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राजपाट: बदलते रिश्ते

प्रदेश भाजपा अध्यक्ष का पद भी अब खाली है। इस पद के लिए केंद्रीय नेतृत्व ऐसे नेता की तलाश में है जो पांच साल बाद वसुंधरा का विकल्प बन सकें। मदन लाल सैनी के निधन से खाली हुए प्रदेश अध्यक्ष के पद पर युवा नेता को जिम्मा देने की तैयारी चल रही है। इ

Author July 6, 2019 7:06 AM
वसुंधरा राजे ने अपने पूरे पांच साल के शासन में केंद्रीय नेतृत्व को बौना समझा।

राजस्थान में विधानसभा चुनाव की हार और फिर लोकसभा चुनाव में भारी जीत के बाद भाजपा के नेताओं के रिश्तों में भी बड़ा बदलाव आ गया है। प्रदेश में पहले भाजपा में वसुंधरा राजे का एकछत्र राज होता था अब वो बदल गया है। भाजपा में पहले वसुंधरा के इर्द-गिर्द रहने की नेताओं में होड़ लगी रहती थी। पर अब उनसे दूरी बना कर चलने में ही भलाई समझी जा रही है। वसुंधरा राजे ने अपने पूरे पांच साल के शासन में केंद्रीय नेतृत्व को बौना समझा और मनमर्जी के फैसले करती रही। विधानसभा की हार का ठीकरा प्रदेश में राजे की कार्यशैली को ही जाता है।

इस चुनाव के ठीक छह महीने बाद हुए लोकसभा चुनाव में उसी जनता ने भाजपा को पहले से भी ज्यादा वोटों के अंतर से जिता दिया। इससे ही साबित हो गया कि राजे के कारण ही विधानसभा चुनाव में हार हुई थी। इसके बाद तो केंद्रीय नेतृत्व ने भी चुन-चुन कर राजे के विरोधियों को दमदार पदों पर बैठाने की मुहिम चला दी। इसमें सांसद गजेंद्र सिंह शेखावत को केंद्र में कैबिनेट मंत्री और ओम बिरला को लोकसभा अध्यक्ष जैसे सम्मानजनक और बड़े पद पर बैठाना भी शामिल है। इन दो नियुक्तियों ने ही वसुंधरा राजे के समर्थकों में हलचल मचा दी।

प्रदेश भाजपा अध्यक्ष का पद भी अब खाली है। इस पद के लिए केंद्रीय नेतृत्व ऐसे नेता की तलाश में है जो पांच साल बाद वसुंधरा का विकल्प बन सकें। मदन लाल सैनी के निधन से खाली हुए प्रदेश अध्यक्ष के पद पर युवा नेता को जिम्मा देने की तैयारी चल रही है। इसमें विधायक सतीश पूनिया के साथ ही पूर्व अध्यक्ष और मंत्री रहे अरुण चतुर्वेदी व विधायक मदन दिलावर के नाम सबसे आगे हैं। ये तीनों ही संघ से जुड़े हुए हैं और वसुंधरा के विरोधी खेमे के माने जाते हैं। भाजपा में भी माना जा रहा है कि नया अध्यक्ष ही भविष्य में मुख्यमंत्री की दौड़ में नंबर एक साबित होगा। इसके चलते ही इन दिनों वसुंधरा राजे के दरबार में सन्नाटा पसर गया है।

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