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राजपाट: प्रतिष्ठा दांव पर

शुरू में तो हरीश रावत ने अपने बचाव की कोशिश की थी पर अब उन्होंने खुद को भाग्य भरोसे छोड़ दिया है।

Author Published on: October 5, 2019 4:26 AM
युवा जाट सतीश पूनिया को सूबेदार बना जाटों को सकारात्मक संदेश दिया है।(सांकेतिक तस्वीर)

राजस्थान की सियासत एक बार फिर गरमा गई है। सूबे में विधानसभा की दो सीटों के लिए उपचुनाव होगा। भाजपा और कांग्रेस दोनों के ही कद्दावर नेताओं की प्रतिष्ठा इन सीटों पर दांव पर लगी है। राजस्थान में वैसे भी सियासत दो ध्रुवीय ही रही है। छोटे-मोटे क्षेत्रीय दल कभी भी बड़ा असर नहीं दिखा पाए। खींवसर सीट रालोपा के हनुमान बेनीवाल के लोकसभा के लिए चुने जाने के कारण खाली हुई है। बेनीवाल की पार्टी ने लोकसभा में भाजपा से गठबंधन किया था। मंडावा सीट के विधायक नरेंद्र खींचड़ भी चूंकि लोकसभा के सदस्य बन गए सो सीट खाली हो गई। जहां खींवसर में जीत का जिम्मा मुख्य रूप से बेनीवाल के कंधे पर होगा वहीं मंडावा में भी उनकी पार्टी की भूमिका अहम रहेगी।

भाजपा इन दोनों सीटों पर अपना कब्जा कायम रखने के लिए हर जतन कर रही है। रही कांग्रेस की बात तो वह सूबे की सत्ता पर काबिज होने का मनोवैज्ञानिक लाभ लेना चाहेगी। यह कह कर कि उसके उम्मीदवार जीतेंगे तो दोनों इलाकों का बेहतर विकास हो सकेगा। कांग्रेस को अपनी ताकत बढ़ाने के लिए भी दोनों सीटों पर जीत की दरकार है। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत भी साम-दाम-दंड-भेद हर हथकंडा आजमा रहे हैं। गहलोत और उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट के लिए यह साख का सवाल है। उधर, भाजपा में नए बने सूबेदार सतीश पूनिया को अपना रण कौशल दिखाने का अवसर मिलेगा।

कांग्रेस के लिए मुश्किल यही है कि दोनों सीटें जाट बहुल ठहरीं। भाजपा ने युवा जाट सतीश पूनिया को सूबेदार बना जाटों को सकारात्मक संदेश दिया है। मंशा तो पार्टी की पूनिया के नाम का फायदा पड़ोसी राज्य हरियाणा के विधानसभा चुनाव में भी लेने की लगती है। वैसे भी जाटों की युवा पीढ़ी में इन दिनों रालोपा नेता हनुमान बेनीवाल एक नायक की तरह उभरे हैं। जिससे कांग्रेस को घाटा हो रहा है। बेनीवाल ने अपनी पार्टी का भाजपा में विलय तो नहीं किया है पर वे गठबंधन का धर्म ईमानदारी से निभा रहे हैं। हालांकि, उपचुनाव से पार्टी ने पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को दूर ही रखा है।

बेनीवाल का उनसे यों भी छत्तीस का ही आंकड़ा है। वसुंधरा की जगह अब राजस्थान भाजपा में संघ के प्रति निष्ठावान रहे नेताओं को तवज्जो मिल रही है। 2018 के विधानसभा चुनाव में वैसे भी खुद भाजपा कार्यकर्ता ही नारा लगा रहे थे कि मोदी से बैर नहीं, पर वसुंधरा की खैर नहीं। वसुंधरा को पार्टी ने न केवल नेता प्रतिपक्ष का पद नहीं दिया, उनके बेटे की वरिष्ठता को भी नकारते हुए केंद्र में मंत्री पद नहीं दिया।
सियासी भूचाल

उत्तराखंड में सियासी भूचाल आने को है। नैनीताल हाई कोर्ट के आदेश ने पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की सांसें अटका दी हैं। हाई कोर्ट ने विधायकों की खरीद-फरोख्त के स्टिंग ऑपरेशन को लेकर रावत के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने की सीबीआइ को इजाजत देकर कांग्रेस और हरीश रावत दोनों की बेचैनी बढ़ा दी है। भाजपाई यह धारणा नहीं बनने देना चाहते कि रावत को फंसाने में उनकी कोई भूमिका है। पार्टी के सूबेदार अजय भट्ट ने इसे निराधार बताया है कि भाजपा हरीश रावत के खिलाफ सीबीआइ का राजनीतिक इस्तेमाल कर रही है।

शुरू में तो हरीश रावत ने अपने बचाव की कोशिश की थी पर अब उन्होंने खुद को भाग्य भरोसे छोड़ दिया है। उलटे उनकी मंशा जेल जाकर नायक बनने की लग रही है। लोगों में सहानुभूति जगे और अगले विधानसभा चुनाव में उन्हें इसका फायदा मिल जाए। भाजपा की तरह कांग्रेस में भी हरीश रावत का विरोधी खेमा अब उलझन में दिख रहा है। यह खेमा भी नहीं चाहता कि हरीश रावत खुद को पीड़ित बता भविष्य में नायक बन जाएं। जानकार तो हरीश रावत के पक्ष में दिए गए कांग्रेस के सूबेदार प्रीतम सिंह और विधायक दल की नेता इंदिरा हृदेश के बयानों का भी अपने तर्इं निहितार्थ खोज रहे हैं। चर्चा तो यहां तक है कि जब मुख्यमंत्री थे, तभी सीबीआइ उन्हें गिरफ्तार करने की तैयारी कर चुकी थी। पर वे चुपचाप प्रधानमंत्री से मिल अपनी सफाई दे आए थे और उसके बाद मामला ठंडे बस्ते में चला गया था।

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