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राजपाट: कब होगा आत्ममंथन

सोनिया गांधी और राहुल गांधी के साझा नेतृत्व में देश की सबसे बड़ी पार्टी कोई कमाल दिखाना तो दूर अपने वजूद को भी संभाल नहीं पा रही है।

Author March 13, 2017 4:38 AM
कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी को वरिष्ठ नेता की सलाह। (File Photo)

कब होगा आत्ममंथन

कांग्रेस मुक्त भारत के अमितशाह के मिशन को भले एक बारगी अतिवादी और अव्यवहारिक नजरिया मान सकते हैं। पर कांग्रेस के लिए आत्ममंथन का दौर नरेंद्र मोदी के 2014 में उभार के बाद ही जरूरी हो गया था। सोनिया गांधी और राहुल गांधी के साझा नेतृत्व में देश की सबसे बड़ी पार्टी कोई कमाल दिखाना तो दूर अपने वजूद को भी संभाल नहीं पा रही है। उत्तर प्रदेश में उसे जितनी सीटें सपा के साथ गठबंधन के बाद मिली हैं, कयास लग रहे हैं कि उससे ज्यादा सीटें तो यह पार्टी अकेले अपने दम पर चुनाव लड़ कर भी ले आती। बहरहाल यूपी को छोड़ भी दें तो उत्तराखंड में और भी बुरी गत हुई है पार्टी की। मुख्यमंत्री हरीश रावत ने अपनी पसंद की दो सीटों से एक साथ चुनाव लड़ा। दोनों जगह ही उनका हारना मतदाताओं के प्रतिक्रियावादी रूझान को दर्शाता है। पिछली दफा मुख्यमंत्री रहते भाजपा के भुवनचंद खंड़ूड़ी का भी यही हश्र हुआ था। लेकिन हरीश रावत की तरह ही भाजपा के विधायक दल के नेता और सूबेदार रहे अजय भट्ट एक निर्दलीय से हारे तो यह भी मतदाताओं के अनूठे मिजाज की ही बानगी है। उत्तराखंड में इस बार कांग्रेस सरकार कहें या फिर हरीश रावत सरकार के खिलाफ माहौल दिखा है। लेकिन भाजपा के नारायण सिंह राणा जैसे कद्दावर नेता इस आंधी में भी नहीं उड़ पाए। पंजाब की कामयाबी को लेकर भले कांग्रेस संतोष कर सकती है पर गोवा और मणिपुर के नतीजे भी उसके लिए सबक हैं। बहुमत के करीब पहुंच कर भी इन दोनों राज्यों में पार्टी सरकार नहीं बना पा रही। उलटे महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी ने पेशकश की है कि मनोहर पर्रिकर मुख्यमंत्री बने तो पार्टी भाजपा से हाथ मिला सकती है। गोवा के विजयी भाजपा विधायकों ने आलाकमान से फरियाद भी कर डाली है कि रक्षा मंत्री पर्रिकर को वापस गोवा भेजें। भाजपा ने पर्रिकर की जगह लक्ष्मीकांत परसेकर को मुख्यमंत्री बनाया था। वे पार्टी को सत्ता में वापस तो क्या लाते, खुद ही चुनाव हार गए। गोवा और मणिपुर में अब जोड़-तोड़ से ही बनेगी कोई भी सरकार। लेकिन हैरानी की बात यही है कि कांग्रेस के पास अब ऐसा कौशल बचा ही नहीं है कि वह क्षेत्रीय दलों का भरोसा हासिल कर सके। पार्टी को इस बाबत भी मंथन करना चाहिए कि वह कब तक दूसरों की पिछलग्गू बनी रहेगी। दूसरे उसके पिछलग्गू बनें, ऐसा क्यों नहीं हो पा रहा।

डूब गई लुटिया

अजित सिंह क्या करेंगे? चौधरी चरण सिंह के इकलौते पुत्र ने यों अपनी विरासत अपने पुत्र जयंत चौधरी को सौंपने का पहले ही एलान कर दिया था। पर विधानसभा चुनाव के नतीजों ने पिता-पुत्र के वजूद पर संकट और बढ़ा दिया है। लोकसभा चुनाव में दोनों ही हार गए थे। इस बार उम्मीदवार तो ढाई सौ से ज्यादा उतारे पर पिछले नौ के आंकड़े से भी काफी पीछे रह गए। जाटों को भी पूरी तरह लामबंद नहीं कर पाए। 2013 के सांप्रदायिक दंगों के घाव अभी तक पूरी तरह भुला जो नहीं पाए हैं जाट। नतीजों ने साफ कर दिया है कि अब एकला चलो उनके लिए घाटे का सौदा होगा। किसी न किसी के साथ या तो गठबंधन करना पड़ेगा या फिर किसी राष्ट्रीय पार्टी में शामिल होने से ही दाल गल पाएगी। वैसे अनुभव बताता है कि उनके लिए सबसे फायदेमंद हिंदुत्व के उभार के बाद भाजपा ही साबित हुई। 2002 में मिलकर विधानसभा चुनाव लड़ा था तो भाजपा के बुरे दौर के बावजूद पंद्रह सीटें पा गए थे। 2009 के लोकसभा चुनाव में भी भाजपा के साथ गठबंधन ने लाटरी खोल दी थी। भाजपा ने उन्हें महज सात सीटें दी थी। भाजपा को जहां 73 में से महज दस सीटों पर सफलता मिल पाई थी वहीं अजित सात में से पांच सीटें जीत गए थे। लेकिन उन्होंने इस रिश्ते को निभाया नहीं। मंत्री पद के मोह में भाजपा से नाता तोड़ उसी कांग्रेस के साथ हाथ मिला लिया था। जिसने उनके पिता चौधरी चरण सिंह को धोखा दिया था। पहले प्रधानमंत्री बनवाया था और फिर लोकसभा का मुंह देख पाते उससे पहले ही सरकार गिरा दी थी।

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