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राजपाट: अब 36 से 63

नए समीकरणों के चलते अब ममता पर पहले जैसे घातक तीर नहीं चला पाएंगे।

फोटो सोर्स- इंडियन एक्सप्रेस।

राजनीति में रिश्तों की केमिस्ट्री भी निर्धारित नहीं होती। जो कभी एक-दूसरे के कटु आलोचक रहे हों उन्हें भी एक-दूसरे का प्रशंसक बनने में देर नहीं लगती। ताजा बानगी पश्चिम बंगाल की है। जहां दीदी और प्रधानमंत्री के रिश्तों के बीच लंबे अरसे से जमी बर्फ अब पिघलने लगी है। जबकि अरसे से मुलाकात तो दूर आपसी बातचीत भी बंद थी। यहां तक कि नरेंद्र मोदी ने दोबारा प्रधानमंत्री पद की शपथ ली तो उसमें भी हाजिर नहीं हुईं ममता बनर्जी। दरअसल लोकसभा चुनाव के दौरान दोनों ने एक-दूसरे को पानी पी-पीकर कितना कोसा था।

छत्तीस के थे दोनों के रिश्ते। लेकिन अचानक ममता ने मोदी से दिल्ली आकर मिलने का एलान किया तो रिश्ते उलट गए। छत्तीस से तिरसठ के होने लगे। सूबे के विकास से जुड़े मुद्दों पर मंत्रणा को बताया ममता ने अपनी मुलाकात का मकसद। लेकिन मिली तो न केवल उन्हें बंगाली कुर्ता बल्कि मिठाई भी भेंट की। इतना ही नहीं पश्चिम बंगाल आकर अपनी सुविधा के अनुसार कोयला खदान का उद्घाटन करने का न्योता भी दे डाला। पश्चिम बंगाल के सियासी हलकों में इस बदलाव पर नुक्ताचीनी होनी ही थी। और तो और भाजपा के सूबे के प्रभारी महासचिव कैलाश विजयवर्गीय भी टिप्पणी करने से नहीं चूके।

फरमाया कि सीबीआइ जांच में फंसे कोलकाता के अपने चहेते पूर्व पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार को बचाने के मकसद से ममता ने बदला है अपना रुख। जो राज उगल देंगे तो तृणमूल कांग्रेस के आधे नेता जेल में नजर आएंगे। इसी तरह की टिप्पणी वाम मोर्चे और कांग्रेस के नेताओं की तरफ से आई। यही कि सारदा चिट फंड घोटाले की जद में फंसे अपने नेताओं को बचाने के लिए जाना पड़ा है मोदी की शरण में। ये दोनों दल तो ‘दीदी-मोदी, बहन-भाई’ का नारा भी लगाने लगे। दोनों दलों में पहले से मिलीभगत होने का आरोप अलग जड़ दिया।

पर रिश्तों के बदले समीकरण ने सबसे ज्यादा परेशान किया है पश्चिम बंगाल के भाजपा नेताओं को। बेचारे असमंजस में फंस गए हैं। नए समीकरणों के चलते अब ममता पर पहले जैसे घातक तीर नहीं चला पाएंगे। लोकसभा चुनाव के बाद मोदी और दीदी की बुधवार को दिल्ली में हुई बैठक औपचारिक रूप से तो पहली ही थी अन्यथा आखिरी औपचारिक मुलाकात पिछले साल 25 मई को शांति निकेतन के विश्वभारती विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में ही हुई थी। रिश्तों की कटुता को मिठास में बदलने की मजबूरी न होती तो मोदी से मुलाकात के बाद ममता उनके गृहमंत्री से मुलाकात कतई न करतीं।

(प्रस्तुति : अनिल बंसल)

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