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राजपाट: जुगाड़ में बाबू

सत्ता संभालने के फौरन बाद भी किया था गहलोत ने नौकरशाही में बदलाव। अपने करीबियों की सलाह को अहमियत दी थी। मसलन, जयपुर में हुई तैनातियों पर विधायक महेश जोशी की छाप साफ झलक रही थी।

Author jansatta rajpat column on rajasthan govt | Updated: September 7, 2019 6:51 AM
मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और सचिन पायलट

सत्ता का एक केंद्र ही माना जाता है आमतौर पर शासन के अनुकूल। पर राजस्थान में तो दो केंद्र कब से बने हैं। नौकरशाहों की दुविधा इसी ने बढ़ा रखी है। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट के अपने-अपने खेमे ठहरे। अफसरों को समझ ही नहीं आ रहा कि किस खेमे को ज्यादा तवज्जो दें। बेशक प्रशासन पर पुख्ता पकड़ के लिए मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की पहचान रही है। पहले भी दो बार सूबे की सरकार का नेतृत्व जो कर चुके हैं। तब तो नौकरशाही पर पकड़ भी थी और साख भी।

जाहिर है कि तीसरे कार्यकाल में पुरानी साख का कुछ तो फायदा मिल भी रहा होगा। ज्यादातर आला अफसरों को निजी तौर पर भी गहलोत ज्यादा भाते हैं। वित्त, कार्मिक और गृह जैसे अहम महकमे गहलोत ने बहैसियत मुख्यमंत्री अपने पास ही रखे हैं। उधर सचिन पायलट अभी तक सूबे में पूरी तरह रम नहीं पाए हैं। हालांकि उनके समर्थक नौकरशाही में उनकी धाक जमाने के लिए जतन खूब कर रहे हैं। चर्चा है कि नौकरशाही में मुख्यमंत्री कुछ बदलाव करेंगे। सो, अफसरों ने जोड़तोड़ शुरू कर दिया है। मुख्यमंत्री के करीबी विधायकों और पार्टी नेताओं की परिक्रमा तेज कर दी है।

सत्ता संभालने के फौरन बाद भी किया था गहलोत ने नौकरशाही में बदलाव। अपने करीबियों की सलाह को अहमियत दी थी। मसलन, जयपुर में हुई तैनातियों पर विधायक महेश जोशी की छाप साफ झलक रही थी। परिवहन मंत्री प्रताप सिंह खाचरियावास और कृषि मंत्री लालचंद कटारिया को मन मसोस कर रह जाना पड़ा था। लेकिन इस बार वे अपनी पसंद के अफसरों की अपने हिसाब से तैनाती के लिए जुगत भिड़ा रहे हैं। जहां तक जयपुर का सवाल है, राजधानी होने के बावजूद सांप्रदायिक तनाव की घटनाएं यहां थम नहीं रहीं। इससे जयपुर के दोनों मुसलमान विधायक दुखी हैं। उन्हें पुलिस कमिश्नर प्रणाली कतई नहीं भा रही। सो, संकेत हैं कि इस शहर में अब किसी संवेदनशील अफसर की टोह में जुटे हैं गहलोत।

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