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राजपाट: खट्टे अंगूर

साध्वी ऋतंभरा के गुरु स्वामी परमानंद सरस्वती को शामिल करने पर भी किसी को अचरज नहीं हुआ।

पंद्रह सदस्यों वाला ट्रस्ट अयोध्या में श्रीराम मंदिर का निर्माण करेगा।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार को संसद में श्रीरामजन्म भूमि तीर्थ क्षेत्र के ट्रस्ट के गठन का एलान किया। पंद्रह सदस्यों वाला यही ट्रस्ट अयोध्या में श्रीराम मंदिर का निर्माण करेगा। सुप्रीम कोर्ट ने यही आदेश दिया था। यानी सरकार ने सिर्फ अदालती आदेश पर अमल किया। अदालत का आदेश पिछले साल नौ नवंबर को आया था। तीन महीने के भीतर ट्रस्ट बनाना जरूरी था। यानी अब सरकार के पास ज्यादा वक्त बचा नहीं था। तो भी विपक्ष ने तो इस फैसले के समय को दिल्ली चुनाव के नतीजे प्रभावित करने की सरकार की कोशिश करार दिया।

जो भी हो, के पाराशरण को अध्यक्ष बनाए जाने पर बहुतों को हैरानी हुई। सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ और साखदार वकील पाराशरण एक दौर में कांग्रेस के करीबी माने जाते थे। पर सुप्रीम कोर्ट में अयोध्या विवाद की पैरवी मंदिर के पक्ष में उन्होंने ही प्रभावी तरीके से की। वे खुद भी धार्मिक आस्था वाले हैं। इसमें संदेह नहीं कि पिछले कुछ दिनों में उनकी निकटता आरएसएस के साथ बढ़ी। उन्हीं के निवास को सरकार ने नवगठित ट्रस्ट का पंजीकृत दफ्तर घोषित किया है। लेकिन ट्रस्ट के सदस्यों के चयन ने कई लोगों के मंसूबों पर पानी फेर दिया। इनमें साधु-संत ही नहीं विश्व हिंदू परिषद और संघ परिवार के निष्ठावान लोग भी हैं।

ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती को सरकार की स्वाभाविक पसंद माना गया है। जिनकी दूसरे शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के साथ लंबी कानूनी जंग हो चुकी है। पर स्वरूपानंद पर कांग्रेस समर्थक होने का ठप्पा है जबकि वासुदेवानंद सरस्वती संघी अतीत वाले ठहरे। विहिप के केंद्रीय मार्गदर्शक मंडल की बैठकों में वही अध्यक्षता करते रहे। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के महासचिव महंत हरिगिरि से तो उनकी पटती है। पर निरंजनी अखाड़े के महंत नरेंद्र गिरि से कभी नहीं बनी। नरेंद्र गिरि ने तो बाकायदा सरकार से मांग की थी कि अखाड़ा परिषद के प्रतिनिधि के नाते उन्हें ट्रस्ट में रखा जाए।

साध्वी ऋतंभरा के गुरु स्वामी परमानंद सरस्वती को शामिल करने पर भी किसी को अचरज नहीं हुआ। जबकि महामंडलेश्वर स्वामी गोविंद देव को स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि से निकटता के कारण वरीयता मिली। तीनों ही साधुओं का हरिद्वार से नजदीकी नाता है। सो, जो रह गए वे मायूस होंगे ही। मसलन, स्वामी रामदेव, स्वामी अवधेशानंद गिरि और महंत नरेंद्र गिरि को उम्मीद थी कि राष्ट्रीय महत्व के इस ट्रस्ट में उन्हें जगह मिलेगी। शांतिकुंज के प्रमुख प्रणव पंड्या ने पिछले दिनों राज्यसभा में नामित करने के भाजपा सरकार के प्रस्ताव को नकारा था। पर श्रीरामजन्म भूमि तीर्थ क्षेत्र के ट्रस्ट में जगह पाने की हसरत उनकी भी रही होगी। कॉलेज छात्रा के यौन शोषण के आरोप में जेल जाकर आरोपी नहीं हुए होते तो स्वामी चिन्मयानंद बेशक इस ट्रस्ट में जगह पा सकते थे। जो रह गए वे अब करीबियों को झांसा दे रहे हैं कि पेशकश तो मिली थी पर उन्होंने ठुकरा दी।

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