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हरीश रावत की अपनी ढपली अपना राग

पार्टी को दरकिनार कर अपनी सियासत चमकाने की कोशिश करेंगे तो इसी तरह होगी जगहंसाई।

Author June 12, 2017 5:04 AM
हरीश रावत। (फाइल फोटो)

छुपा रुस्तम
अपनी सरकार को बेदाग बनाए रखना त्रिवेंद्र सिंह रावत का मुख्य एजंडा दिखता है। उत्तराखंड सरकार ने अभी तक उंगली उठने वाला कोई फैसला नहीं किया है। इससे उनके मंत्रियों में भी बेचैनी है। पर प्रधानमंत्री के वरदहस्त और आरएसएस के समर्थन के डर से कोई मुंह नहीं खोल रहा। हालांकि कांग्रेस से भाजपा में आए हरक सिंह रावत और सतपाल महाराज का असंतोष जरूर सतह पर आने वाला है। मुख्यमंत्री सचिवालय को कौन चला रहा है, यह इन दिनों यक्ष प्रश्न की तरह देहरादून के सियासी गलियारों में हर कोई कौतुहल से पूछ रहा है। हालांकि अब यह रहस्य भी नहीं रह गया है। मुख्यमंत्री के सबसे भरोसेमंद अफसर अपर मुख्य सचिव ओम प्रकाश बताए जा रहे हैं। त्रिवेंद्र सिंह रावत के साथ पहले भी काम कर चुके हैं। छवि बेदाग और दबाव में काम नहीं करने की बना रखी है। बदनाम अफसरों को खुड्डेलाइन लगाने के पीछे ओम प्रकाश की सलाह ही मानी जा रही है। एक तरफ कांग्रेस से आए नेता अपनी हैसियत घटने का दर्द लिए घूम रहे हैं तो दूसरी तरफ दो पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चंद खंड़ूड़ी और रमेश पोखरियाल निशंक को घबराहट हो रही है कि त्रिवेंद्र सिंह रावत जम गए तो उनका सियासी भविष्य बचेगा ही नहीं।
बेसुरा राग
हरीश रावत अपनी ढपली अपना राग अलाप रहे हैं। आलाकमान ने कितना भरोसा किया था उन पर। विजय बहुगुणा को हटा कर उन्हें मुख्यमंत्री बनाया था। उन्होंने सोनिया और राहुल को भरोसा दिया था कि विधानसभा चुनाव जिता कर पार्टी को फिर सत्ता में लाएंगे। इसी भरोसे पर आलाकमान ने उन्हें पहले तो सरकार चलाने में फ्री हैंड दिया, फिर विधानसभा चुनाव के दौरान टिकटों के बंटवारे में भी। खुद एक साथ दो सीटों से चुनाव लड़े। वह भी नई सीटों से। इससे पहले उनकी पत्नी को हरिद्वार से लोकसभा टिकट दिया ही था। पर न पार्टी को एकजुट रख पाए और न लोगों का भरोसा ही जीत पाए। अलबत्ता उनके राज में भ्रष्टाचार शिखर पर पहुंच गया। यहां तक कि पार्टी के सूबेदार किशोर उपाध्याय को भी उन्होंने हाशिए पर धकेलने में कसर नहीं छोड़ी। इसी से आलाकमान ने हार के बाद उन्हें दरकिनार किया। मुख्यमंत्री दो सीटों पर लड़े और कहीं से भी न जीत पाए, इससे उसकी अलोकप्रियता ही साबित होती है। पर हरीश रावत फिर भी दूसरों के लिए मैदान छोड़ने को तैयार नहीं थे। अपने साले माहरा को किशोर उपाध्याय की जगह पार्टी का सूबेदार बनाने की पुरजोर कोशिश की। लेकिन राहुल गांधी ने न तो सूबेदार उनकी राय से बनाया और न विधायक दल का नेता।

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प्रीतम सिंह को पार्टी की कमान थमा दी तो विधायक दल का नेता इंदिरा हृदेश को बनाया। रावत फिर भी नहीं समझ पाए। अपनी पार्टी से सलाह मशविरा किए बिना ही त्रिवेंद्र सिंह रावत की सरकार के खिलाफ धरने पर बैठ गए। मुद्दा बनाया विधानसभा सत्र के स्थान को। खुद मुख्यमंत्री थे तो एलान किया था कि वित्त सत्र की बैठक गैरसैण में होगी। किस्मत ने साथ नहीं दिया और बेचारे विधानसभा का मुंह भी नहीं देख पाए तो अपना वादा पूरा कहां से कर पाते। उधर त्रिवेंद्र सिंह रावत ने बैठक देहरादून में आयोजित कर दी। कांग्रेस के सारे विधायकों ने भाग भी लिया। फिर किस मुंह से हरीश रावत विरोध करने चले थे। उनके धरने पर न पार्टी के सूबेदार पहुंचे और न कोई विधायक। बेचारे अकेले रह गए। भद्द तो तब और पिटवा ली जब खुद भी विधानसभा सत्र की कार्यवाही देखने के लिए विधानभवन की दर्शक दीर्घा में जा बैठे। बजट पर प्रतिक्रिया भी दे डाली। ऊपर से अपने घर शनिवार को चाट पार्टी का आयोजन कर अपनी ताकत को आंकने का दाव भी आजमाया। इसमें न प्रीतम सिंह पहुंचे और न इंदिरा हृदेश। बेचारे कुंठा में इंदिरा हृदेश पर ही लगे कटाक्ष करने। पार्टी को दरकिनार कर अपनी सियासत चमकाने की कोशिश करेंगे तो इसी तरह होगी जगहंसाई। वैसे भी समर्थकों, यार-दोस्तों और सिपहसालारों के बीच उनकी कोई विश्वसनीयता तो बची नहीं है। अकेला चना भी भाड़ फोड़ सकता है भला।

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