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राजपाट: बदलते रिश्ते और संतों की सियासत

अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरी का कभी सियासी लोगों में खासा जलवा था। अब उत्तराखंड में सरकार भाजपा की है तो बेचारे अलग-थलग पड़ते जा रहे हैं।

Rajpaat, politicsपश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी और बसपा सुप्रीमो मायावती। (फोटो जनसत्ता)

राज्यसभा में दिनेश त्रिवेदी के व्यवहार को लेकर ममता बनर्जी और उच्च सदन के पार्टी के मुख्य सचेतक सुखेंदु शेखर राय हैरान हैं। बजट पर बोलने के लिए उन्होंने त्रिवेदी का नाम पार्टी की तरफ से अधिकृत किया ही नहीं था। फिर कैसे उन्हें सदन में बोलने की अनुमति मिल गई। इस्तीफे का ऐसा अनूठा तरीका तो शायद ही किसी नेता ने कभी अपनाया हो। भाजपा अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा से लेकर पश्चिम बंगाल के प्रभारी महासचिव कैलाश विजय वर्गीय तक हर किसी ने अपनी पार्टी के दरवाजे उनके लिए खुले होने की बात कही। जाहिर है कि वे किसी भी दिन भाजपा में जा सकते हैं। पिछले चुनाव की बात करें तो भाजपा को महज तीन सीटों पर सफलता मिली थी। जबकि तृणमूल कांग्रेस ने 211 सीटें जीती थीं।

भाजपा के इरादे बुलंद तो 2019 के लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद हुए। उसे 2014 में जहां केवल दो सीटें मिली थी वहीं 2019 में वह 18 सीटों पर जीत गई। इसी सफलता ने पार्टी को सूबे की सत्ता का सपना दिखाया है। ममता बनर्जी की पार्टी के हर नेता का भाजपा स्वागत कर रही है। उसका अतीत बेशक दागी ही क्यों न हो। दिनेश त्रिवेदी हालांकि जनाधार वाले नेता कभी नहीं रहे। पर उनकी योग्यता को देख ममता ने उन्हें दूसरे नेताओं की तुलना में हमेशा अहमियत दी। उनके बैरकपुर के पार्टी नेता अर्जुन सिंह से गंभीर मतभेद थे। पर अर्जुन सिंह ठहरे दबंग नेता।

त्रिवेदी की शिकायत के बावजूद ममता ने अर्जुन सिंह को नहीं छेड़ा। हां, 2019 के लोकसभा चुनाव में अर्जुन सिंह की बैरकपुर से टिकट की मांग ठुकरा कर त्रिवेदी को ही उम्मीदवार बनाया। अर्जुन सिंह रूठकर भाजपा में चले गए और टिकट पा गए। उन्होंने त्रिवेदी को शिकस्त भी दे दी। ममता ने इसके बावजूद त्रिवेदी को अगले साल राज्यसभा भेज दिया। पर उन्हें संतुष्ट फिर भी न कर पाई। भाजपा नेताओं से त्रिवेदी के सतत संपर्क से ममता अवगत तो थी पर खुद कोई कार्रवाई नहीं करना चाहती थी।

अब दिनेश त्रिवेदी भाजपा में जाएंगे तो अर्जुन सिंह से कोई शिकायत नहीं रहेगी। जबकि 2019 में ममता से की शिकायत में उन्होंने अर्जुन सिंह पर भ्रष्टाचार और अवैध वसूली का आरोप लगाया था। अर्जुन सिंह का बयान देखिए। फरमाया है कि मतभेद जरूर थे पर त्रिवेदी ठहरे उनके बड़े भाई। राजनीतिकों के पलक झपकते बदलते रिश्तों पर तो गिरगिट भी शरमा जाए।

अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरी का कभी सियासी लोगों में खासा जलवा था। अब उत्तराखंड में सरकार भाजपा की है तो बेचारे अलग-थलग पड़ते जा रहे हैं। सूबे के मुख्य सचिव ने कुंभ की अवधि घटाकर एक महीने करने का ऐलान किया तो इसे लेकर भी साधु संतों में मतभेद बढ़ गए। सामान्य परिस्थितियों में तो कुंभ एक जनवरी से तीस अप्रैल तक आयोजित होता है। पर एक तो कोरोना संक्रमण की दहशत, दूसरे श्रृद्धालुओं के सैलाब के लिए लंबी अवधि तक जरूरी बंदोबस्त कर पाने की अड़चन ने राज्य सरकार को अवधि सीमित करने के लिए बाध्य किया।

महंत नरेंद्र गिरी को अखरा तो इस फैसले का विरोध भी किया और भाजपा सरकार को धर्म विरोधी भी ठहराया। लेकिन उन्हीं की संस्था के महासचिव महंत हरि गिरी ने इस फैसले का स्वागत किया। इतना ही नहीं मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत की तारीफ भी कर डाली। उनकी देखा देखी वैरागी अखाड़ों के महंत, हठयोगी और दूसरे अखाड़ों ने भी अवधि घटाने के फैसले पर यह कहते हुए संतोष जता दिया कि अगर जीवित बचेंगे तो ही कुंभ कर पाएंगे।

महंत हरि गिरी तो अपने अध्यक्ष महंत नरेद्र गिरी पर जमकर बरसे और आरोप जड़ दिया कि कुछ लोगों का तो मकसद ही हर अच्छे फैसले का विरोध होता है। हरि गिरी ठहरे शंकराचार्य वासुदेवानंद सरस्वती समर्थक। जबकि नरेंद्र गिरी को दूसरे शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती का नजदीकी माना जाता है। स्वरूपानंद पर कांग्रेस समर्थक होने का आरोप पुराना है।

बेचैन बहनजी
मायावती अचानक सक्रिय हो गई हैं। पिछले हफ्ते लगातार लखनऊ रहीं। सूबे के हर जिले और मंडल की सांगठनिक स्थिति की समीक्षा की। पदाधिकारियों को ताश के पत्तों की तरह फेंट दिया। सूबे की चार बार मुख्यमंत्री रह चुकी और सबसे कद्दावर दलित नेता मानी जाने वाली मायावती को भाजपा ने सियासी हैसियत के हिसाब से इतना बौना बना दिया कि सूबे की विधानसभा में उनकी हैसियत एक राज्यसभा सीट जीतने लायक भी नहीं बची।

ज्यादातर कद्दावर नेता पहले ही पार्टी छोड़ चुके हैं। माना कि अभी भी 18-20 फीसद के अपने दलित वोट बैंक पर भरोसा कायम है पर एक तो केवल इतने भर से सत्ता हासिल नहीं की जा सकती। ऊपर से भीम आर्मी के चंद्रशेखर आजाद ने उनकी नींद उड़ा रखी है। अब तो अमेरिकी पत्रिका टाइम ने दुनिया के 100 उभरते लोगों की सूची में उन्हें शामिल कर उनका कद और बढ़ा दिया है।

देखना है कि मायावती चंद्रशेखर आजाद के इस उभार को किस तरह लेती हैं। इस अति सक्रिय राजनीतिक समय में जब हर तरफ आंदोलनों की गूंज है, उनकी निष्क्रियता ही उनकी स्थिति का आकलन करने के लिए काफी है। (प्रस्तुति : अनिल बंसल)

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