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राजपाट: बनते-बिगड़ते रिश्ते

रामदेव अब योग गुरु से बिजनेस गुरु बन चुके हैं। सो, नाराजगी के बावजूद अभी मोदी सरकार पर ज्यादा नुक्ताचीनी नहीं कर रहे। रही बात सूबों की भाजपा सरकारों की तो जब उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में ही सरकारी स्तर पर कोई तवज्जो नहीं मिल रही तो बाकी सूबों का तो ईश्वर मालिक।

Author July 28, 2018 2:33 AM
योग गुरु बाबा रामदेव और पीएम नरेंद्र मोदी (फाइल फोटो)

योग गुरु रामदेव भी अब सियासी दांव-पेच में पारंगत हो गए लगते हैं। प्रधानमंत्री के प्रति अब पहले जैसा भक्तिभाव प्रदर्शित नहीं कर रहे। जबकि 2014 के चुनाव से पहले तो वे मोदी का गुणगान करने में कोई कसर नहीं छोड़ते थे। देशभर में घूम कर यूपीए सरकार का विरोध और मोदी का परचम लहरा रहे थे। चुनाव से छह महीने पहले ही हरिद्वार के अपने आश्रम में मोदी को बुला कर साधू-संतों के बीच देश का भावी प्रधानमंत्री घोषित किया था। लोकसभा चुनाव में अपने चंपुओं के लिए टिकट तो ज्यादा चाहे थे पर मोदी ने दिए थोड़े ही। चुनाव के बाद मोदी ने रामदेव के संकल्प पूर्ति समापन समारोह से भी किनारा ही कर लिया था। और तो और मोदी के शपथ ग्रहण समारोह का निमंत्रण तक नहीं मिला था उन्हें।

सो, नाराजगी में वे गए भी नहीं। पतंजलि योग पीठ का रुख भी मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के तीन साल बाद बमुश्किल किया। लगता है कि रामदेव आहत हैं। इसीलिए वे अब खुद मोदी से पहले की तरह निकटता नहीं जता रहे। अलबत्ता मुलायम, लालू और अखिलेश की जरूर गाहे-बगाहे तारीफ करते रहते हैं। अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर रामदेव ने वसुंधरा राजे के सौजन्य से कोटा में योग शिविर लगाया। जिसमें नेहरू, इंदिरा, सोनिया और राहुल गांधी की तारीफ करने से नहीं चूके। फरमाया कि सोनिया और राहुल भी योग करते हैं और दोनों से उनके करीबी रिश्ते भी ठहरे।

इस गुनाह के नतीजे भी जल्दी ही सामने आ गए। पतंजलि मेगा फूड पार्क के उत्पादों पर अब सरकारी महकमे जीएसटी के चक्कर में नोटिसबाजी कर रहे हैं। रामदेव अब योग गुरु से बिजनेस गुरु बन चुके हैं। सो, नाराजगी के बावजूद अभी मोदी सरकार पर ज्यादा नुक्ताचीनी नहीं कर रहे। रही बात सूबों की भाजपा सरकारों की तो जब उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में ही सरकारी स्तर पर कोई तवज्जो नहीं मिल रही तो बाकी सूबों का तो ईश्वर मालिक। ऐसे में अगले लोकसभा चुनाव में रामदेव की भूमिका का अभी से कोई आकलन करना ठीक नहीं।

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