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राजपाट: मोदी से बैर नहीं

वसुंधरा राजे के दिन अब लद गए समझो। हर कोई कह रहा है कि अगले विधानसभा चुनाव तक तो आलाकमान नया नेता खड़ा कर देंगे। गजेंद्र सिंह शेखावत, राज्यवर्धन सिंह राठौड़ और अर्जुन मेघवाल को आलाकमान का पसंदीदा माना जाता है।

Author Published on: May 25, 2019 4:49 AM
जीत के बाद पीएम मोदी की तस्वीर पर तिलक करते लोग। फोटो:PTI

चुनावी नतीजों ने अब राजस्थान में बड़े बदलाव के संकेत दे दिए हैं। पिछली दफा की तरह सारी पच्चीस सीटों पर कांग्रेस का भाजपा ने फिर सूपड़ा साफ कर दिया। जिसकी भाजपा नेताओं को खुद भी उम्मीद नहीं थी। इससे कई धारणाएं भी टूट गर्इं। मसलन, सूबे में जिसकी सरकार होती है, लोकसभा चुनाव में ज्यादा सीटें उसी पार्टी को मिलती हैं। पिछले साल वसुंधरा राजे को सत्ता से बेदखल कर कांग्रेस ने इस धारणा को तो साबित किया था कि राजस्थान में हर बार सत्ता परिवर्तन की परंपरा है। लेकिन लोकसभा में ऐसी बुरी गत हो सकती है, इसका किसी को अंदाज नहीं था।

ऊपर से अशोक गहलोत को भी जादूगर कहा जाता है। लेकिन उनका जादू और तो और जोधपुर में अपने बेटे वैभव को भी चुनावी वैतरणी पार नहीं करा पाए। उपचुनाव में कांग्रेस ने अलवर और अजमेर की सीटें जीत कर अच्छे दिन का सपना संजोया था। लेकिन मोदी की सुनामी के आगे अजमेर और अलवर की जीत भी कांग्रेस कायम नहीं रख पाई। हालांकि विधानसभा चुनाव में भी यह नारा जनता के बीच खूब चला था- वसुंधरा तेरी खैर नहीं, पर मोदी से बैर नहीं। सूबे की जनता ने साबित कर दिया कि उसे मोदी से न पहले कोई अदावत थी और न अब। इस जीत का दूरगामी असर तय है।

वसुंधरा राजे के दिन अब लद गए समझो। हर कोई कह रहा है कि अगले विधानसभा चुनाव तक तो आलाकमान नया नेता खड़ा कर देंगे। गजेंद्र सिंह शेखावत, राज्यवर्धन सिंह राठौड़ और अर्जुन मेघवाल को आलाकमान का पसंदीदा माना जाता है। मुख्यमंत्री के बेटे को शिकस्त देकर गजेंंद्र सिंह शेखावत नायक बन कर उभरे हैं। आलाकमान उन्हें पार्टी का सूबेदार बनाना चाहते थे। पर वसुंधरा ने वीटो लगा दिया था। कहा तो यहां तक जा रहा है कि वसुंधरा चाहती ही नहीं थी कि शेखावत जीत जाएं। उनके क्षेत्र में वसुंधरा ने प्रचार भी नहीं किया।

शेखावत ने अपने आलाकमान तक यह पीड़ा पहुंचाई भी थी कि उन्हें एक नहीं दो मुख्यमंत्रियों का सामना करना पड़ रहा है। एक मौजूदा तो दूसरी पूर्व। लेकिन आरएसएस से जुड़ाव शेखावत के लिए संजीवनी साबित हुआ। वसुंधरा राजे को भी अब अपनी हकीकत का अहसास हो ही गया होगा। सो, आलाकमान से घिरने के बजाए अब वे अपना रवैया बदलने को मजबूर होंगी। करीबी बता रहे हैं कि अब उनकी चिंता अपने सांसद पुत्र दुष्यंत सिंह को केंद्र में मंत्री पद दिलाने की होगी। पिछली दफा तो उनके मुख्यमंत्री रहते आलाकमान ने बेटे को मंत्री बनाने से दो टूक इनकार कर दिया था। वक्त अच्छों-अच्छों को सबक सिखा देता है। लगता है कि वसुंधरा ने भी सबक सीखा है तभी तो आलाकमान का जय-जयकार शुरू कर दिया है।

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