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घाटे का सौदा

मेघालय, अरुणाचल, मणिपुर और मिजोरम जैसे राज्यों में लोग गो मांस खाते हैं। लिहाजा इलाके के भाजपा नेताओं ने ही अपने आलाकमान से दो टूक कह दिया है कि यह फैसला पार्टी के लिए आत्मघाती हो सकता है।
Author June 19, 2017 05:48 am
केंद्र सरकार के फैसले को लेकर विरोध (Representative Image)

घाटे का सौदा

बूचड़खानों के लिए मवेशियों की बिक्री पर पाबंदी का मोदी सरकार का फैसला उन्हीं की पार्टी की राह का रोड़ा साबित हो रहा है। खासकर पूर्वोत्तर के राज्यों में। यहां पांव पसारने का सपना है भाजपा का। मेघालय, अरुणाचल, मणिपुर और मिजोरम जैसे राज्यों में लोग गो मांस खाते हैं। लिहाजा इलाके के भाजपा नेताओं ने ही अपने आलाकमान से दो टूक कह दिया है कि यह फैसला पार्टी के लिए आत्मघाती हो सकता है। पार्टी की छवि लोगों की नजरों में खराब होगी इस बंदिश से। मेघालय में तो भाजपा के दो नेताओं ने विरोध में पार्टी से इस्तीफा तक दे दिया। यहां कुछ राज्यों में अगले साल विधानसभा चुनाव होंगे। असम, अरुणाचल और मिजोरम के बाद बाकी बचे राज्यों में भी सत्ता पर काबिज होने का सपना देख रहे हैं अमित शाह। इसीलिए कुछ भाजपा नेताओं ने दावा कर दिया है कि सरकार बनने के बाद गो मांस पर लगी पाबंदी हटा ली जाएगी। दरअसल मेघालय ठहरा ईसाई बहुल। यहां गो मांस की खपत ज्यादा है। मेघालय के साथ ही मिजोरम, त्रिपुरा व नगालैंड में भी अगले साल चुनाव होंगे।

एक तरफ पूर्वोत्तर में असंतोष तो दूसरी तरफ अदालती हस्तक्षेप का खतरा। शायद हालात को भांप कर ही कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद को गुरुवार को दिल्ली में कहना पड़ा कि सरकार अपने फैसले पर पुनर्विचार कर सकती है। अमित शाह को पिछले हफ्ते विरोध की आशंका के मद्देनजर अरुणाचल का अपना दौरा टालना पड़ गया। बेशक कहा यही गया कि वे राष्ट्रपति चुनाव की तैयारियों में व्यस्त हैं। पर चुनाव की तारीखों का ख्याल तो दौरा तय करते वक्त भी रहा होगा दिमाग में। गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने जरूर एक बैठक के सिलसिले में इलाके का दौरा किया था। तभी मिजोरम की राजधानी में लोगों ने बीफ उत्सव मना दिया। केंद्र सरकार के फैसले के प्रति विरोध का इजहार करना था मकसद। इससे भाजपा के इलाकाई नेता असमंजस में हैं। पाबंदी की बाबत सफाई देते बन नहीं रहा। बेचारे फूंक-फूंक कर उठा रहे हैं अपने कदम।

चौतरफा घेरेबंदी

बिहार से अलग होकर ही तो बना है झारखंड। इस नाते तो पड़ोसी के साथ-साथ दोनों छोटे-बड़े भाई जैसे भी कहलाएंगे। पर दोनों के मुख्यमंत्रियों के रिश्तों में तो कतई गरमाहट नहीं। रघुबर दास शुरू से ही नीतीश कुमार का विरोध करते रहे हैं। बिहार का दूसरा पड़ोसी है उत्तर प्रदेश। पहले यहां अखिलेश यादव मुख्यमंत्री थे। दोस्ताना रिश्ते तो उनसे भी नहीं थे, पर कटुता भी तो नहीं थी। जब से योगी आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश की सत्ता संभाली है, नीतीश को दोनों पड़ोसियों के साथ वाकयुद्ध करना पड़ रहा है। वैसे भी योगी ठहरे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चहेते। सो नीतीश के साथ वे दोस्ती का हाथ बढ़ा ही नहीं सकते। अभी तक तो नीतीश को मोदी और रघुबर दास का ही जवाब देना पड़ता था। अब बिहार को योगी से भी सावधान कर रहे हैं।

मुख्यमंत्री बनने के बाद योगी पिछले हफ्ते बिहार आए। मकसद था, केंद्र की मोदी सरकार की तीन साल की उपलब्धियों का बखान। नीतीश इसे कैसे बर्दाश्त करते। लिहाजा योगी से एक दिन पहले ही हो आए दरभंगा। लोगों को योगी से सावधान कर आए। जहां तक रघुबर दास का सवाल है। वे बिहार की समस्याओं का ठीकरा नीतीश के सिर फोड़ते रहते हैं। नीतीश ने भी कच्ची गोलियां नहीं खेली। वे भी झारखंड जाकर रघुबर दास को चुनौती देते रहते हैं। पर योगी उनके लिए नई आफत हैं। एक तो भाजपा में योगी का कद रघुबर दास से ऊंचा ठहरा। ऊपर से यूपी का आकार बिहार से कहीं बड़ा। लिहाजा उन्हें तो हर कोई गंभीरता से लेगा ही। नीतीश को डर है कि योगी बिहारियों को भ्रमित कर सकते हैं। इसीलिए वे भी अब लालू यादव की तर्ज पर भाजपा नेताओं के प्रति आक्रामक रुख अपना रहे हैं। उन्हें समाज को तोड़ने वाला बता कर लोगों को चौकस कर रहे हैं।

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