ताज़ा खबर
 

राजपाट और सियासत की उठापटक

आलाकमान को अंदाज है कि वसुंधरा खेमे की ज्यादा अनदेखी पार्टी को नुकसान पहुंचा सकती है। जल्दी ही सूबे में विधानसभा की चार सीटों का उपचुनाव होगा।

Rajpaat, politicsराजस्थान पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा नेता वसुंधरा राजे तथा उत्तराखंड के सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत।

बदलते रिश्ते
वसुंधरा राजे की सक्रियता ने राजस्थान भाजपा की सियासत को अचानक गरमा दिया है। वे जयपुर में हुई प्रदेश भाजपा की कोर समिति की बैठक में शिरकत के लिए मंगलवार को दिल्ली से पहुंची। हवाई या रेल मार्ग से नहीं। वे जानबूझकर सड़क मार्ग से गई। रास्ते में जगह-जगह समर्थकों ने स्वागत किया। परोक्ष रूप से शक्ति प्रदर्शन और लोकप्रियता की जांच मकसद होगा। तीन महीने से दिल्ली में थी। यहां तक कि जनवरी में हुई कोर समिति की बैठक में नहीं पहुंची थी। जयपुर में कोर समिति की बैठक में प्रभारी महासचिव अरुण सिंह ने संगठन की एकजुटता का पाठ पढ़ाया। वे नए-नए प्रभारी बने हैं। कर्नाटक का प्रभार भी उन्हीं के जिम्मे है। संयोग से कर्नाटक की तरह ही राजस्थान में भी पार्टी गुटबाजी और अंतरकलह की शिकार है।

वसुंधरा को 2018 की हार के बाद आलाकमान ने हाशिए पर पहुंचा दिया था। सतीश पूनिया को सूबेदार उनकी इच्छा के विपरीत बनाया गया था। गनीमत रही कि विधायक दल के नेता गुलाबचंद कटारिया पार्टी के पुराने नेता और वसुंधरा से तालमेल रखने वाले इंसान हैं। पर वसुंधरा जान चुकी हैं कि अब आलाकमान 76 वर्ष के कटारिया को उनकी बुजुर्ग अवस्था का वास्ता देकर पद से हटा सकता है। लिहाजा वे और उनके समर्थक मुखर हुए हैं। इस दौरान सूबे में भाजपा के भीतर कई घटनाएं घटी। एक तरफ वसुंधरा खेमे के बीस विधायकों ने सूबेदार सतीश पूनिया को पत्र लिखकर सदन के भीतर अपनी अनदेखी की शिकायत की।

दूसरी तरफ कोटा में उनके समर्थकों ने एक चिंतन बैठक आयोजित कर डाली। पूर्व विधायक भवानी सिंह राजावत और प्रहलाद गुंजन ने मांग कर दी कि वसुंधरा को पार्टी का अगले चुनाव का मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित किया जाए। वे सर्वमान्य नेता हैं। उनका कोई विकल्प नहीं है। इसे आलाकमान ने अनुशासनहीनता का रिहर्सल समझा और कोर समिति की बैठक में अरुण सिंह ने चेतावनी दी कि संगठन से कोई भी खुद को ऊपर न समझे। आलाकमान को अंदाज है कि वसुंधरा खेमे की ज्यादा अनदेखी पार्टी को नुकसान पहुंचा सकती है। जल्दी ही सूबे में विधानसभा की चार सीटों का उपचुनाव होगा। अरुण सिंह ने आलाकमान की इस उपचुनाव को एकजुट होकर लड़ने की मंशा से गुटों में बंटे नेताओं को अवगत करा दिया।

इस बीच वसुंधरा राजे के समर्थक आठ मार्च को उनके जन्मदिन के बहाने भी शक्ति प्रदर्शन की योजना बना रहे हैं। वसुंधरा खुद कह चुकी हैं कि यह गोवर्धन परिक्रमा का कार्यक्रम होगा, कोई सियासी जलसा नहीं। कार्यक्रम भरतपुर में रखा गया है। सियासी गलियारों में चर्चा है कि वसुंधरा खेमा अब पार्टी की निर्णय प्रक्रिया में अपनी भागीदारी चाहता है। आलाकमान के सामने भी ज्यादा विकल्प है नहीं। यानी या तो उन्हें पार्टी की सूबेदारी सौंपनी होगी या फिर नेता प्रतिपक्ष का पद।

चिराग तले अंधेरा
चिराग पासवान तय नहीं कर पा रहे कि भविष्य में कौन सी रणनीति अपनाई जाए। भाजपा तो नीतीश कुमार की नाराजगी के डर से अब लोजपा को राजग की बैठकों में भी नहीं बुला रही। लोजपा की इकलौती विधान परिषद सदस्य नूतन सिंह को भी तोड़ लिया। पिछले दिनों कुल 208 नेताओं ने लोजपा छोड़ जद (एकी) का झंडा थाम लिया था। इस पर चिराग ने कहा था कि केशव सिंह तो पार्टी से निकाले जा चुके थे।

चर्चा तो चिराग और उनके सांसद चाचा पशुपति कुमार पारस के बीच मतभेद बढ़ जाने की भी है। जो शुरू से नीतीश विरोध की रणनीति के समर्थक नहीं थे। पार्टी के कई नेता अब मान रहे हैं कि 37 वर्षीय चिराग ने पिता जैसी सियासी परिपक्वता नहीं दिखाई और उनके अति आत्मविश्वास के कारण पार्टी की लुटिया डूब गई। तो भी चिराग ने अब दलित और सवर्ण वोट बैंक की सियासत में हाथ आजमाने का खाका खींचा है। पूर्व विधायक राजू तिवारी को बिहार प्रदेश लोजपा का कार्यकारी अध्यक्ष इसी रणनीति के हिसाब से बनाया है। फिलहाल तो उनकी सबसे बड़ी चुनौती अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं को पार्टी में बनाए रखने की है।

बेफिक्र नहीं त्रिवेंद्र
विधानसभा चुनाव में अब बस एक वर्ष बचा है। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के सामने पार्टी आलाकमान का विश्वास बनाए रखने की बड़ी चुनौती है। कांग्रेस से भाजपा में आए नेता ही नहीं, भाजपा की रावत विरोधी लाबी भी अंदरखाने सूबे में नेतृत्व परिवर्तन के लिए लाबिंग कर रही है। विरोधियों ने उनके बारे में हवा बनाई है कि वे अगला चुनाव नहीं जिता पाएंगे। महाराष्टÑ के राज्यपाल और पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी को चुनाव से पहले सरकार की कमान सौंपने का सुझाव देने वालों की भी कमी नहीं।

हालांकि वे अब 80 के होने को हैं। लेकिन भाई लोग अब कर्नाटक के येदियुरप्पा का उदाहरण दे उम्र सीमा का कोई घोषित फार्मूला न होने की दुहाई दे रहे हैं। चमोली की प्राकृतिक आपदा से निपटने में त्रिवेंद्र सिंह रावत की सरकार ने कोई ढिलाई नहीं बरती। पिछले दिनों दिल्ली के दौरे में प्रधानमंत्री से भी मिले। आलाकमान और उनके बीच क्या बातचीत हुई, इसका कोई खुलासा करने के बजाए वापस देहरादून पहुंचकर उन्होंने आत्मविश्वास के साथ कहा कि वे अपने मंत्रिमंडल का जल्द विस्तार करेंगे। -(प्रस्तुति : अनिल बंसल)

Next Stories
1 प्रीतम सिंह : वैश्विक भारतीयों में शुमार सिंगापुर में विपक्ष के नेता
2 राजपाट: बदलते रिश्ते और संतों की सियासत
3 राजपाट: सियासी चर्चा और लोकतंत्र
IPL Live Streaming
X