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राजपाट: राम भरोसे

उत्तर प्रदेश सरकार के कामकाज को लेकर विश्लेषक अप्रिय टिप्पणियां करते रहे हैं।

Author Updated: January 25, 2020 2:48 AM
मंच पर मौजूद उपमुख्यमंत्री केशव मौर्य ने प्रणाम किया तो जवाब नहीं दिया।

गृह मंत्री नागरिकता संशोधन कानून पर रैली को संबोधित करने लखनऊ गए थे। पर भीड़ उम्मीद के मुताबिक नहीं जुटी। मंच पर मौजूद उपमुख्यमंत्री केशव मौर्य ने प्रणाम किया तो जवाब नहीं दिया। मौर्य भी ठान कर आए थे कि अनदेखी नहीं होने देंगे। सो, लगातार और बार-बार अपनी पार्टी के सरताज के आगे शीश नवाते गए। आठवीं बार कोशिश सफल हुई और प्रणाम स्वीकार किया गया। मौर्य पिछड़ी जाति के हैं। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के वक्त वे पार्टी के सूबेदार थे। मुख्यमंत्री पद की दौड़ में सबसे आगे थे। पर बाजी मार ले गए योगी आदित्यनाथ। दोनों में तभी से ज्यादा पटती नहीं। चर्चा है कि योगी ने उनकी चुगली की थी। बीच में खबरें आई थी कि मुख्यमंत्री ने पीडब्लूडी के कामकाज की जांच के आदेश दिए हैं। इससे भी केशव मौर्य भन्ना गए थे। आखिर इस महकमे के मंत्री तो वही ठहरे। उत्तर प्रदेश सरकार के कामकाज को लेकर विश्लेषक अप्रिय टिप्पणियां करते रहे हैं। मसलन मुख्यमंत्री प्रशासनिक कामकाज को खास वरीयता नहीं देते। अगर देते होते तो सूबे में पांच महीने से मुख्य सचिव की तदर्थ व्यवस्था क्यों चलती। गौतम बुद्धनगर और लखनऊ में पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू किए जाने की भी आइएएस संवर्ग में तीखी प्रतिक्रिया हुई है।

अपर महानिदेशक स्तर के दो आला अफसरों से एसएसपी वाला काम लेना लोगों को हैरान कर रहा है। वैभव कृष्ण प्रकरण से भी सूबे के पुलिस अफसरों की गुटबाजी का डरावना चेहरा उजागर हुआ था। पुलिस महानिदेशक को लेकर भी खासा विवाद छिड़ा है। मौजूदा पुलिस महानिदेशक ओपी सिंह को योगी का चहेता माना जाता है। तभी उन्हें तीन महीने का सेवाविस्तार दिलाने की चर्चा चली थी। वे 31 जनवरी को रिटायर हो रहे हैं। सेवा विस्तार केंद्र की मंजूरी से दी जा सकती है। पर ओपी सिंह इस लालच में नहीं पड़े। चर्चा है कि वे तीन महीने के सेवा विस्तार के बजाए लंबी अवधि का मलाईदार ओहदा पाने की जुगत में हैं। मुख्य सूचना आयुक्त जावेद उस्मानी की कुर्सी पर भी निगाह बताई जा रही है उनकी।

जिनका कार्यकाल अगले महीने पूरा हो रहा है। इसलिए योगी सरकार ने नए डीजीपी के लिए सात नामों की सूची संघ लोक सेवा आयोग के पास भेजी है। नियम ही ऐसा है। यह बात अलग है कि नए डीजीपी के लिए केंद्र की सेवा में लगे डीएस चौहान के नाम की चर्चा है। बहरहाल सात नामों में दो 1988 और तीन 1987 बैच के हैं। इससे खफा जवाहर लाल त्रिपाठी ने हाई कोर्ट की शरण ली है। उनकी शिकायत वाजिब भी है। वे 1986 बैच के और बेदाग छवि के पुलिस अफसर हैं। योगी सरकार ने उन्हें डीजी सिविल डिफेंस बना कर खुड्डेलाइन कर रखा है। त्रिपाठी चाहते हैं कि हाई कोर्ट सूबे की सरकार को उनकी वरिष्ठता को नजरअंदाज नहीं करने की हिदायत दे।

चला-चली की बेला

नौकरशाही की छटपटाहट देखनी हो तो इन दिनों राजस्थान सामने है। अशोक गहलोत की सरकार ने सत्ता संभालने के बाद भी यों तबादले थोक में किए थे। पर भाजपा राज में खुड्डेलाइन रहने वालों की तसल्ली नहीं हो पाई थी। पुलिस और प्रशासन दोनों ही जगह अफसरों की अदला-बदली फिर होने वाली है। दरअसल पिछले बदलाव में गहलोत ने वसुंधरा राज के कई आला अफसरों को अहम ओहदों पर ही बनाए रखा था। नया साल शुरू हुआ तो अफसरों की नियमानुसार तरक्की हो गई। बेशक अभी तक बढ़ी हैसियत के हिसाब से उन्हें पद नहीं मिल पाए हैं। वसुंधरा सरकार में अहम पदों पर रहे कई आला अफसर डेपुटेशन पर केंद्र सरकार की सेवा में भी जा चुके हैं। मसलन वसुंधरा के निजी सचिव रहे तन्मय कुमार को ही लें। नौकरशाही उनके इशारों पर नाचती थी। आखिर मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव थे। लेकिन अब वे केंद्र में ऊर्जा मंत्रालय में तैनाती पा गए हैं। सो, राज्य सरकार ने उन्हें कार्य मुक्त भी करने में देर नहीं लगाई। संजय मल्होत्रा और आलोक कुमार भी केंद्र सरकार की सेवा में जा चुके हैं। जाहिर है कि अब गहलोत को इन अफसरों की जगह नई तैनातियां करनी होंगी। आइएएस ही नहीं बदलाव आइपीएस और आरएएस अफसरों में भी होना है। पीके सिंह सूबे की पुलिस में अहम पद पर थे। अब वे केंद्र में सीमा सुरक्षा बल के अतिरिक्त महानिदेशक बन गए हैं। केंद्रीय रक्षामंत्री राजनाथ सिंह उनकी कार्य क्षमता से प्रभावित रहे हैं। एक और वजह भी है कि वे यूपी के हैं और उनके पिता यूपी में पुलिस महानिदेशक रहे हैं। तबादलों की चाह के चलते ज्यादातर अफसर मौजूदा पदों पर कामकाज में खास दिलचस्पी नहीं ले रहे। नतीजतन नौकरशाही ठहराव के दौर से गुजर रही है। सरकार को भी अभी इस तरफ ध्यान देने का ज्यादा वक्त नहीं मिल रहा। वजह है केंद्र का नागरिकता संशोधन कानून। पार्टी की रणनीति पर चलते हुए अशोक गहलोत की सरकार इस कानून का पुरजोर विरोध कर रही है। पर अब ज्यादा दिन नहीं लगेंगे आला अफसरों के तबादलों की सूची जारी होने में।

निहितार्थ शिष्टाचार के

हरीश रावत को उत्तराखंड के उनके विरोधी कांग्रेसी नेता भी समझ नहीं पा रहे। वे भाजपा ही नहीं कांग्रेसियों के लिए भी पहेली बने हैं। राहुल गांधी ने उन्हें अपनी टीम में महासचिव तो बनाया ही था असम जैसे राज्य का प्रभार भी सौंपा था। मकसद यही रहा होगा कि वे सूबे की सियासत से खुद को अलग करेंगे। जिससे वहां पनपी गुटबाजी पर अंकुश लग पाएगा। लेकिन रावत से सूबे की सियासत का मोह छूट ही नहीं पाया। असम में तो वे यदा-कदा ही जाते हैं। ज्यादा वक्त तो उत्तराखंड में ही बीतता है उनका। आलाकमान के निर्देश की भी खास परवाह नहीं करते। आजकल उनकी पार्टी के उत्तराखंड के नेता इसी को लेकर बेचैन हैं कि हरीश रावत ने जगत प्रकाश नड्डा को भाजपा अध्यक्ष बनने पर बधाई क्यों दी? दरअसल हरीश रावत ने पत्रकारों से कहा था कि नड्डा भले आदमी हैं। इसीलिए उन्हें बधाई दी है। फिर उनके पक्षपात रहित होने की मिसाल भी दे डाली थी। बताया था कि जब नड्डा मोदी की पिछली सरकार में स्वास्थ्य मंत्री थे तो ऋषिकेश के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के लिए जरूरत के मुताबिक बजट दे दिया था। बकौल हरीश रावत वे जब मुख्यमंत्री पद से हटे थे तो उन्होंने नड्डा से सिफारिश की थी कि त्रिवेंद्र सिंह रावत को भी वैसा ही सहयोग दें जैसा उन्हें दिया था। रावत विरोधी गुट उनके इस बयान के निहितार्थ खोज रहा है। कुछ काना बाती कर रहे हैं कि कहीं नड्डा के भाजपा अध्यक्ष बनने पर हरीश रावत भी भाजपाई तो नहीं बनने जा रहे। काश वे समझ पाते कि सियासत में शिष्टाचार की भी अपनी भूमिका होती है। जगत प्रकाश नड्डा को भाजपा की कमान संभालने पर बधाई तो भाजपा के धुर विरोधी और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने भी दी थी। पाठकों को बता दें कि नड्डा की सास जयश्री बनर्जी मध्य प्रदेश की कांग्रेस सरकार में मंत्री थीं।

(प्रस्तुति : अनिल बंसल)

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