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बंगाल की सियासत और यूपी-उत्तराखंड में हलचल

भाजपा के सामने अब भी मुख्यमंत्री का चेहरा पेश नहीं कर पाने का संकट बरकरार है। क्रिकेट खिलाड़ी सौरभ गांगुली पर डोरे डालने के भाजपाई दाव पेंच अभी तक तो परवान नहीं चढ़ पाए हैं। पार्टी की कोशिश है कि गांगुली कोलकाता में रविवार को होने वाली प्रधानमंत्री की रैली में मंच पर आ जाएं। पर बीसीसीआई के मुखिया गांगुली ने इशारों-इशारों में अपनी अनिच्छा जता दी है।

Rajpaat, jansattaपश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी और हरियाणा के सीएम मनोहर लाल खट्टर।

दीदी का दम
विधानसभा चुनाव के नतीजा भले कुछ भी आए पर ममता बनर्जी ने साबित कर दिखाया है कि वे सचमुच स्ट्रीट फाइटर हैं। दीदी को बंगाल की शेरनी यों ही तो नहीं कहा जाता। भारतीय जनता पार्टी उन्हें सत्ता से बेदखल करने के लिए साम, दाम, दंड और भेद सभी हथकंडे अपना रही है। उनकी पार्टी के नेताओं को तोड़ने का सिलसिला लोकसभा चुनाव के बाद से ही जारी है। पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा से लेकर खुद प्रधानमंत्री और गृहमंत्री तक पश्चिम बंगाल में पूरी ताकत से जुटे हैं। ममता लगातार आरोप लगाती आ रही हैं कि भाजपा केंद्रीय एजंसियों को तृणमूल कांगे्रस को तोड़ने में बतौर हथियार इस्तेमाल कर रही है। प्रलोभन अलग दिए जा रहे हैं।

तृणमूल कांग्रेस में रहते जिन नेताओं को भ्रष्ट और दागी बताते नहीं अघाते थे, सत्ता के लोभ में अब उन्हीं को गले लगा रहे हैं। पर वे डरने वाली नहीं हैं। यकीनन ममता का आत्मविश्वास अब भी कायम है। तभी तो भाजपा से पहले ही एकमुश्त अपने 291 उम्मीदवारों की सूची शुक्रवार को एक झटके में जारी कर दी। उनसे बगावत कर भाजपा खेमे में जा पहुंचे शुभेंदु अधिकारी की चुनौती भी बेखौफ स्वीकार कर ली। शुभेंदु पिछला चुनाव तृणमूल कांगे्रस के टिकट पर नंदीग्राम से जीते थे।

उन्होंने भाजपा में शामिल होने के बाद दीदी को चुनौती दी थी कि उनमें हिम्मत है तो नंदीग्राम में उनसे लड़कर दिखाएं। ममता अभी भवानीपुर से विधायक हैं। शुभेंदु की चुनौती स्वीकार कर उन्होंने उसी दिन नंदीग्राम से भी लड़ने का एलान कर दिया था। इस पर शुभेंदु और दूसरे भाजपाई नई शर्त के साथ सामने आए। चुनौती दी कि दो सीट से क्यों, हिम्मत है तो केवल नंदीग्राम से लड़ें ममता। ममता ने इसे भी स्वीकार करने से गुरेज नहीं किया। वे अब केवल नंदीग्राम से लड़ेंगी। अपनी मौजूदा भवानीपुर सीट उन्होंने शोभन चटर्जी को दे दी है। ममता की सूची में 50 महिलाएं हैं और 42 मुसलमानों को टिकट देकर उन्होंने अपने तरीके से सामाजिक समरसता अपनाई है। दो दर्जन से ज्यादा मौजूदा विधायकों के टिकट काट दिए हैं।

भाजपा के सामने अब भी मुख्यमंत्री का चेहरा पेश नहीं कर पाने का संकट बरकरार है। क्रिकेट खिलाड़ी सौरभ गांगुली पर डोरे डालने के भाजपाई दाव पेंच अभी तक तो परवान नहीं चढ़ पाए हैं। पार्टी की कोशिश है कि गांगुली कोलकाता में रविवार को होने वाली प्रधानमंत्री की रैली में मंच पर आ जाएं। पर बीसीसीआई के मुखिया गांगुली ने इशारों-इशारों में अपनी अनिच्छा जता दी है। एक बांग्ला टीवी चैनल से बातचीत में उन्होंने कह दिया कि हर आदमी हर काम नहीं कर सकता। यों भाजपा में मुख्यमंत्री पद के दावेदारों की कमी नहीं है पर पार्टी आलाकमान बखूबी समझता है कि दीदी के कद के आगे वे सभी बौने ठहरे।

तरकश के तीर
उत्तराखंड में कांगे्रस भी भाजपा की राह पर है। सीमित इलाकों को छोड़ दें तो यहां मुसलमानों की संख्या ज्यादा नहीं है। सो मंदिर और गंगा दोनों से मोह के मामले में कांगे्रसी ही भाजपाईयों से पीछे क्यों रहें। प्रियंका गांधी और राहुल गांधी दोनों अब पार्टी पर चस्पा तुष्टिकरण की राजनीति करने के मुलम्मे को उतारना चाहते हैं। शायद उन्हीं की देखा देखी पार्टी के सूबे के प्रभारी देवेंद्र यादव दौरे पर आए तो हरिद्वार में जयराम आश्रम में रुके। मंदिर में पूजा पाठ से पहले हर की पौड़ी पर गंगा में डुबकी लगाई और आरती उतारी।

अनुसरण सूबे के कांग्रेसी नेताओं ने भी किया। हरीश रावत जब मुख्यमंत्री थे तो मुसलमान सरकारी कर्मचारियों को नमाज के लिए जुमे की छुटटी देने का एलान किया था। भाजपा ने तुरंत उन पर तुष्टिकरण का आरोप लगा दिया था। इतना ही नहीं चुनाव में हिंदु मुसलमान को मुद्दा बनाने का भाजपा को फायदा भी मिला था। कांग्रेस महज 11 सीटों पर सिमट गई थी।

अब हरीश रावत भी बदल चुके हैं। वे हरिद्वार में साधु संतों की परिक्रमा कर रहे हैं। कांगे्रस की बदली रणनीति से चौकस सूबे के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने भी नया पैंतरा आजमाया है। उत्तराखंड में अभी दो मंडल हैं। कुमाऊं और गढ़वाल। ग्रीष्मकालीन राजधानी गैरसैंण को मुख्यमंत्री ने सूबे का तीसरा मंडल बनाने का एलान कर दिया है। इसमें गढ़वाल के चमोली और रूद्रप्रयाग व कुमाऊं के बागेश्वर और अल्मोड़ा को शामिल किया है। पर यह फैसला जोखिम भरा है। गढ़वाल और कुमाऊं के जिले आपस में तालमेल शायद ही बिठा पाएं। फिर इस एलान से मैदानी इलाकों से भी तो हरिद्वार और देहरादून को मिलाकर चैथा मंडल बनाने की मांग उठ सकती है।

उल्टा प्रदेश
नाम के हिसाब से तो यूपी को उल्टा-पुल्टा प्रदेश कहा जाता था। पर सियासी नजरिए से देखें तो दरअसल हरियाणा दिखता है उल्टा प्रदेश। गृहमंत्री अनिल विज और मुख्यमंत्री मनोहर लाल के बीच खटपट कभी थमी नहीं। लगता है कि दोनों आपस में मिल बैठकर संवाद नहीं करते। करते होते तो विज अपने गृह सचिव से नए डीजीपी की नियुक्ति के लिए तीस साल से ज्यादा की सेवा वाले सात आईपीएस अफसरों की सूची भेजने को क्यों कहते। मौजूदा डीजीपी मनोज यादव का दो साल का निर्धारित न्यूनतम कार्यकाल पूरा होने पर जब मुख्यमंत्री ने उन्हें पहले ही सेवा विस्तार दे दिया था। अब केंद्र से मंजूरी भी आ गई और तय हो गया है कि यादव एक साल और रहेंगे सूबे की पुलिस के मुखिया। गृह सचिव ने भी कमाल कर दिया। अपने बॉस गृहमंत्री की जानकारी यह कहते हुए बढ़ा दी कि सुप्रीम कोर्ट ने डीजीपी के न्यूनतम कार्यकाल की शर्त लगाई है, अधिकतम की नहीं। विज ही क्यों उप मुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला भी विरोधाभासी आचरण करने में पीछे नहीं।

धार्मिक स्वतंत्रता विधेयक का तो समर्थन कर रहे हैं पर गृहमंत्री के लव जिहाद शब्द पर जनाब को एतराज है। अब तो हरियाणा सरकार ने निजी क्षेत्र की पचास हजार रुपए तक के वेतन वाली नौकरियों में स्थानीय लोगों के लिए 75 फीसद आरक्षण का कानून बनाकर विवाद का नया पिटारा खोल दिया है। सीआइआइ और फिक्की जैसे संगठनों ने इस फैसले को सूबे के औद्योगिक विकास और निजी निवेश के लिए विनाशकारी बता सूबे के उद्योग दूसरे राज्यों में जाने का अंदेशा जता दिया है। (प्रस्तुति : अनिल बंसल)