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राजपाट : नीयत पर शक

बड़ा खतरा उठाया है नीकु ने शराबबंदी लागू करके। बिहार के मुख्यमंत्री को यों विरोधी भी दूरदर्शी मानते हैं।

Author नई दिल्ली | August 15, 2016 4:02 AM
चित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है।

बड़ा खतरा उठाया है नीकु ने शराबबंदी लागू करके। बिहार के मुख्यमंत्री को यों विरोधी भी दूरदर्शी मानते हैं। पर शराबबंदी के मामले में तो नतीजे अपेक्षित दिख नहीं रहे। सोचा था कि उनका बनाया कानून वाहवाही दिलाएगा पर उससे तो भद्द ही पिट रही है। घर का अगर कोई भी सदस्य शराब पीता पकड़ा गया तो सजा घर के सारे लोगों को मिलेगी। पुलिस घर को सील भी कर सकती है। और तो और शराबी अगर किरायेदार है तो सजा उसके मकान मालिक तक को हो जाएगी। यहां तक पूरे गांव और मोहल्ले के सभी लोगों को भरना पड़ सकता है हर्जाना। शराब की तो बात छोड़िए, शराब की खाली बोतल भी किसी के पास पकड़ी गई तो खैर नहीं। सीधे जेल की हवा खानी पड़ेगी। आमतौर पर आपराधिक मामलों में पुलिस को साबित करना पड़ता है अदालत में आरोपी पर अपराध। लेकिन नीकु के शराबबंदी के कठोर कानून ने तो पुलिस के बजाए आरोपी पर ही डाल दिया है खुद को अदालत में बेकसूर साबित करने का जिम्मा। दरअसल नीकु ने जब शराबबंदी लागू की थी तो असर ज्यादा नहीं दिखा था। शराब चोरी-छिपे बिक ही रही थी। इसलिए करीबियों ने नीकु को उकसा दिया। वे खुद भी अड़ियल ठहरे। हठी स्वभाव है तो हार क्यों मानें। लिहाजा कानून में बदलाव कर उसे और कठोर बना दिया। यह बात अलग है कि इस कड़े कानून से वे भी गुस्से में हैं जो कल तक शराबबंदी के नीकु के फैसले का समर्थन कर रहे थे। घर की महिलाएं तक नहीं बख्शी जाएंगी। ऐसा तो अंग्रेजों के जमाने में भी कभी नहीं हुआ। शराबबंदी के खिलाफ अदालत में भी मामला चल रहा है। अब तो लोगों को आशंका हो रही है कि कहीं नीकु ने जानबूझ कर तो नहीं बनाया अव्यावहारिक कानून। अदालत में टिक ही न पाए। फिर हाथ झाड़ लें कि वे तो सख्ती कर रहे थे, अदालत बीच में आ गई। उसकी तो अवमानना कर नहीं सकते। तो क्या नीकु ने पैंतरेबाजी दिखाई है कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे।


बेबाकी बेमिसाल
रघुवंश प्रसाद सिंह भी राजद के अनोखे नेता हैं। एक तो बोलने का स्वभाव पाया है ऊपर से कमाल की साफगोई। सो अपने मुखिया लालू यादव की मनाही के बावजूद कुछ न कुछ ऐसा बोल ही देते हैं कि राजद के साथ-साथ नीतीश सरकार भी सवालों के घेरे में आ जाती है। केंद्र में मंत्री तो रहे ही हैं, राजद के उपाध्यक्ष अलग ठहरे। शराबबंदी के बारे में बनाया गया बिहार का कठोर कानून नीतीश सरकार के गले की हड्डी बन गया है। रघुवंश बाबू ने बयान दे दिया कि जद (एकी) और राजद ने व्हिप जारी कर विधायकों को मजबूर किया था समर्थन के लिए। अन्यथा राजद के विधायक तो छोड़िए नीतीश की पार्टी के विधायक भी न करते समर्थन। इस बयान ने विरोधियों को मुद्दा थमा दिया। वे तो नीतीश के खिलाफ पहले से ही आक्रामक रहे हैं। रघुवंश के बयान ने उन्हें और मुखर बना दिया। इससे पहले भी रघुवंश बाबू ने तीखी बात कह कर नीतीश को चिढ़ाया था। उन्होंने फरमाया था कि शराबबंदी के लिए तो मरे जा रहे हैं नीतीश पर अच्छा होता कि कानून व्यवस्था पर भी गौर करते। नीतीश को अखरा तो शिकायत सीधे न सही परोक्ष रूप से तो लालू तक पहुंचाई ही थी। नतीजतन लालू की सलाह पर कुछ दिन चुप्पी साधे रहे रघुवंश बाबू। पर पुरानी आदत इतनी आसानी से तो छूटती नहीं। फिर बोल गए। पर बोला तो सच ही बेशक कड़वा।


दूर की कौड़ी
त्रिपुरा पर टिकी है अब दीदी की निगाह। दीदी यानी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी। जैसे वामपंथियों को निपटाने की ठान ली हो। अपने सूबे में दूसरी बार बनी हैं मुख्यमंत्री। त्रिपुरा यों पूर्वोत्तर का राज्य है पर पश्चिम बंगाल और केरल की तरह वामपंथियों का गढ़ रहा है। राजधानी अगरतला में तृणमूल कांग्रेस की रैली से ममता के इरादों का संकेत मिल गया। दो साल बाद होंगे सूबे में विधानसभा चुनाव। पर वाममोर्चे को सत्ता से बाहर करने की शपथ अभी से ले ली है। रैली में भीड़ भी खूब जुटी। तभी तो चेहरे पर रौनक दिखी ममता के। 23 साल से सत्ता पर काबिज वाममोर्चा सरकार के सिर फोड़ दिया पिछड़ेपन का ठीकरा। फिर फरमाया कि सत्ता में आते ही पश्चिम बंगाल की तरह बदल देंगी त्रिपुरा की तस्वीर। अपने सूबे की विकास योजनाओं का ढिंढोरा भी देर तक पीटती रहीं। आत्मविश्वास बेशक असली न सही पर था गजब का। बोलीं कि अभी प्रमुख विपक्षी पार्टी है तृणमूल कांग्रेस। पर अगले चुनाव बाद सत्तारूढ़ पार्टी बन जाएगी। त्रिपुरा को लेकर ममता के उत्साही होने की दीगर वजह भी है। कांग्रेस के आधा दर्जन विधायक पाला बदल कर पिछले दिनों उनकी पार्टी में आए थे। तभी तो मिला प्रमुख विपक्षी दल का दर्जा। त्रिपुरा है भले पूर्वोत्तर में पर बोली और संस्कृति पश्चिम बंगाल से ही मिलती है। ममता की लोकप्रियता बढ़े तो माकपाई क्यों चिंतित नहीं होंगे। उनकी जनसभा से एक दिन पहले पश्चिम बंगाल के माकपा सचिव सूर्यकांत मिश्र भी पहुंच गए थे अगरतला। पहले पत्रकारों से रूबरू हुए और फिर जनसभा में ममता की जमकर आलोचना की। यहां तक कि पश्चिम बंगाल में उन पर सरकारी आतंक फैलाने तक का आरोप जड़ दिया। मिशन त्रिपुरा में कितनी सफल हो पाएंगी ममता, यह तो चुनाव के नतीजे ही बताएंगे।


गो प्रेम या छलावा
वसुंधरा सरकार का चैन आजकल गाय ने छीन लिया है। जयपुर की हिंगोनिया गोशाला में हुई गायों की मौत ने राजस्थान में भाजपा को मुसीबत में डाल दिया है। नगर निगम करता है इस गऊशाला का संचालन। गायों की मौत की खबर फैली तो बोलती बंद हो गई भाजपा नेताओं की। नगर निगम पर भी तो भाजपा ही काबिज है। लिहाजा कोई सफाई नहीं सूझ रही सरकार को। कांग्रेस को अलबत्ता अच्छा मुद्दा मिल गया। भाजपा को उसी के हथियार से घायल कर दिया पार्टी ने। जयपुर के मंदिरों में महाआरती का आयोजन कर हिंदू वोट बैंक में सेंध की तैयारी अलग कर दिखाई। आखिर मुख्यमंत्री को ही करना पड़ा हस्तक्षेप। स्वायत्त शासन मंत्री राजपाल सिंह शेखावत और पशुपालन मंत्री प्रभुलाल सैनी को तो नसीहत दी ही, अफसरों को भी जमकर फटकारा। चार दिन के भीतर हालत सुधारने की हिदायत दी। फिर तो मंत्री और अफसर दोनों ही जुट गए गोवंश की सेवा में। गोशाला की हालत फिर भी नहीं सुधर पाई। रोजाना दर्जनों गायें तोड़ रही हैं दम। वैसे बारिश के मौसम में ऐसी मौतों को रोकना आसान नहीं होगा। तभी तो मंत्री ने सफाई दी है कि मरने वाली ज्यादातर गायें बूढ़ी और बीमार थीं। लोगों को यह दलील जंच नहीं रही है। 20 करोड़ रुपए खर्च करता है निगम हर साल इस गऊशाला पर। गो भक्तों का दान भी कम नहीं आता। करीब दस हजार गाय हैं, इस गोशाला में। विरोधी तो यही आरोप लगा रहे हैं कि चारे और पानी व दूसरी व्यवस्थाओं में भाजपाई इस कदर भ्रष्टाचार कर रहे हैं कि गायें बेमौत मर रही हैं। गोशाला की बदइंतजामी पर हाईकोर्ट को भी फटकार लगानी पड़ी। मुद्दा सियासी फायदे का है सो कांग्रेस के सूबेदार सचिन पायलट भी जा पहुंचे कांग्रेस सेवा दल के फौजफाटे के साथ गोशाला। गायों की देर तक सेवा की और लगे हाथ मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को कोस भी दिया। वसुंधरा की मुश्किल यह है कि इस मामले में प्रधानमंत्री दफ्तर ने भी हस्तक्षेप कर दिया है। तो क्या किसी न किसी पर गिरेगी जरूर इस विवाद की गाज। कांग्रेस के हथियार को भोथरा इसके बिना किया ही नहीं जा सकेगा। गऊशाला के दो छोटे कर्मचारियों को कर दिया है नगर निगम ने निलंबित। लेकिन ऊंट के मुंह में जीरे से ज्यादा नहीं है यह कवायद।


अदालती तमाचा
न्यायपालिका और सरकारों के बीच भी खूब चलता है चूहे और बिल्ली वाला खेल। हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ठहरी संवैधानिक अदालतें। सरकार के किसी भी फैसले की समीक्षा का अधिकार है उन्हें। पर यह समीक्षा किसी पूर्वाग्रह से नहीं बल्कि संविधान की भावना की कसौटी पर की जाती है। बार-बार अदालतें कह चुकी हैं कि जरूरत से ज्यादा संसदीय सचिव बनाना एक तरह से सत्ता की रेवड़ियां बांटने जैसा है। इससे जनहित का दूर तक नाता नहीं। पंजाब में बादल सरकार को भी इस मामले में मुंह की खानी पड़ी है। 18 मुख्य संसदीय सचिवों की नियुक्ति को रद्द कर पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट ने तमाचा जड़ दिया है खुद को संविधान और संसदीय परंपराओं से परे मानने वाली बादल सरकार के गाल पर। इस फैसले पर तत्काल तो कोई तीखी प्रतिक्रिया दी नहीं है। पर तैयारी हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की हो रही है। दूसरी तरफ अभी छह और मुख्य संसदीय सचिवों के भविष्य पर तलवार लटकी है। हरियाणा में भी हुई थी ऐसी नियुक्तियां। हाईकोर्ट हरियाणा सरकार के फैसले की भी समीक्षा कर रहा है। बादल सरकार को विधानसभा चुनाव से पहले ऐसे प्रतिकूल फैसले के कारण सियासी घाटा होने का जोखिम सता रहा है।


गजब प्रदेश
संजय पाठक की हैसियत से विरोधियों तो क्या करीबियों को भी जरूर होती होगी डाह। मध्यप्रदेश के सूक्ष्म व लघु उद्योग राज्यमंत्री हैं कहने को पाठक। यानी जनसेवक कहलाएंगे। पर माली हालत ऐसी कि बड़े-बड़े उद्योगपति भी पासंग नजर आएं। एक अरब 41 करोड़ की है उनकी घोषित संपत्ति। देश के अमीर मंत्रियों की सूची में पांचवां नंबर यों ही नहीं है। बेशक वे सफाई अपने ऊपर चल रहे कर्ज की दे सकते हैं। कुल 58 करोड़ का है उन पर कर्ज। इस मामले में सूबे के संस्कृति राज्यमंत्री सुरेंद्र पटवा मात खा गए। हैसियत 38 करोड़ की है तो क्या देनदारी भी तो 3 करोड़ की ठहरी। पर संजय पाठक और सुरेंद्र पटवा में जमीनी फर्क है। पटवा हैं पुराने भाजपाई। जबकि पाठक तो पुराने कांग्रेसी सत्येंद्र पाठक के बेटे हैं। उनके पिता भी दिग्विजय सरकार में मंत्री थे। खनन का है पुस्तैनी धंधा। कारोबार भी कई देशों तक फैला है। पिछले लोकसभा चुनाव के बाद दिया था कांग्रेस और उसके टिकट पर मिली विधानसभा सदस्यता से इस्तीफा। फिर भाजपा में शामिल हो उपचुनाव लड़ने की नैतिकता दिखाई। जीते और पिछले विस्तार में लालबत्ती भी पा गए। भले भाजपा के भीतर उन्हें मंत्री बनाने पर खूब बावेला मचा था। मुख्यमंत्री ने यह कह कर संघियों की बोलती बंद कर दी कि पार्टी में लाने से पहले किया था उनसे मंत्री बनाने का वादा। कहने को मध्यप्रदेश विकासशील सूबा है पर तीस मंत्रियों में से 26 करोड़पति हैं। एक गैरसरकारी संगठन रखता है देश के तमाम मंत्रियों की दौलत पर नजर। उसी ने पाया कि आंध्र के कानून मंत्री हैं 496 करोड़ रुपए की अपनी हैसियत के चलते देश के सबसे अमीर मंत्री। मध्यप्रदेश सरकार ने पर्यटन के प्रचार प्रसार के लिए पिछले दिनों जो विज्ञापन चलाया था उसकी पंचलाइन थी- एमपी गजब है। दूसरी कसौटियों पर गजब न भी सही पर भ्रष्टाचार के मामले में तो सचमुच कोई सानी नहीं इसका। नगरपालिका के चपरासी और क्लर्क तक निकलते हैं करोड़पति और अरबपति इस सूबे में।


उलटा पड़ा दांव
अपने ही बुने जाल में फंसती दिख रही है उत्तराखंड में भाजपा। मार्च में कांग्रेस के भीतर बगावत कराई थी अमित शाह के हनुमान कैलाश विजयवर्गीय ने। कांग्रेस के दस विधायकों से दल बदल करा हरीश रावत की सरकार को संकट में फंसाया था। पर यह दांव तो उलटा ही पड़ गया। न रावत की जगह अपनी सरकार बना पाए और न अदालती फजीहत से बच पाए। हां, मजबूरी में दस बागी कांग्रेसी विधायकों को भाजपाई बाना पहनाना पड़ गया। उन्हें अगले चुनाव में टिकट देने की गारंटी देकर बगावत कराई थी। तो फिर अपने वफादार कार्यकर्ताओं को क्या सफाई दें। कांग्रेसियों को तरजीह देंगे तो अपने बगावत पर उतारू होंगे। रुड़की, नरेंद्र नगर, नंदप्रयाग, सितारगंज और रामनगर समेत दस विधानसभा क्षेत्रों में पिछली दफा पार्टी के उम्मीदवार रहे नेता तो अब लामबंद हो गए हैं। देहरादून में बैठक कर अपने आलाकमान को चेता दिया कि उनकी जगह दलबदलुओं को टिकट दिए तो वे भी दूसरा विकल्प खोजने से पीछे नहीं रहेंगे। नरेंद्र नगर के ओम गोपाल राव तो कांग्रेसियों को दलाली करने वाले नेता तक बता बैठे। भाजपा के सूबेदार अजय भट्ट अपने ही नेताओं को अब अनुशासनहीनता के तहत कार्रवाई का खौफ दिखा रहे हैं। पर मुसीबत तो गले पड़ ही गई।


तबादलों का अर्थशास्त्र
शिवराज सरकार ने अगस्त के पहले पखवाड़े के लिए हटा रखी है तबादलों पर लगी रोक। हिदायत तो यही थी कि जिलों के प्रभारी मंत्री पार्टी के संगठन से फीडबैक लेकर और विधायकों के साथ मंत्रणा के बाद कामकाज की कसौटी पर परखेंगे लोक सेवकों को। लेकिन ज्यादातर मंत्रियों ने विधायकों की परवाह ही नहीं की। इससे भला वे नाराज क्यों न हों? तबादले तो अब अच्छा खासा उद्योग बन गए हैं। सीधी के विधायक केदारनाथ शुक्ल मुखर हो उठे हैं। मंत्री ने नहीं पूछा तो खुद पहल कर उन्होंने ही दे दी अपनी राय। वैसे ज्यादातर विधायकों को मंत्रियों के खिलाफ रोते पीटते ही देखा जा रहा है। इंदौर के प्रभारी मंत्री जयंत मलैया ने कह दी खरी बात। फरमाया कि उन्होंने जिलों से सूची मंगा ली है। वे तो बस उस पर हस्ताक्षर करने के गुनाहगार होंगे। सिहोर और नरसिंहगढ़ के प्रभारी मंत्री रामपाल सिंह भी बोल रहे हैं यही भाषा।


लौट के बुद्धू
आखिर महेश्वर सिंह को मुकाम मिल ही गया। अपनी पुरानी जड़ों की तरफ वापसी कर ली है। हिमाचल लोकहित पार्टी का भाजपा में विलय करने का उनका सपना साकार हो गया। हालांकि इस मुद्दे पर उनकी अपनी पार्टी में ही एक राय नहीं थी। तभी तो विलय के विरोधियों ने हिलोपा का कार्यकारी अध्यक्ष सुभाष शर्मा को घोषित कर दिया था। अंदरखाने तो एक और बात सुनी जा रही है भाजपाई हलकों में। जगत प्रकाश नड्डा यानी ब्राह्मण के मुख्यमंत्री पद की दावेदारी की आहट ने भाजपा के बिसरे-बिखरे राजपूत नेताओं की बेचैनी बढ़ा दी है। तभी तो वे फिर लामबंद हो रहे हैं। महेश्वर की वापसी से अब प्रेम कुमार धूमल को लामबंदी में आसानी होगी। यह बात अलग है कि जब भाजपा से नाता तोड़ा था तो धूमल की सरकार पर भ्रष्टाचार के कम आरोप नहीं जड़े थे महेश्वर ने। पर अलग पार्टी बनाना फायदेमंद नहीं निकला। ले-देकर बामुश्किल अपनी ही सीट जीत पाए। मजबूरी में कांग्रेसी मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह का पिछलग्गू भी बनना पड़ गया। पर उनकी मनाही के बावजूद वीरभद्र ने उनके भाई कर्ण सिंह को मंत्री बना दिया तो खफा हो गए महेश्वर। वीरभद्र को आंख दिखाने का भी उलटा ही असर हुआ। मुख्यमंत्री ने उनके पारिवारिक रघुनाथ मंदिर का अधिग्रहण करा उनकी चौधराहट को झटका दे दिया। यों आम आदमी पार्टी में जाने की जुगत भी भिड़ाई थी पर वहां दाल गलती नहीं दिखी तो घुटने टेक भाजपा में वापसी कर ली।

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