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राजपाट: भस्मासुरों की जमात

पिछले दिनों देहरादून के गांधी पार्क में हरीश रावत ने तीन घंटे का उपवास किया था। लेकिन न इंदिरा दिखीं और प्रीतम सिंह। अलबत्ता प्रीतम सिंह ने भी केंद्र की मोदी सरकार के खिलाफ अगले ही दिन अपने धरने का आयोजन किया।

Author May 25, 2019 5:00 AM
प्रियंका गांधी और राहुल गांधी (फोटो सोर्स: इंडियन एक्सप्रेस)

गुटबाजी ने उत्तराखंड में कांग्रेस का फिर सूपड़ा साफ कर दिया। मोदी की सुनामी में लोकसभा की पांचों सीटों पर भाजपा ने ही 2014 की तरह फिर परचम फहराया। एक तो सूबे में पार्टी की सत्ता ठहरी। ऊपर से कांग्रेस के नेताओं की अंदरूनी गुटबाजी। सो, खाता भी नहीं खुल पाया। और तो और नैनीताल में भी पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत नहीं जीत पाए। हरीश रावत, पार्टी के सूबेदार प्रीतम सिंह और विधायक दल की नेता इंदिरा हृदेश की आपसी लड़ाई सूबे में किसी से नहीं छिपी।

पिछले दिनों देहरादून के गांधी पार्क में हरीश रावत ने तीन घंटे का उपवास किया था। लेकिन न इंदिरा दिखीं और प्रीतम सिंह। अलबत्ता प्रीतम सिंह ने भी केंद्र की मोदी सरकार के खिलाफ अगले ही दिन अपने धरने का आयोजन किया। जिससे हरीश रावत खेमे को दूर रहना ही था। इंदिरा हृदेश ने तो हरीश रावत को नसीहत भी दे डाली कि आर्इंदा कोई आंदोलन करें तो संगठन को सूचना दें और विश्वास में लें। समानांतर संगठन चलाने की कोशिश करके अपने सियासी बुढ़ापे को खराब न करें। हरीश रावत भी चुप रहने वाले कहां थे। तपाक से पलटवार कर दिया कि वे पहले अपने बुढ़ापे की चिंता करें।

दरअसल हल्द्वानी नगर निगम के मेयर के चुनाव में बेटे सुमित की पिछले दिनों हुई हार के पीछे इंदिरा हृदेश को हरीश रावत का हाथ दिखता है। इसलिए कहा जा रहा है कि लोस चुनाव में बदले के लिए रावत का अंदरखाने उन्होंने जमकर विरोध किया। पार्टी विरोध में काम करने का आरोप हरीश रावत पर भी है। टिहरी में प्रीतम सिंह और हरिद्वार में अमरीश कुमार यही रोना रो रहे हैं। जहां गुटबाजी का ऐसा आलम हो, वहां अपने पांव जमाने के लिए आलाकमान को ज्यादा कुछ करने की जरूरत ही कहां पड़ी।

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