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राजपाट: आस-निराश

पहले भरोसा दिया कि लोकसभा चुनाव निपटने के बाद करेंगे नियुक्तियां। चुनाव निपटे तो फिर चुप्पी साध गए। कभी बहाना बनाया कि आलाकमान से चर्चा नहीं हो पाई है।

Author Published on: January 18, 2020 4:57 AM
राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत। (एक्सप्रेस आर्काइव फोटोः रोहित जैन पारस)

अशोक गहलोत ज्यादा ही निष्ठुरता दिखा रहे हैं। मलाईदार पदों को बांटने को तैयार ही नहीं। जबकि सरकार बने सवा साल पूरा होने को आ गया। अपनी पार्टी का राज हो तो भला पार्टी के नेता और कार्यकर्ता सत्ता सुख भोगने के अरमान क्यों न संजोएं। ये अरमान तो वे भी संजोए बैठे हैं जो कम से कम विधानसभा के सदस्य तो हैं। मंत्री पद नहीं मिला तो किसी निगम की चेयरमैनी ही सही। पहले भरोसा दिया कि लोकसभा चुनाव निपटने के बाद करेंगे नियुक्तियां। चुनाव निपटे तो फिर चुप्पी साध गए। कभी बहाना बनाया कि आलाकमान से चर्चा नहीं हो पाई है।

अब पंचायत राज संस्थाओं के चुनाव आड़े आ गए। लाल बत्ती तो तब बंटे जब मंत्रिमंडल का विस्तार निपट जाए। निर्दलीय और बसपा से पार्टी में समाहित हुए विधायकों की बेचैनी भी तो बढ़ी है। उन्हें सरकार बनवाने और चलवाने का पुरस्कार चाहिए। ऐसे में गहलोत के लिए भी तो फैसला आसान नहीं। मंत्री तो 29 से ज्यादा हो नहीं सकते। मजबूरी में इन तेरह विधायकों को ही लालबत्ती वाले ओहदे देने पड़ गए तो क्या करेंगे? अपने कार्यकर्ताओं और नेताओं को तो सब्र ही रखना पड़ेगा।

निगम, बोर्ड और आयोग की कुर्सियां बांटने से पहले तो जिला स्तर की समितियों में भी खपा सकते हैं काफी लोगों को। चर्चा तो यही है कि इन समितियों में मनोनीत किए जाने वालों की सूची तो तैयार है। रही बात लालबत्ती बांटने की तो उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट की सिफारिशों को भी पूरी तरह नजर अंदाज नहीं कर पाएंगे। सबसे ज्यादा बेचैनी तो उन वरिष्ठ विधायकों को है, जो पहले की सरकारों में मंत्री रह चुके हैं।
(प्रस्तुति : अनिल बंसल)

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