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राजपाट: सूरमा बिहारी

jansatta rajpat column on Surma Bihari

Author Published on: September 14, 2019 3:04 AM
सांकेतिक तस्वीर।

सच्चा है, अच्छा है। चलो, नीतीश के साथ चलें। क्यूं करें विचार, ठीके तो है नीतीश कुमार। क्यों ना करें विचार, बिहार जो है बीमार। ये नारे बिहार की राजधानी पटना के प्रमुख चौराहों पर लगी विशालकाय होर्डिंग पर अभी से प्रकट हो गए हैं। बिहार में हालांकि चुनाव इस साल नहीं है। अभी तो बारी हरियाणा व महाराष्ट्र की ठहरी। दरअसल नीतीश के समर्थन वाले इन नारों के पीछे नीतीश की पार्टी जनता दल (एकी) ने एक तीर से दो शिकार की रणनीति अपनाई है। एक तरफ यह संदेश दिया है कि बिहार में नीतीश सरकार ठीक काम कर रही है। पर दूसरा संदेश गूढ़ है। कहीं महाराष्ट्र जैसी चाल न चल दे भाजपा। जहां उसने शिवसेना को मुख्यमंत्री पद देने की अपनी पुरानी नीति को पिछले विधानसभा चुनाव में पलट दिया था।

शिवसेना से ज्यादा सीटें जीतकर पहली बार अपना मुख्यमंत्री बना लिया था। नीतीश एक दौर में भले दिल्ली की सत्ता का सपना देखते रहे हों पर जब से मोदी का वर्चस्व कायम हुआ है वे बिहार में ही अपना राज रखने की रणनीति अपना चुके हैं। कहने को भाजपा और जद (एकी) गठबंधन की सरकार बिहार में निर्बाध चल रही है। भाजपा ने अभी तो नीतीश को नेता मान ही रखा है पर मतभेद तो हैं।

मसलन तीन तलाक और धारा 370 पर जद (एकी) ने संसद में सरकार का दूसरे सहयोगियों की तरह खुला समर्थन नहीं किया। जद (एकी) को केंद्र की सत्ता में हिस्सेदारी भी नहीं दी। ऊपर से सीपी ठाकुर जैसे पुराने भाजपाई कह रहे हैं कि अभी से नीतीश की मुख्यमंत्री पद की अगली पारी की दावेदारी ठीक नहीं। भाजपाई खुलकर भले न कह रहे हों पर चाहते यही हैं कि अब नीतीश दिल्ली जाएं।

केंद्र में मंत्री बनें और बिहार की अगली सरकार का नेतृत्व भाजपा को करने दें। राजद तो विपक्ष में है सो नीतीश समर्थक नारों के प्रतिवाद में उसे कहना पड़ा कि क्यों ना करें विचार। यह बात अलग है कि राजद और जद (एकी) के दोबारा गठबंधन की संभावना को भी अभी से नकारना ठीक नहीं। राजद के धुरंधर शिवानंद तिवारी ने परोक्ष रूप से पेशकश भी कर दी है।

वे फरमा रहे हैं कि धर्मनिरपेक्ष और समाजवादी मूल्यों के लिए नीतीश को फिर 2015 वाले गठबंधन की सोचनी चाहिए। वे पहल करेंगे तो राजद उनका नेतृत्व बिहार के हित में स्वीकार कर लेगा। तेजस्वी यादव की मुख्यमंत्री पद की दावेदारी के संदर्भ में तिवारी की इस पेशकश के हर कोई अपने अंदाज में खोज रहा है निहितार्थ। पर नीतीश अभी इस विवाद में मौनी बाबा ही बने हैं।

(प्रस्तुति : अनिल बंसल)

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