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राजपाट: निराशा का घटाटोप

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट ही अगर सीधे एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने लगेंगे तो फिर कार्यकर्ताओं के स्तर पर तो हालात ज्यादा ही नाजुक हो सकते हैं।

सचिन पायलट संग राजस्थान के सीएम अशोक गहलोत फोटो सोर्स- ANI

अपनी सरकार के होते हुए भी राजस्थान में कांग्रेस खाता तक नहीं खोल पाई। यह पार्टी के लिए करारा झटका है। हारे को हरिनाम जपने की सयानों ने सलाह दी है। पर राजस्थान के कांग्रेसी टोटे में लड़ने वाली कहावत को चरितार्थ कर रहे हैं। चुनावी नतीजों के बाद सूबे में कांग्रेस दो फाड़ दिखने लगी है। गुटबाजी तो यों पहले से ही थी पर इस तरह दो फाड़ हो जाना पार्टी के लिए खतरे की घंटी ही कही जाएगी। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट ही अगर सीधे एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने लगेंगे तो फिर कार्यकर्ताओं के स्तर पर तो हालात ज्यादा ही नाजुक हो सकते हैं। हार के बाद कारणों की टोह लेकर भविष्य के लिए नई रणनीति बुनने के बजाए कांग्रेसी बयानबाजी पर उतर पड़े हैं।

इससे कार्यकर्ता डर गए हैं कि सूबे की सरकार अपना कार्यकाल भी पूरा कर पाएगी या नहीं। आलाकमान का असर भी घटा है तभी तो प्रभारी महासचिव अविनाश पांडेय की धमकी कोई असर नहीं दिखा पाई। पांडेय ने फेसबुक के जरिए नेताओं और कार्यकर्ताओं को चेताया था कि जो बयानबाजी से अनुशासनहीनता करेंगे उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई होगी। लेकिन असर उलटा हुआ। पार्टी के लोग पांडेयजी की ही लेने लगे क्लास। उन्हीं पर लगा दिया सूबे में पार्टी की गुटबाजी को बढ़ावा देने का आरोप।

आरोप-प्रत्यारोप के बीच लोकसभा चुनाव हारने वाले उम्मीदवारों को भी मौका मिल गया। वे अपनी कमजोरी या भाजपा की हवा की हकीकत को स्वीकार करने के बजाए अपनी हार का ठीकरा पार्टी के ही अपने विरोधियों पर फोड़ने लगे हैं। अग्रणी हैं जयपुर की उम्मीदवार रहीं ज्योति खंडेलवाल। कोटा के राम नारायण मीणा भी खूब भड़ास निकाल रहे हैं। उनकी एक पीड़ा खुद को मंत्री नहीं बनाया जाना भी है। कुल मिलाकर निराशा में डूबी है फिलहाल कांग्रेस।

 

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