिदेव सम्मेलन के मेहमान बने। वहां भी नारेबाजी अमित शाह के बजाए धूमल के पक्ष में ही होने लगी। नड्डा ने पार्टी के प्रवक्ता राजीव बिंदल को इशारा भी किया कि नारे बंद कराएं। बेचारे बिंदल ने उनकी हिदायत पर अमल करते हुए कार्यकर्ताओं से ऐसा नहीं करने को कह भी दिया। इस चक्कर में लंबे अरसे तक बिंदल से रूठे भी रहे धूमल। इसी तरह सूबे की कांग्रेस सरकार के चार साल के कामकाज पर भाजपा ने राज्यपाल को आरोप पत्र सौंपने की रणनीति बनाई तो नेतृत्व के लिए धूमल ही आगे आ गए।

कार्यकर्ताओं को बुलाया ही धूमल के निवास पर। जबकि कायदे से ऐसे मौकों पर अगुवाई पार्टी के सूबेदार को करनी चाहिए। बहरहाल पार्टी का हमला जब राजभवन पहुंचा तो वहां भी एक कार्यकर्ता धूमल के प्रति भक्तिभाव दिखाने से हिचका नहीं। धूमल जिंदाबाद का नारा इस मौके पर सतपाल सत्ती को अखर गया। कार्यकर्ता को हड़काया कि कोई व्यक्तिगत नारा न लगाएं। पर कार्यकर्ता भी घाघ था। पलट कर सत्ती को ही धमकी दे डाली कि उनकी शिकायत धूमल से करेगा। अपमानित महसूस किया तो सत्ती भी आपा खो बैठे। तपाक से कह दिया कि जो चाहे करना पर नारा नहीं चलेगा। लगता है कि धूमल के लिए समय माकूल नहीं है। अन्यथा जिसे सूबेदार बनवाया वही इस अंदाज में पैंतरेबाजी न करता।

रिहर्सल बेमानी

हिमाचल के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह कांगड़ा के प्रवास पर हैं। पिछले दिनों विधानसभा का शीतकालीन सत्र भी कांगड़ा के ही धर्मशाला में हुआ था। साफ है कि शिमला में अब ज्यादा वक्त नहीं दे रहे मुख्यमंत्री। जबकि वहां बर्फबारी ने लोगों का जीवन बेहाल कर रखा है। सरकार और प्रशासन नाम की कोई चीज नजर ही नहीं आ रही। छह जनवरी की शाम शुरू हुई थी बर्फबारी। रात हुई तो बिजली गुल हो गई। चार दिन लगे बिजली को चालू करने में। पानी तो पहले से ही गायब था। जो जमा नहीं कर पाए थे, बर्फ को गला कर प्यास बुझाने को मजबूर हुए।

न बिजली अभी तक मुकम्मिल हो पाई है और न पानी की सप्लाई। ऊपर से वाहनों की आवाजाही भी ठप। जो हिम्मत कर वाहनों को सड़कों पर ले आए, वे जाम में फंस गए। आपदा प्रबंधन के नाम पर सरकार ने अभ्यास करने में ही लाखों रुपए फूंके थे। पर संकट आया तो प्रबंधन की सारी रिहर्सल फ्लाप हो गई। महज दो फुट बर्फ ने ही खोल दी बंदोबस्त की पोल। ऊपर से सरकार शिमला की जगह कांगड़ा में आराम फरमाए तो क्यों न सातवें आसमान पर पहुंचता लोगों का पारा। हालांकि शिमला नगर निगम पर कब्जा कांग्रेस का नहीं माकपा का है। कायदे से तो राज्य सरकार के बजाए समस्या नगर निगम की थी। पर माकपा तो अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़ सूबे की सरकार को ही कोसने लगी।

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