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राजपाट: मंझधार में नैया

मायावती एक तरफ से भाजपा और कांग्रेस से डरी हैं कि वे उनके दलित वोटों में सेंध मारने के फेर में हैं तो दूसरी तरफ भीम आर्मी जैसे नए उभर रहे दलित संगठन उनकी नींद उड़ा रहे हैं।

Author Updated: January 18, 2020 4:43 AM
बीएसपी सुप्रीमो मायावती (फोटो सोर्स- इंडियन एक्सप्रेस)

बसपा सुप्रीमो मायावती हताशा से उबर नहीं पा रही हैं। बुधवार को अपना जन्मदिन लखनऊ में मनाया। इससे पहले कई बार लखनऊ तो ज्यादातर देश की राजधानी में मनता था देश के सबसे बड़े सूबे की चार बार मुख्यमंत्री रह चुकीं दलित नेता का जन्मदिन। इस बार गौर करने वाला पहलू यह था कि समर्थकों ने उन्हें फिर सूबे का मुख्यमंत्री बनाने का संकल्प दोहराया। जबकि अतीत में उन्हें देश का प्रधानमंत्री बनाने के दावे होते थे। लंबे अरसे बाद मायावती को ऐसे दौर से गुजरना पड़ रहा है जब वे किसी भी सदन की सदस्य नहीं हैं। लोकसभा में 2014 में तो उनकी पार्टी का खाता भी नहीं खुल पाया था। इस बार गनीमत रही कि समाजवादी पार्टी से तालमेल कर चुनाव लड़ा तो दस सीटें मिल गईं। पर राज्यसभा में तो संख्या लगातार घट रही है।

उत्तर प्रदेश विधानसभा में भी अब गिनती के सदस्य हैं। पर हार से सबक लेकर कोई प्रभावी रणनीति अपनाने को तैयार नहीं। कभी बहुजन तो कभी सर्वजन के सहारे सत्ता के शिखर पर पहुंचने में सफल रहीं। पर मोदी और भाजपा के उभार ने उन्हें महज दलित वोटबैंक तक ही सीमित कर दिया। लोकसभा में पिछले सात महीने में पांच बार नेता बदल चुकी हैं। तय नहीं कर पा रहीं कि किन वर्गों को जोड़कर आगे बढ़ें। पहले दानिश अली को नेता बनाया। फिर उनकी जगह श्याम सिंह यादव को ले आर्इं। फिर यादव को हटा वापस दानिश अली को पद लौटाया। अब फिर दानिश अली की छुट्टी कर रितेश पांडेय को नेता बनाया है। दलील दी है कि एक मुसलमान मुनकाद अली यूपी बसपा के अध्यक्ष हैं तो दूसरा मुसलमान क्यों अहम पद रखे। पर इस दलील से तो रितेश पांडेय भी सही चयन नहीं ठहरते क्योंकि एक ब्राह्मण सतीश मिश्र राज्यसभा में पार्टी के नेता हैं तो दूसरे सदन में भी ब्राह्मण क्यों?

मायावती एक तरफ से भाजपा और कांग्रेस से डरी हैं कि वे उनके दलित वोटों में सेंध मारने के फेर में हैं तो दूसरी तरफ भीम आर्मी जैसे नए उभर रहे दलित संगठन उनकी नींद उड़ा रहे हैं। दलितों में उभर रहे युवा वर्ग को अब मायावती के रहन-सहन की राजसी शैली, जमीनी संघर्ष से परहेज, दलितों के हितों के बजाए अपनी सियासी महत्वाकांक्षा के लिए मौकापरस्ती और धन-दौलत की भूख कतई नहीं भा रही। किससे छिपा है कि वे पार्टी कार्यकर्ताओं से मुलाकात का भी शुल्क वसूलती हैं। टिकट बेचती हैं और किसी भी सवाल पर स्पष्ट फैसला करने से कतराती हैं। मुसलमानों के बिना जीत नहीं पातीं पर उन पर भरोसा भी करने को तैयार नहीं। याद कीजिए इस पार्टी के संस्थापक कांशीराम को। जिन्होंने मेहनत और तिकड़म से बसपा को राष्ट्रीय पार्टी बनाया था। अब हाल यह है कि बाकी राज्यों को तो छोड़ ही दें, यूपी तक में पार्टी अपने पांव ठीक से नहीं जमा पा रही।

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