राजनीतिक ईमानदारी और सामाजिक बेईमानी

2014 के लोकसभा चुनाव में जब सारे देश में नरेंद्र मोदी की आंधी चल रही थी तो ओडिशा में नतीजे उलट आए थे। लोकसभा की 21 में से 20 सीटें जीती थी पटनायक ने।

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ओडिशा के सीएम नवीन पटनायक और हिमाचल प्रदेश के सीएम जयराम ठाकुर।

खामोशी से काम
ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक हर समय चुनाव के लिए तत्पर नजर आते हैं। अभी 22 सितंबर को बलांगीर ने स्मार्ट हेल्थ कार्ड बाकायदा भव्य मेला आयोजित कर बांटे। बीजू स्वास्थ्य कल्याण योजना के तहत बन रहे हैं ओडिशा में ये स्मार्ट हेल्थ कार्ड। नवीन अगले महीने 75 के हो जाएंगे। ओडिशा के मुख्यमंत्री के नाते यह उनकी लगातार पांचवी पारी है। इक्कीस वर्ष तो मुख्यमंत्री की कुर्सी पर मार्च में ही पूरे कर लिए थे। ओडिशा में तो खैर कोई मुख्यमंत्री इतने लंबे समय तक सत्ता में रहा ही नहीं।

देश में भी दो ही नाम हैं जिन्होंने लगातार पांच बार सरकार बनाई। सिक्किम के पवन चामलिंग और पश्चिम बंगाल के ज्योति बसु। पर वे दोनों सियासत के मंजे खिलाड़ी थे। जबकि नवीन पटनायक तो अपने पिता बीजू पटनायक की मौत के बाद 1997 में अचानक राजनीति में उतरे थे। तब उम्र थी 51 वर्ष। केंद्र की वाजपेयी सरकार में मंत्री रहे। पिता की लोकसभा सीट से उपचुनाव जीता। जनता दल से अलग हो अपनी अलग पार्टी बीजू जनता दल बनाई। फिर 2000 में सूबे के मुख्यमंत्री की गद्दी पर ऐसे बैठे कि आज तक कोई नहीं हिला पाया उन्हें। कई मायनों में अनूठा है नवीन पटनायक का व्यक्तित्व। कार्यशैली भी कमाल की कि विरोधी भी लोहा मानते हैं।

ओडिशा से पहले कभी नाता नहीं रहा। पढ़ाई लिखाई दिल्ली में हुई। उड़िया से अच्छी तो हिंदी और पंजाबी है उनकी। विवाह भी नहीं किया। पैतृक संपत्ति राज्य सरकार को दे दी। न कभी किसी विवाद में पड़े और न केंद्र की सरकार से टकराव मोल लिया। दिल्ली के तख्त की भी कोई महत्वाकांक्षा नहीं पाली। अपनी पार्टी के भी लगातार अध्यक्ष हैं। बीजू जद के जो साथी उन्हें छोड़कर गए, बाद में पछताए। दो रुपए किलो की चावल योजना शुरू की थी 2009 में। ऐसा चमत्कार दिखाया कि सारे योजनाकार हैरान रह गए। 2014 के लोकसभा चुनाव में जब सारे देश में नरेंद्र मोदी की आंधी चल रही थी तो ओडिशा में नतीजे उलट आए थे। लोकसभा की 21 में से 20 सीटें जीती थी पटनायक ने।

इस राज्य में लोकसभा और विधानसभा चुनाव पिछली पांच बार से साथ-साथ हुए हैं। भाजपा को कहना पड़ा कि विधानसभा चुनाव में पटनायक का जादू चल रहा था, इस चक्कर में लोकसभा सीटें भी बीजू जद की झोली में चली गई। काश देश के दूसरे राजनेता भी नवीन पटनायक की चुपचाप और जन कल्याण के काम निरंतर करने की शैली को अपना पाता।

साख पर दाग
अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष और श्री पंचायती निरंजनी अखाड़ा के सचिव महंत नरेंद्र गिरि की रहस्यमय तरीके से मौत ने साधु समाज के आंतरिक हालात पर तीखे सवाल उठा दिए हैं। जिस तरह से महंत नरेंद्र गिरि के तार भू माफिया से जुड़े होने के आरोप लग रहे हैं और सबूत बता रहे हैं कि उनके चेले आनंद गिरि किसी महिला के नाम पर उन्हें ब्लैकमेल कर रहे थे। इन सब बातों ने साधु संतों के चरित्र पर बहस शुरू कर दी है। इन अखाड़ों व आश्रमों के भीतर हो रहे गोरखधंधे की पोल खोल कर रख दी है।

महंत नरेंद्र गिरि के मरने के बाद उनकी असलियत सामने आई कि वे इंटर पास थे और किसी बैंक में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी की नौकरी करते थे। साधु बाबा बनने के बाद संतों की सबसे बड़ी संस्था अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष बन गए और एक प्रतिष्ठित निरंजनी अखाड़ा के सचिव भी बन गए। यह सब उन्होंने तिकड़म और दबंगता के बूते हासिल किया। किस तरह से वे अखाड़े के रमता पंचों की अनदेखी कर अखाड़े की करोड़ों की संपत्ति को भू माफिया को बेचने के लिए बेचैन थे और उन्होंने कई प्रॉपर्टी डीलरों से अखाड़े की जमीनों के नाम पर करोड़ों रुपए बटोरे थे।

यदि रमता पंच एतराज ना करते तो अखाड़े की करोड़ों की संपत्ति भू माफिया के हाथों में चली जाती। जिन भू माफिया से महंत नरेंद्र गिरि ने अखाड़े की जमीनों के नाम पर करोड़ों रुपए वसूले थे उनकी रकम डूबती हुई नजर आती है और अब वे सीबीआइ की जांच के घेरे में फंसने से बेचैन हैं।

इस्पाती इंतजाम
हिमाचल प्रदेश में सरकार के व रसूखदार लोग एक अरसे से हरित पंचाट की ओर से राजधानी के कोर एरिया में ढाई मंजिल से ज्यादा भवनों व नए निर्माण पर पाबंदी के बावजूद हर तरह के निर्माण के प्रयासों में लगे रहते हैं। कुछ दिन पहले ही पंचाट ने सचिवालय में सरकार की ओर से लिफ्ट लगाने के लिए मांगी गई अनुमति को नामंजूर कर दिया। इसके अलावा भाजपा के पूर्व विधायक नरेंद्र बरागटा की पत्नी ने भी अपने बहुमंजिला इमारत में लिफ्ट लगाने को लेकर पंचाट में अर्जी दाखिल की थी।

पंचाट ने इसे भी नामंजूर कर दिया। पंचाट ने कह रखा है कि अगर कोई आपात जरूरत है तो ही कोर एरिया में निर्माण किया जा सकता है। इसके लिए हरित पंचाट ने देश के पर्यावरण से जुड़े बड़े संस्थानों के विशेषज्ञों और प्रदेश सरकार के आला अधिकारियों की दो समितियां बना रखी है। नौकरशाह को पता है कि अगर कहीं अनुमति दे दी और किसी ने पंचाट में शिकायत कर दी तो उनकी नौकरी तो समझो गई। ऐसे में वह पंचाट में अर्जी दायर करवा देते हैं।

उन्हें पता होता है कि वहां से मंजूरी नहीं मिलनी है। ऐसे में वह सरकार से भी व रसूखदार लोगों से भी दुश्मनी मोल लेने से बच जाते है। इस्पाती चौखट इसे ही तो कहते हैं न। (संकलन : मृणाल वल्लरी)

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