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राजपाट: उलटबासी, चूक गए चौहान

कांग्रेस को खूब फंसा दिया है दीदी ने। दीदी यानी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी।
Author November 28, 2016 05:48 am
CM ममता बनर्जी का फाइल फोटो

उलटबासी
कांग्रेस को खूब फंसा दिया है दीदी ने। दीदी यानी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी। नोटबंदी के खिलाफ ममता की मुहिम सूबे में कांग्रेस के लिए उलझन बन गई है। हालत ऐसी है कि एक तरफ कुआं है तो दूसरी तरफ खाई है। दिल्ली में पार्टी आलाकमान ममता और उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस के साथ मिलकर आंदोलन करने को बाध्य है। पर पश्चिम बंगाल में नजारा भिन्न है। कांग्रेस के सूबेदार अधीर चौधरी अपनी रणनीति अपने हिसाब से बना रहे हैं। ममता की पार्टी के साथ मिलकर कोई भी साझा आंदोलन चलाने को कतई तैयार नहीं। तृणमूल कांग्रेस पर चौधरी भी तो सूबे में वैसे ही आरोप लगा रहे हैं जैसे आगरा की रैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लगाए थे। चौधरी पार्टी के सांसद भी हैं। नोटबंदी के फैसले के तीन दिन बाद ही आरोप जड़ दिया कि तृणमूल कांग्रेस के नेता शारदा चिटफंड और नारद स्टिंग में फंसे हैं। वे तो घोटालों में सिर से पांव तक डूबे हैं। ऐसे में कांग्रेस उनके साथ मिलकर साझा आंदोलन चलाने के बारे में सोच भी कैसे सकती है। तृणमूल कांग्रेस को तो कोई नैतिक अधिकार ही नहीं है विरोध करने का। लेकिन चौधरी के तीखे तेवरों के बावजूद पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने दिल्ली में मोदी के खिलाफ ममता के साथ कदमताल करने में कोई हिचक नहीं दिखाई। जिस कारण पश्चिम बंगाल में पार्टी की स्थिति हास्यास्पद हो गई है। बेचारे अधीर चौधरी की भी बड़ी विचित्र हालत हो गई है। ममता का साथ देने के लिए न तो अपने आलाकमान पर भड़ास निकाल सकते हैं और न तृणमूल कांग्रेस के साथ साझा आंदोलन का यूटर्न ले सकते हैं। मन ही मन घुट रहे हैं बेचारे। सोच रहे होंगे कि नोटबंदी पर प्रतिक्रिया जताने से पहले आलाकमान का मूड भांप लेते तो ऐसी गत कतई न होती।
चूक गए चौहान
पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की नोटबंदी के फैसले के चलते देश की आर्थिक विकास दर में गिरावट की आशंका का जितना चाहे प्रतिवाद करें, पर उसे नकारना हकीकत से आंख मूंदने जैसा है। मनमोहन सिंह की सरकार में घोटाले चाहे जितने हुए हों, वे चुप्पी बेशक साधे रहे हों और उनकी कोई सियासी जमीन न हो तो भी देश में उनकी अपनी साख है। वे न केवल नामचीन अर्थशास्त्री हैं बल्कि रिजर्व बैंक के गवर्नर, वित्त सचिव और वित्त मंत्री जैसे ओहदे भी उन्होंने संभाले थे। प्रधानमंत्री भी पूरे एक दशक रहे। उन्होंने आम आदमी को परेशानी होने और अर्थव्यवस्था को कोई खास फायदा नहीं होने का अनुमान भी जताया। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पास एक ही ब्रह्मास्त्र है कि विरोधी को देशद्रोही और कालाधन रखने वाला बताकर मुंह बंद कराएं। मुलायम सिंह यादव और मायावती के मामले में तो शुरू में लोगों ने इस आरोप को थोड़ा बहुत वाजिब माना भी पर ममता बनर्जी और मनमोहन सिंह दोनों की अपनी छवि मोदी से कम उजली नहीं। सो हर कोई सोचने को मजबूर हुआ। जमीनी हकीकत तो यही है कि लोगों को खासी दिक्कतों से जूझना पड़ रहा है। कालाधन बामुश्किल दो-तीन फीसद लोगों के पास हो सकता है। फिर बाकी 98 फीसद लोगों को बैंकों के बाहर खड़ा करने का क्या औचित्य है। आम आदमी की जेब में तो इस फैसले से सीधे कुछ आ नहीं रहा। तकलीफ अलबत्ता बेहिसाब बढ़ गई। गन्ना किसान अपना गन्ना कोल्हू को कम दाम पर भी महज इस वजह से बेचते हैं कि एक तो नकदी भुगतान मिल जाता था दूसरे नई फसल की बुआई के लिए खेत खाली करना मजबूरी होता है। चीनी मिलें दाम बेशक ज्यादा देती हैं पर भुगतान में तो कई-कई साल भी लगा देती हैं। अपनी रोजमर्रा की जरूरतों को ऐसे में पूरा कैसे करे किसान। अपना गन्ना उधार बेचना पड़ रहा है। बेरोजगारी भी बढ़ेगी क्योंकि दिहाड़ी मजदूरों को लगातार काम मिलना बंद हो गया है। पांच सौ रुपए का नया नोट गांव देहात के बैंकों तक नहीं पहुंचने से मुश्किल बढ़ी है। दो हजार रुपए का नोट कोई खुलाने को तैयार नहीं। पुराने पांच सौ के नोट के बदले गरीब को चार सौ रुपए का सामान लेने की शर्त माननी पड़ रही है। भले बैंक में जमा हो सकते हैं उसके पांच सौ और एक हजार रूपए के नोट। पर काम तो नए नोट हाथ में आने से ही चलेगा। साफ है कि गरीबोें को नोटबंदी से घाटा ही हुआ है, फायदा नहीं। प्रधानमंत्री की खुशफहमी अगले साल की शुरूआत में होने वाले विधानसभा चुनाव के नतीजों से हवा हो सकती है।

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