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राजपाट: कहीं पे निशाना

पांच-छह साल पहले तक नीतीश के साथ छाया की तरह रहने वाले उपेंद्र कुशवाहा अपनी इस खीझ को बाहर आने से रोक नहीं पाते। समता पार्टी के दौर से नीतीश और कुशवाहा साथ थे। दोनों सिर्फ साथ ही नहीं रहे बल्कि कुशवाहा ने नीतीश को ताकतवर और लोकप्रिय बनाने में कोई कसर ही नहीं छोड़ी।

Author July 28, 2018 6:09 AM
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (एक्सप्रेस आर्काइव फोटो)

बिहार की सत्ता में सबसे ज्यादा समय तक बने रहने का नीतीश कुमार ने रिकार्ड बनाया है। बिहार में इतने लंबे समय तक पहले कभी कोई मुख्यमंत्री नहीं रहा। नीतीश के लिए बेशक यह एक सुखद अनुभव है पर विरोधियों को तो इससे खीझ ही होती होगी। भले वे अपनी खीझ को बाहर न झलकने दें। पांच-छह साल पहले तक नीतीश के साथ छाया की तरह रहने वाले उपेंद्र कुशवाहा अपनी इस खीझ को बाहर आने से रोक नहीं पाते। समता पार्टी के दौर से नीतीश और कुशवाहा साथ थे। दोनों सिर्फ साथ ही नहीं रहे बल्कि कुशवाहा ने नीतीश को ताकतवर और लोकप्रिय बनाने में कोई कसर ही नहीं छोड़ी।

यह बात अलग है कि बाद में दोनों में अनबन हुई तो नीतीश ने उनकी उपेक्षा शुरू कर दी। कुशवाहा भी चूकने वाले नहीं थे। अपनी अलग पार्टी रालोसपा बना कर नीतीश को चुनौती दे डाली। पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा ने उनसे तालमेल भी कर लिया और चार सीटें उन्हें थमा दी। चार सीटों पर उनके उम्मीदवार जीत भी गए। नतीजतन खुद कुशवाहा मोदी सरकार में मंत्री बने हुए हैं। जबसे भाजपा और नीतीश का गठबंधन हुआ है, कुशवाहा राजग में घुटन महसूस कर रहे हैं। पटना में गुस्सा जुबान पर भी आ गया। बोल दिया कि नीतीश कुमार को अब खुद मुख्यमंत्री पद से हट जाना चाहिए। सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने का रिकार्ड बन गया है तो अब किसी और को मौका क्यों नहीं देते? एक तरह से दोधारी तलवार का इस्तेमाल किया कुशवाहा ने इस बयान के जरिए।

सकारात्मक नजरिए से सोचें तो नीतीश को प्रधानमंत्री पद की होड़ में शामिल होने का सुझाव दे दिया। नकारात्मक नजरिया हो तो लगेगा जैसे किसी दूसरे पिछड़े नेता के लिए अब मुख्यमंत्री पद छोड़ने की नसीहत दी हो। खुद भी तो वे पिछड़े तबके के ही नेता ठहरे। तो क्या उनकी अपनी ख्वाहिश है सूबे का मुख्यमंत्री बनने का। कौन समझाए कि जमाना बदल चुका है। पहले सियासत कुर्सी के लिए नहीं होती थी। पर अब तो कुर्सी ही लक्ष्य है। नीतीश भी कुर्सी की राजनीति से अलग नहीं हैं तो फिर कुशवाहा की नसीहत की परवाह क्यों करें?

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