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राजपाट: तालमेल को मजबूर

लोकसभा में भाजपा डरी हुई थी सो उसने शिवसेना से तालमेल जरूरी समझा। खुद 25 सीटों पर लड़ी और शिवसेना के लिए 23 सीटें छोड़ दी।

Author Published on: September 21, 2019 3:47 AM
फोटो सोर्स- पीटीआई।

ना-नुकर तो दोनों ही कर रहे हैं पर आखिर में मान जाएंगे। हम बात महाराष्ट्र में भाजपा और शिवसेना के बीच सीटों के बंटवारे को लेकर चल रही तनातनी की कर रहे हैं। खबरें तो जितने मुंह उतनी आ रही हैं। पर निराधार कुछ भी नहीं। शिवसेना चाहती है कि भाजपा उसे बराबर का हिस्सा यानी 288 में से 144 सीट जरूर दे। भाजपा अपनी बढ़ी हैसियत से इतनी सीटें देने को राजी नहीं। आखिर 2014 के विधानसभा चुनाव में ही उसने अपनी सबसे पुरानी सहयोगी पार्टी शिवसेना के इस दंभ को तोड़ दिया था कि महाराष्ट्र में शिव सेना के बिना उसका कुछ नहीं उठेगा। तब अकेले लड़ कर ही भाजपा ने 122 सीटें जीत ली थीं।

शिवसेना को महज 63 सीटों पर मिल पाई थी कामयाबी। मुख्यमंत्री पद को अपनी बपौती मानने वाली इस पार्टी को सरकार में हिस्सेदारी भी भाजपा ने अपनी शर्तों पर दी। दरअसल बहुमत के लिए भाजपा को बस 22 ही तो विधायकों की कमी पड़ रही थी। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के नेता शरद पवार ने बिन मांगे सूबे के हित में खुद ही कर दी थी भाजपा को अपने 41 विधायकों के बाहर से समर्थन की पेशकश। तब भाजपा और शिवसेना ही नहीं कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस भी अपने बूते कूदे थे चुनावी जंग में। यानी मुकाबले चतुष्कोणीय थे।

लोकसभा में भाजपा डरी हुई थी सो उसने शिवसेना से तालमेल जरूरी समझा। खुद 25 सीटों पर लड़ी और शिवसेना के लिए 23 सीटें छोड़ दी। लोकसभा में तो कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस का भी हुआ था गठबंधन। यह बात अलग है कि कांग्रेस को महज एक सीट मिली और पवार की पार्टी चार सीटें जीत गई। भाजपा-शिवसेना गठबंधन में भी पलड़ा भाजपा का भारी निकला। शिवसेना 23 में से 18 ही जीत पाई थी। जबकि भाजपा 25 में से 23 जीत गई थी। उसी को आधार बना भाजपा अब शिवसेना को सौ-सवा सौ से ज्यादा सीटें देने के मूड में नहीं।

शिवसेना छह महीने पुराना वादा याद दिला रही है। जब अमित शाह ने 144 सीटें देने का भरोसा दिया था। तनातनी चाहे जितनी चले पर तालमेल होना तय है क्योंकि विपक्षी दोनों दलों का तालमेल जो हो चुका है। वैसे भी गुरुवार को खुद नरेंद्र मोदी ने नासिक की रैली में लोगों से यही कह कर समर्थन मांगा कि वे एक बार फिर भाजपा-शिवसेना की गठबंधन सरकार को मौका दें।

(प्रस्तुति : अनिल बंसल)

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