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चुनावी माहौल और सियासी उम्मीदें

त्रिस्तरीय पंचायती चुनाव में लगभग आठ लाख पदों के लिए 13 लाख उम्मीदवार थे। उत्तर प्रदेश भाजपा ने जिला पंचायत वार्ड सदस्यों के लिए उम्मीदवारों की घोषणा की थी। नतीजों के मुताबिक इनमें से दो हजार सीटों पर भाजपा समार्थित उम्मीदवारों को हार मिली है। खास तौर पर अयोध्या और वाराणसी की सीटों पर भाजपा समर्थित उम्मीदवारों को हार का मुंह देखना पड़ा है।

सपा नेता अखिलेश यादव और मेट्रो मैन ई. श्रीधरन।

पंचायती प्रभाव
रोना महामारी की दूसरी लहर के बीच जब स्वास्थ्य ढांचे को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार सवालों के कठघरे में थी तभी पंचायत चुनावों की प्रक्रिया और उसके नतीजों ने भी सूबे की सियासत के लिए खराब संदेश दिए। हालांकि ये चुनाव पार्टी के चुनाव निशान पर नहीं जीते गए थे इसलिए किसी राजनीतिक दल की हार या जीत का सटीक आकलन नहीं किया जा सकता है। लेकिन नतीजों के बाद सबसे ज्यादा खुश समाजवादी पार्टी है। सपा के नेता और कार्यकर्ता दावा कर रहे हैं कि पंचायत चुनावों में उनके उम्मीदवारों ने बाजी मारी है और वे इन नतीजों से उत्साहित होकर आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों में जुट जाएंगे।

त्रिस्तरीय पंचायती चुनाव में लगभग आठ लाख पदों के लिए 13 लाख उम्मीदवार थे। उत्तर प्रदेश भाजपा ने जिला पंचायत वार्ड सदस्यों के लिए उम्मीदवारों की घोषणा की थी। नतीजों के मुताबिक इनमें से दो हजार सीटों पर भाजपा समार्थित उम्मीदवारों को हार मिली है। खास तौर पर अयोध्या और वाराणसी की सीटों पर भाजपा समर्थित उम्मीदवारों को हार का मुंह देखना पड़ा है। आम तौर पर भाजपा की छवि शहरी पार्टी की रही है और वह पंचायत चुनावों में सीधे उतरने से परहेज भी करती रही है। इस बार हालात यह है कि समाजवादी पार्टी दावा कर रही है कि उसने भाजपा को मात दे दी है, हालांकि जीत का सटीक आंकड़ा उनके पास भी नहीं है। पंचायत चुनाव में चुनावकर्मियों की बीमारी और मौत की बड़ी संख्या पर भी सवाल उठाए गए थे और कहा गया कि महामारी के समय में इतने बड़े स्तर पर चुनाव करवाने का कोई औचित्य नहीं है। चुनावों के बाद कई जगहों पर हुई हिंसा भी उत्तर प्रदेश प्रशासन के लिए चुनौती बनकर उभरी है। देखना है कि आगे इन नतीजों का क्या प्रभाव पड़ता है।

उलटा दांव
उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत उर्फ हरदा अपने शिष्य रणजीत सिंह रावत को पटखनी देने के चक्कर में अपना राजनीतिक नुकसान उठा बैठे और सल्ट के विधानसभा उपचुनाव में अपने शिष्य को शिकस्त देने के लिए अपनी नजदीकी गंगा पंचोली को चुनाव में झोंक कर खुद का तो नुकसान किया ही, साथ ही पंचोली का नुकसान भी कर दिया। रावत ने हाईकमान पर दबाव डालकर उनका टिकट कटवा कर पंचोली का टिकट करवा दिया। जहां 2017 के विधानसभा चुनाव में गंगा पंचोली अपने विरोधी भाजपा उम्मीदवार सुरेंद्र सिंह जीना के हाथों केवल 25 वोटों से हारी थी इस बार भी जीना के भाई महेंद्र सिंग जीना के हाथों 47 सौ वोटों से हार गई। उनकी हार का फासला बढ़ा जबकि रावत ने उन्हें जिताने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रखा था। दिल्ली एम्स से कोविड-19 का इलाज कराने के बाद रावत सीधे सल्ट विधानसभा गए और जनता से पंचोली को जिताने की भावुक अपील की थी। लेकिन उनकी अपील को जनता ने हवा में उड़ा दिया।

दरअसल रणजीत सिंह रावत इस सीट पर खुद ही अपने बेटे को चुनाव लड़वाना चाहते थे जिसका हरीश रावत ने जमकर विरोध किया। हरीश रावत को पटखनी देने के लिए उनके चेहरे रणजीत सिंह रावत ने पंचोली का खुलेआम विरोध किया जिससे वह बुरी तरह हार गई हरीश रावत पंचोली को चुनाव जीता कर 2022 के विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री के रूप में अपना दावा ठोकना चाहते थे। लेकिन उनके लिए सल्ट विधानसभा चुनाव में गंगा पंचोली पर दांव लगाना उल्टा पड़ा। 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस हाईकमान ने हरीश रावत को मुख्यमंत्री के चेहरे के रूप में पेश किया था जिससे कांग्रेस की दुर्गति हुई और कांग्रेस 11 सीटों पर सिमट कर रह गई। उत्तराखंड की जनता ने हरीश रावत के चेहरे को नकार दिया था। पिछले दिनों हरीश रावत ने पार्टी हाईकमान से मांग की थी कि विधानसभा के 2022 के चुनाव में कांग्रेस मुख्यमंत्री का चेहरा पेश करे। इसके पीछे हरीश रावत खुद मुख्यमंत्री के चेहरे के रूप में आना चाहते थे परंतु सल्ट विधानसभा के उपचुनाव ने उनके मंसूबों पर पानी फेर दिया।

विकास पुरुष की हार
चुनाव में जीत-हार चलती ही रहती है। बड़े जनाधार वाले नेता भी अचानक से चुनावी मैदान में धराशायी कर दिए जाते हैं। लेकिन राजनीतिक बड़बोलेपन की खिंचाई तो होती है। तकनीक और विकास की दुनिया में जिन्हें ‘मेट्रो मैन’ का खिताब दिया गया था अचानक से उन्होंने खुद को केरल के मुख्यमंत्री के रूप में पेश किए जाने की इच्छा जता दी थी। भाजपा में शामिल होने के बाद केरल के पलक्कड़ सीट से प्रत्याशी ई श्रीधरन ने कहा था कि अगर भाजपा उन्हें केरल के मुख्यमंत्री के रूप में सामने लाएगी तो वो सहर्ष तैयार होंगे। श्रीधरन कांग्रेस के उम्मीदवार से चुनाव हार गए। उनके बड़बोलेपन के बाद मिली हार ने किरण बेदी की याद ताजा कर दी। पूर्व आइपीएस अधिकारी किरण बेदी ने भी भाजपा के साथ होते ही खुद को दिल्ली की मुख्यमंत्री के रूप में प्रस्तुत करना शुरू कर दिया था। राजनीतिक हलकों में मजाक के तौर पर कहा जा रहा था कि उन्होंने तो मुख्यमंत्री पद के शपथ ग्रहण के लिए कपड़े भी सिलवा लिए थे। तकनीक और प्रशासनिक क्षेत्र के दिग्गजों को चुनावी मैदान में भी सफलता मिल ही जाए कोई जरूरी नहीं होता है। (संकलन: मृणाल वल्लरी)

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