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विपक्ष की विडंबना

लालू यादव ने ठीक ही कहा था कि कांग्रेस को केंद्र में लिए बिना राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के विकल्प की बात करना भी निरर्थक है। अतीत के अनुभव भी यही सिखाते हैं। क्षेत्रीय दलों की सरकार का हश्र देश ने 1996 से 1998 के दौरान देखा था।

विपक्ष की विडंबना
राष्ट्रपति पद के लिए एनडीए की उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू और आंध्र प्रदेश के सीएम के चंद्रशेखर राव।

राष्ट्रपति चुनाव के मतदान की तारीख करीब आते-आते तो विपक्ष का कुनबा जैसे पूरी तरह बिखर गया है। सबसे पहले शिवसेना के शिंदे गुट ने द्रौपदी मुर्मू का समर्थन करने का एलान किया। शिवसेना के उद्धव गुट में बचे-खुचे नेताओं ने भी जब मुर्मू के समर्थन की इच्छा जताई तो उद्धव ठाकरे चकरा गए। शिंदे ने जो झटका उन्हें दिया है, उससे उबरना पहले ही कठिन दिख रहा था। कांग्रेस और राकांपा उद्धव के स्वाभाविक सहयोगी तो थे नहीं कि गठबंधन तोड़ने में अड़चन होती। उनके साथ गठबंधन तो सत्ता के मोह का परिणाम था। सरकार ही चली गई तो अब महाराष्ट्र विकास आघाड़ी भी बेमानी हो गया। लिहाजा बची-खुची पार्टी अपने पाले में बनाए रखने के फेर में उद्धव ने भी मुर्मू के समर्थन का एलान करने में संकोच नहीं किया।

बेशक पहले वे सिन्हा के साथ थे। उद्धव का रंग बदलना बदली परिस्थितियों में शरद पवार को भी अटपटा शायद ही लगा हो। बहरहाल, उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव के दो सहयोगी ओमप्रकाश राजभर और महान दल भी मुर्मू के पक्ष में चले गए। चाचा शिवपाल यादव ने तो ठेंगा दिखाया ही। असली झटका तो विपक्षी खेमे को झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने दिया है। आखिरी वक्त पर आदिवासी कार्ड याद आ गया उन्हें। मुर्मू बेशक ओड़ीसा की हैं पर सोरेन की तरह हैं तो आदिवासी। ऊपर से झारखंड की राज्यपाल भी रह चुकी हैं। कुल मिलाकर विपक्षी कुनबे के बिखराव से उनके उम्मीदवार यशवंत सिन्हा की पहले से कहीं ज्यादा करारी हार के आसार दिख रहे हैं।

लालू यादव ने ठीक ही कहा था कि कांग्रेस को केंद्र में लिए बिना राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के विकल्प की बात करना भी निरर्थक है। अतीत के अनुभव भी यही सिखाते हैं। क्षेत्रीय दलों की सरकार का हश्र देश ने 1996 से 1998 के दौरान देखा था। जब दो साल में दो प्रधानमंत्री बने, सरकार फिर भी गिर गई। राजग की पहली सरकार 1998 से 2004 तक तो यूपीए की 2004 से 2014 तक चल ही इसलिए सकी क्योंकि केंद्र में दोनों बार क्षेत्रीय नहीं राष्ट्रीय दल थे। पर क्षेत्रीय दल तो भाजपा से ज्यादा कब्र कांग्रेस की खोद रहे हैं।

चुनावी भगदड़
प्रदेश में विधानसभा चुनावों के लिए चंद महीने बचे हैं। अब नेताओं का एक-दूसरे के दल में आना-जाना शुरू हो गया है। कुल्लू में पूर्व मंत्री व पूर्व भाजपा अध्यक्ष खिमी राम कांग्रेस में चले गए। उनके जाने के दो दिन बाद ही हमीरपुर जिले की भोरंज विधानसभा हलके से पूर्व विधायक रहे अनिल धीमान ने भी विद्रोह का डंका बजा दिया है। इन दोनों ने अभी मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर और भाजपा के राष्ट्रीय नेताओं की दिल में धकधक मचा ही रखी थी कि राजधानी में भाजपा के पूर्व पार्षद मनोज कुठियाला ने कांग्रेस का हाथ थाम लिया।

मनोज कुठियाला हालीलाज कांग्रेस के कभी भी करीबी नहीं रहे हैं। लेकिन पिछली बार भाजपाइयों ने पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के हालीलाज की बेहद करीबी कांग्रेस पार्षद अर्चना धवन को भाजपा में शामिल करवा लिया था। अब कांग्रेस ने मनोज कुठियाला को ही अपने खेमे में पहुंचा कर जहां अर्चना धवन की मुश्किल बढ़ा दी है वहीं नगर निगम में दोबारा काबिज होने के भाजपा के सपने को उचाट जरूर कर दिया है। खिमी राम के कांग्रेस में जाने के बाद भाजपा में जो भगदड़ मची है उसके बाद राज्य से लेकर भाजपा आलाकमान तक सब भौंचक हैं। आलाकमान ने पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सौदान सिंह को प्रदेश में भेज रखा है।

उनसे पहले पार्टी के प्रदेश प्रभारी अविनाश राय खन्ना ने उप चुनावों से पहले पार्टी के तमाम धड़ों को एक करने की कोशिश की थी। वह कोशिश मुख्यमंत्री कुनबे को रास नहीं आई। आलाकमान ने खन्ना पर पकड़ बनाए रखने के लिए सौदान सिंह को प्रदेश में भेज दिया। तब से भाजपा का भला तो हो ही नहीं रहा है। अब आगे आने वाले दिनों में क्या होगा जाहिर है उसे सब देखेंगे ही।

हैदराबाद के बाद…
तेलंगाना राष्ट्र समिति के नेता चंद्रशेखर राव यों ही भाजपा से खफा नहीं हुए हैं। तेलंगाना के मुख्यमंत्री को अपनी सत्ता के लिए उसी भाजपा से खतरा नजर आने लगा है, जिसका उन्होंने 22 साल पहले भी साथ दिया था। कभी राजग का हिस्सा थी टीआरएस। अब भाजपा ने राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक हैदराबाद में आयोजित कर राव को सीधे चुनौती दी है। विभाजन से पहले तक आंध्रप्रदेश में भाजपा का खास जनाधार नहीं था। या तो सत्ता में कांग्रेस रही या तेलगुदेशम। लेकिन पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की तेलंगाना में भी बुरी गत हुई और आंध्र में भी। जबकि सूबे का बंटवारा 2014 में जाते-जाते मनमोहन सिंह सरकार ने ही किया था। लेकिन उसे कोई सियासी लाभ नहीं मिला इस फैसले का।

बंटवारे के वक्त तो आंध्र में चंद्रबाबू नायडू की सरकार थी पर 2018 के विधानसभा चुनाव में वाइएसआर के बेटे जगनमोहन रेड्डी सत्ता में आ गए। तेलंगाना पर वर्चस्व चंद्रशेखर राव ने अपना कर लिया। तेलंगाना में मुसलमान आबादी भी खासी है। यहां ध्रुवीकरण की संभावना भाजपा को भविष्य के लिए उम्मीद बंधाती है। तभी तो कर्नाटक के बाद दक्षिण के इसी दूसरे सूबे पर भाजपा की निगाह टिकी है। कार्यकारिणी की बैठक के दौरान हैदराबाद का नाम बदलकर भाग्यनगर करने की चर्चा अनायास नहीं थी। भाजपा की संभावनाओं को ऊर्जा असद्दुदीन ओवैसी भी देंगे। उन्हीं का शहर तो है हैदराबाद।
(संकलन : मृणाल वल्लरी)

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