सियासत में उतार-चढ़ाव, समय के फेर में बदल गई किस्मत

पिछले हफ्ते येदियुरप्पा की दिल्ली दरबार में पेशी हुई थी। वे प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के साथ-साथ पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा से भी मिले थे। तभी उन्हें ठीक से समझा दिया गया था कि अब न तो उनकी हेकड़ी चल पाएगी और न वे पार्टी को दबाव में ले पाएंगे। वहीं उन्होंने सहमति दे दी थी कि वे 26 जुलाई को दे देंगे इस्तीफा।

Rajpaat, Jansatta story
कर्नाटक के सीएम बीएस येदियुरप्पा और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत।

हेकड़ी फुर्र
एस येदियुरप्पा की कर्नाटक के मुख्यमंत्री पद से विदाई अब तय लगती है। बस घोषणा का इंतजार है। घोषणा खुद येदियुरप्पा की इच्छा के अनुसार ही 26 जुलाई को होने की संभावना हैै। मुख्यमंत्री के रूप में येदियुरप्पा के 25 जुलाई को दो वर्ष पूरे हो जाएंगे। भाजपा की अघोषित नीति के हिसाब से तो वे मुख्यमंत्री हो ही नहीं सकते थे। जब से मोदी-शाह का दौर शुरू हुआ है, भाजपा में पचहत्तर पार का कोई नेता न मंत्री बना है और न मुख्यमंत्री। येदियुरप्पा दो वर्ष पहले भी इस उम्र सीमा को पार कर चुके थे। इस नाते उन्हें मुख्यमंत्री बनाने के मूड में पार्टी आलाकमान था ही नहीं। पर कांग्रेस-जद (एस) गठबंधन की सरकार को गिराने और अपनी सरकार बनाने के लिए बहुमत के जुगाड़ की कुव्वत येदियुरप्पा में ही थी।

लिहाजा आलाकमान ने एक तरह से उनके आगे समर्पण कर दिया था। हालांकि सरकार और संगठन में उनके बेटों की बढ़ती हैसियत और हस्तक्षेप को लेकर पार्टी के भीतर ही विरोध पिछले एक वर्ष से तो मुखर हो गया था। ऊपर से अब संघ परिवार और भाजपा आलाकमान दोनों ही जगह कर्नाटक के येदियुरप्पा विरोधी पार्टी खेमे का हस्तक्षेप बढ़ा है। दत्तात्रेय होसबोले आरएसएस के सरकार्यवाह हैं तो बीएल संतोष भाजपा के महासचिव (संगठन)। पिछले हफ्ते येदियुरप्पा की दिल्ली दरबार में पेशी हुई थी। वे प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के साथ-साथ पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा से भी मिले थे। तभी उन्हें ठीक से समझा दिया गया था कि अब न तो उनकी हेकड़ी चल पाएगी और न वे पार्टी को दबाव में ले पाएंगे। वहीं उन्होंने सहमति दे दी थी कि वे 26 जुलाई को दे देंगे इस्तीफा। यह बात अलग है कि बाहर निकलने के बाद उन्होंने खुद को पद से हटाए जाने की संभावना को नकार दिया था।

बंगलुरु पहुंचने के बाद लिंगायत समुदाय के उनके हितैषी साधु संतों ने भले उनके समर्थन में पार्टी को दबाव में लेने की कोशिश की हो पर गुरुवार को उनके तेवर ढीले पड़ गए। फरमाया कि आलाकमान जब कहेगा वे अपना पद छोड़ देंगे। अब तो अपने बेटों की चिंता है उन्हें। आलाकमान से भी बेटों के सियासी भविष्य को सुरक्षित रखने का भरोसा चाहा था उन्होंने। एक बेटा बीवाई विजयेंद्र कर्नाटक भाजपा का उपाध्यक्ष है तो दूसरा बीवाई राघवेंद्र लोकसभा सदस्य। उनकी इच्छा कितनी पूरी करेगा आलाकमान, यह तो वक्त ही बताएगा।

धूमल हुए सक्रिय
आगामी दिनों में हमीरपुर संसदीय हलके में कोई चुनाव भी नहीं है। न विधानसभा हलके के हैं और न ही संसदीय हलके के। लेकिन भाजपा के वरिष्ठ नेता व पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल पिछले एक अरसे से सबसे ज्यादा सक्रिय हैं। आलाकमान ने 2017 के चुनाव में उनका चुनावी हलका ही बदल दिया गया था। उन्हें हमीरपुर के बजाय सुजानपुर से टिकट दिया गया था। वह वहां से हार गए और मुख्यमंत्री भी नहीं बन पाए थे। तब से उन्हें हाशिए पर धकेल दिया गया। लेकिन वक्त बदला और भाजपा के प्रदेश प्रभारी भी बदल गए। तब से हमीरपुर की राजनीति में वह ऐसे सक्रिय हुए कि सुजानपुर कांग्रेस में ही उन्होंने सेंध लगा दी है। आए दिन सुजानपुर कांग्रेस के नेता उनके हमीरपुर वाले घर आते हैं, वहां रखे भाजपा के पटके उठाते हैं और अपने गले में डाल कर भाजपा में शामिल हो जाते हैं। जब से उनके बड़े पुत्र अनुराग ठाकुर का मोदी मंत्रिमंडल में रुतबा बढ़ा है और वह कैबिनेट मंत्री बने हैं तब से यह चलन ज्यादा बढ़ गया है। कभी किसी पंचायत के तो कभी किसी गांव के लोग उनके घर में आकर भाजपा में शामिल हो जाते हैं। सुजानपुर भाजपा की ओर से इस बाबत भी खूब प्रचार किया जा रहा है। अब तो पुत्र भी देश के प्रचार मंत्री बन गए हैं।

उधर दूसरी तरफ जिन हलकों में आगामी दिनों में उप चुनाव होने हैं वहां न कोई प्रचार कर रहा है और न ही कोई भाजपा में शामिल हो रहा है। रोजाना कोई न कोई बागी जरूर खड़ा हो जाता है। भाजपाइयों की माने तो जितने ज्यादा सक्रिय हमीरपुर में धूमल हैं उतने तो मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर और भाजपा अध्यक्ष सुरेश कश्यप जिन हलकों में उप चुनाव होने हैं, वहां भी नहीं हैं। अब ये धूमल ही जाने कि उनकी ये सक्रियता 2022 के चुनाव जीतने के लिए है या फिर किसी को सियासत का पाठ सिखाने के लिए हैं।

फिर जीता दिल
आखिरकार कांग्रेस उत्तराखंड में पूर्व मुख्यमंत्री और दिग्गज नेता हरीश रावत के चेहरे पर विधानसभा का 2022 का चुनाव लड़ेगी। हरीश रावत को सोनिया गांधी ने उत्तराखंड कांग्रेस की चुनाव संचालन समिति का मुख्य संयोजक बना कर यह साफ कर दिया है कि हरीश रावत पर कांग्रेस हाईकमान को पूरा भरोसा है। जिस तरह से हरीश रावत ने पंजाब कांग्रेस का प्रभारी रहते हुए वहां कांग्रेस के संकट का समाधान किया उससे हरीश रावत का राजनीतिक कद पार्टी हाईकमान के सामने बहुत बढ़ गया है। इतना ही नहीं कांग्रेस हाईकमान ने उत्तराखंड के प्रदेश अध्यक्ष पद पर हरीश रावत के खासमखास गणेश गोदियाल की ताजपोशी कर दी गई। वे मौजूदा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रीतम सिंह की जगह लेंगे। प्रीतम सिंह को नेता प्रतिपक्ष बनाया गया है। नेता प्रतिपक्ष का पद इंदिरा ह्रदयेश की मौत के बाद खाली हुआ था। प्रीतम सिंह को संतुष्ट करने के लिए पार्टी ने पंजाब की तर्ज पर उत्तराखंड में भी पार्टी के चार कार्यकारी अध्यक्ष बनाए हैं। उनमें से तीन कार्यकारी अध्यक्ष प्रीतम सिंह खेमे के हैं।

प्रदेश कांग्रेस कमेटी और उसकी विभिन्न कमेटियों में हरीश रावत समर्थकों को ही ज्यादा महत्व दिया गया है। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में भी पार्टी ने हरीश रावत को मुख्यमंत्री का चेहरा बनाकर चुनाव लड़ा था परंतु हरीश रावत खुद दो विधानसभा क्षेत्रों से चुनाव हार गए थे और कांग्रेस 11 सीटों पर सिमट गई थी। इसके बावजूद पार्टी हाईकमान में 2022 के विधानसभा चुनाव में भी हरीश रावत पर ही ज्यादा भरोसा जताया है और मुख्य संयोजक बनाकर साबित कर दिया है कि हरीश रावत की उत्तराखंड के सबसे कद्दावर नेता हैं। अपनी मधुर और मिलनसार राजनीति छवि के कारण हरीश रावत ने पार्टी हाईकमान का दिल फिर से एक बार जीता है।
(संकलन : मृणाल वल्लरी)

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