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राजपाट: वजूद का सवाल व बाबूशाही

शिवसेना की असली ताकत मुंबई महानगर पालिका रही है।

Author Published on: November 16, 2019 3:30 AM
भाजपा ने मातोश्री में पहुंचना बंद कर दिया तो उद्धव समझ गए कि अब भाजपा के साथ रहने का मतलब शिवसेना को खत्म करना होगा।

शिवसेना और भाजपा का गठबंधन क्यों टूटा? इसे लेकर न भाजपा सच बोलेगी और न शिवसेना। आज के दौर की राजनीति में वैसे भी सच बोल कर कुछ हासिल कहां होता है? मुख्यमंत्री पद तो बहाना है। हकीकत तो यही है कि मातोश्री की लगातार घट रही हैसियत और अहमियत ने उद्धव ठाकरे की नींद उड़ा रखी थी। प्रमोद महाजन और बाला साहब ठाकरे के जमाने में सब कुछ मातोश्री से होता था। प्रमोद महाजन ने अपनी पार्टी की महाराष्ट्र में जड़ जमाने के लिए शिवसेना को बड़े भाई और भाजपा को छोटे भाई का दर्जा दिया था। उसी के तहत 1995 में जब पहली बार महाराष्ट्र में यह गठबंधन सत्ता में आया तो मुख्यमंत्री पद शिवसेना को और उपमुख्यमंत्री भाजपा को मिला।

शिवसेना की असली ताकत मुंबई महानगर पालिका रही है। लेकिन भाजपा ने शिवसेना को छोटा भाई बनने को मजबूर कर दिया। लोकसभा चुनाव तो 2014 में दोनों पार्टियां मिलकर लड़ीं। पर कुछ महीने बाद हुए विधानसभा चुनाव में दरार पड़ गई। पहली बार दोनों अलग-अलग लड़े। भाजपा को करीब सवा सौ सीटों पर कामयाबी मिली तो शिवसेना उसके आधे आंकड़े को भी नहीं छू पाई। ऊपर से तब शरद पवार की एनसीपी ने भाजपा को सरकार गठन में समर्थन की पेशकश कर उद्धव को और लाचार बना दिया। वे भाजपा की शर्तों पर सरकार में शामिल हुए।

केंद्र में भी एक ही मंत्री पद और वह भी महत्वहीन लेकर सब्र करना पड़ा। उधर भाजपा ने मातोश्री में पहुंचना बंद कर दिया तो उद्धव समझ गए कि अब भाजपा के साथ रहने का मतलब शिवसेना को खत्म करना होगा। सो, इस बार परिस्थिति भाजपा के लिए थोड़ी जटिल हुई तो उन्हें गठबंधन तोड़ने का बहाना मिल गया। ऊपर से भाजपा पर झूठ बोलने और मराठा मानुष को नीचा दिखाने का आरोप अलग जड़ दिया। राज की बात तो यह है कि अब परदे के पीछे उनके सलाहकार शरद पवार बन गए हैं।

बाबूशाही

राजस्थान की नौकरशाही में इन दिनों उथल-पुथल मची है। आईएएस अफसरों की कमी भी झेल रहा है सूबा। स्वीकृत 313 पदों के विपरीत फिलहाल 274 आईएएस ही कर रहे हैं सूबे में काम। इसी के चलते केंद्र में डेपुटेशन भी नहीं देना चाह रहे थे अफसरों को मुख्यमंत्री अशोक गहलोत। लेकिन व्यवस्था के विपरीत चल नहीं सकते सो, कुछ अफसरों को स्वीकृति देनी पड़ी। कमी का नतीजा है कि कई अफसरों के पास तो अतिरिक्त काम का बोझ भी है। मुश्किल कुछ और भी है। हर बार राज्य में सरकार बदल जाती है। एक सरकार के दौर में जो अफसर अहम पदों पर तैनात रहते हैं, सरकार बदलते ही खुड्डेलाइन हो जाने के डर से वे केंद्र में डेपुटेशन पर निकल जाते हैं।

इसका असर सरकारी योजनाओं के अमलीजामा पहनने पर पड़ता है। तन्मय कुमार की मिसाल दी जा रही है। उन्हें गहलोत ने केंद्र में जाने की इजाजत दी है। वसुंधरा राजे मुख्यमंत्री थी तो उनके प्रमुख सचिव थे। अपनी कार्यशैली से सुर्खियां बटोरी थी। यहां तक कि अपने आला अफसरों तक को इंतजार कराते थे। भाजपाई अपनी सरकार दोबारा नहीं बनने का दोष उन्हीं को ज्यादा देते हैं। अब वे ही केंद्र में भाजपा की सरकार के चहेते बन जाएंगे। और तो और चुनाव के दिनों में सूबे के भाजपा प्रभारी प्रकाश जावड़ेकर तक ने आरोप लगाया था कि दोबारा सरकार नहीं बनने के पीछे वसुंधरा राजे के प्रमुख सचिव और आसपास की मंडली की भूमिका थी। मुश्किल यह है कि हर सरकार में चालाक आईएएस अफसर मुख्यमंत्री को मोह लेते हैं और फिर न उसी पार्टी के किसी मंत्री की परवाह करते हैं और न सांसदों -विधायकों को भाव देते हैं।

(प्रस्तुति : अनिल बंसल)

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