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राजपाट: रंग चोखा ही चोखा

इक्का-दुक्का ही लखपती होता था। अब कोई अभागा ही होगा जो करोड़पति न हो।

Author Updated: October 5, 2019 4:18 AM
आदित्य ठाकरे (फाइल फोटोः FB/AadityaUThackeray)

गुरुवार को आदित्य ठाकरे का महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में अपनी पारिवारिक पार्टी शिवसेना के उम्मीदवार के तौर पर नामांकन पत्र दाखिल करना देशभर में चर्चा का विषय बना। वह भी दो कारणों से। एक तो यही कि ठाकरे परिवार का कोई सदस्य पहली बार चुनावी जंग में कूदा है। दूसरा कारण अहम है। आदित्य महज 29 साल के हैं और पहली बार चुनाव लड़ रहे हैं तो क्या हुआ? उनकी आर्थिक हैसियत देखकर किसे ईर्ष्या न होगी। इतनी छोटी सी उम्र में सोलह-सत्रह करोड़ की बताई है उन्होंने अपनी चल-अचल संपत्ति। व्यवसाय बताया है व्यापार। पर कौन सा व्यापार, यह किसी को नहीं पता। अलबत्ता पिछले साल की आमदनी जरूर बीस लाख से ज्यादा घोषित की है।

कार भी ठाकरे परिवार के इस दुलारे के पास बीएमडब्लू है। एक जमाने में विधायक और सांसद खुद को जनसेवक और गरीब बताते थे। इक्का-दुक्का ही लखपती होता था। अब कोई अभागा ही होगा जो करोड़पति न हो। पांच साल विधायक या सांसद रहते ही हैसियत पांच गुणा बढ़ जाती है। इनसे न आयकर वाले पूछते हैं और न प्रवर्तन निदेशालय के अफसर कि कमाई का जो गुर उन्हें आता है, वही बेरोजगारों को भी सिखा दें तो देश का कल्याण हो जाए। इतना तो साफ है कि अब राजनीति सेवा का नहीं बल्कि कमाई का जरिया हो चुकी है।

आजादी के बाद डाक्टर राजेंद्र प्रसाद देश के राष्ट्रपति बने तो सरकार से निर्धारित वेतन भी नहीं लिया। अभिजात्य परिवार से नाता होने के बावजूद सादगी, समर्पण और त्याग की भावना बेमिसाल थी। आज विधायक और सांसद दूसरी सुख-सुविधाओं के अलावा लाखों रुपए महीना वेतन और भत्ते पाते हैं। एक दिन भी किसी सदन के सदस्य रह लें तो ताउम्र पेंशन के हकदार हो जाते हैं। कई राज्यों में तो इन करोड़पति-अरबपति गरीबों का आयकर भी सरकारी खजाने से ही चुकाया जा रहा है। सरकारी कर्मचारी पैंतीस-चालीस साल सेवा देते हैं पर 2004 के बाद जो नौकरी में आए हैं, वे पेंशन के हकदार नहीं।

गरीब देश के स्वयंभू गरीब जनप्रतिनिधियों के बेशर्म आचरण पर कई बार शर्मिंदगी होती है। मसलन, गुरुवार को गांधी जी की 150वीं जयंती पर यूपी की विधानसभा का विशेष सत्र हुआ तो गांधी के संस्कारों को अपनाने के बजाए बरेली के भाजपा विधायक राजेश मिश्र ने अध्यक्ष से कहा कि उन्हें क्षेत्र में दौड़ना पड़ता है। सो, सरकार से कह कर फार्च्यूनर गाड़ी दिलाइए। अफसर भी तो सरकारी गाड़ियों में ही चलते हैं। इस मूर्खतापूर्ण मांग पर लजाने के बजाए सारे विधायकों ने ठहाके लगा कर अपने साथी का मनोबल बढ़ाया।

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