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राजपाट: दीदी की कवायद

हालिया लोकसभा चुनावों में राज्य के आदिवासी बहुल इलाकों में भाजपा ने तृणमूल को करारा झटका दिया है। खासकर चायबागानों वाले उत्तर बंगाल इलाके में तो उसने तृणमूल का सूपड़ा साफ कर दिया है।

Author July 6, 2019 7:06 AM
सीएम ममता बनर्जी फाइल फोटो- इंडियन एक्सप्रेस

हाल के लोकसभा चुनावों में भाजपा की ओर से मिले जोरदार झटके के बाद दीदी यानी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी लगातार तृणमूल कांग्रेस के पैरों तले से खिसकती जमीन को मजबूत करने में जुटी हैं। इसके तहत पहले उन्होंने पार्टी में फैले भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए ‘कटमनी’ यानी सरकारी योजनाओं में तृणमूल नेताओं के कमीशन का मुद्दा उठाते हुए नेताओं को इससे बाज आने की चेतावनी दी थी। इस मुद्दे पर अब राज्य में जगह-जगह नियमित रूप से विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं।

अब दीदी ने सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर तबके के लिए शैक्षणिक संस्थानों और सरकारी नौकरियों में दस फीसद आरक्षण देने का एलान किया है। यही नहीं, बंगाल की सत्ता में आने के बाद पहली बार उन्होंने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के सामाजिक-आर्थिक उत्थान के लिए तमाम राजनीतिक दलों के इन दोनों तबके के विधायकों के साथ एक बैठक की और उनसे सुझाव मांगे। इसकी वजह समझना मुश्किल नहीं है। हालिया लोकसभा चुनावों में राज्य के आदिवासी बहुल इलाकों में भाजपा ने तृणमूल को करारा झटका दिया है। खासकर चायबागानों वाले उत्तर बंगाल इलाके में तो उसने तृणमूल का सूपड़ा साफ कर दिया है।

इस इलाके में आदिवासी चाय मजदूरों के वोट ही निर्णायक हैं। इसी तरह पुरुलिया, बांकुड़ा और बीरभूम जिलों के कई इलाकों में इस तबके के वोटर ज्यादा हैं। इन इलाकों में लगभग तमाम सीटें भाजपा को मिली हैं। दिलचस्प बात यह है कि उनकी इस पहल को भाजपा समेत पूरे विपक्ष का समर्थन भी मिला है। खासकर सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर तबके के लिए दस फीसद आरक्षण का फैसला उनके लिए तुरुप का पत्ता साबित हो सकता है। भाजपा, कांग्रेस और माकपा ने भी इसका स्वागत किया है। राज्य सरकार सियासी हिंसा में मारे जाने वाले लोगों के परिजनों को मुआवजा देने की रणनीति पर भी विचार कर रही है। जाहिर है दीदी की निगाहें दो साल बाद होने वाले विधानसभा चुनावों पर टिकी हैं।

 

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