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विरासत और कौशल

भाजपा आज जो खेल महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ खेल रही है, 1995 में वही खेल कांग्रेस ने भाजपा के साथ खेला था। तब भाजपा की देश में इकलौती गुजरात में ही सरकार थी।

शिवसेना के बागी नेता एकनाथ शिंदे और एनडीए की राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार द्रौपदी मूर्मू।

महाराष्ट्र की महा विकास आघाड़ी सरकार पर छाए संकट के लिए एकनाथ शिंदे की महत्वाकांक्षा को जितना जिम्मेवार ठहराया जा रहा है, उससे कहीं ज्यादा दोष मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे का है। खतरा तो उन्हें अपने सहयोगियों कांग्रेस और एनसीपी से होना चाहिए था। पर गठबंधन के उनके ये दोनों सहयोगी तो विपरीत विचारधारा के बावजूद पुख्ता तौर पर अभी तक उनके साथ खड़े हैं। शिंदे ने हिंदुत्व की विचारधारा की तो महज आड़ ली है। हकीकत तो यह है कि वे शिवसेना और सरकार में खुद को हाशिए पर पा रहे थे। मुंबई में किससे छिपा है कि सरकार उद्धव नहीं बल्कि उनकी पत्नी रश्मि ठाकरे और बेटे आदित्य ठाकरे चला रहे थे। बाकी रिमोट शरद पवार के हाथ में था।

बहरहाल भाजपा आज जो खेल महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ खेल रही है, 1995 में वही खेल कांग्रेस ने भाजपा के साथ खेला था। तब भाजपा की देश में इकलौती गुजरात में ही सरकार थी। मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल सितंबर 1995 में अमेरिकी दौरे पर थे। उनकी अनुपस्थिति में भाजपा के ही शंकर सिंह वाघेला पार्टी के 47 विधायकों को लेकर पड़ोसी मध्यप्रदेश के खजुराहो पहुंच गए थे। सरकार संकट में दिखी तो भैरो सिंह शेखावत और अटल बिहारी वाजपेयी ने वाघेला को मनाया। पटेल को मुख्यमंत्री पद से हटना पड़ा। सुरेश मेहता मुख्यमंत्री बने और तबके गुजरात प्रदेश भाजपा के संगठन मंत्री नरेंद्र मोदी को गुजरात छोड़ना पड़ा था।

उद्धव प्रसंग ने फिर साबित किया है कि पिता से विरासत में पार्टी और हैसियत पाना अलग बात है पर उसे बनाए रखने का कौशल हर वारिस में नहीं होता। जैसे चौधरी चरण सिंह का जनाधार उनके पुत्र अजित सिंह के बजाए मुलायम सिंह यादव ने छीन लिया था। जैसे एमजीआर का जनाधार उनकी पत्नी जानकी रामचंद्रन नहीं संभाल पाई थी और जयललिता ने खुद को उनका उत्तराधिकारी साबित किया था। आंध्र में एनटीआर की पत्नी लक्ष्मी पार्वती के बजाए उनके दामाद चंद्रबाबू नायडू सियासी वारिस बनकर उभरे थे। कमोबेश यह अखिलेश यादव के लिए भी नसीहत है। जो पिता मुलायम सिंह यादव की विरासत संभालने में अभी तक निपुण नहीं हुए हैं।

सवालों में हवाई सफर
हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनावों को अब चंद महीने बाकी रह गए हैं। चुनावी तनातनी के बीच जिस तरह की जुबानी जंग इन दिनों मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर और नेता प्रतिपक्ष मुकेश अग्निहोत्री के बीच चल रही है, वह दिलचस्प मोड़ तक पहुंच गई है। मुख्यमंत्री का हेलीकॉप्टर का मुद्दा हमेशा ही रहता आया है। इसे लेकर पिछली बार तत्कालीन मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह को धूमल की कमान में भाजपा ने बुरी तरह से परेशान किया था। भाजप तब विपक्ष में थी। वीरभद्र सिंह के खिलाफ सीबीआइ व ईडी में कई मामले चल रहे थे।

उनका इन्हीं मामलों को लेकर दिल्ली जाना हुआ करता था और भाजपा उनकी ओर से उड़नखटोले के इस्तेमाल को लेकर बुरी तरह से मुखर रहती थी। जब से जयराम सरकार सत्ता में आई तब से शुरू में तो उन्होंने उड़नखटोले का कम ही इस्तेमाल किया। लेकिन कोविड के बाद जयराम ठाकुर सड़क के रास्ते कम ही चलते हैं।

प्रदेश सरकार के पास अपना कोई हेलीकाप्टर नहीं है। ऐसे में सरकार करार कर हेलीकाप्टर लेती है। लेकिन बीते दिनों नेता प्रतिपक्ष ने जयराम पर इल्जाम लगा दिया कि वह इसका बेजा इस्तेमाल कर रहे हैं। इस सनसनीखेज खुलासे के बीच अब सबकी निगाहें संघ परिवार से जुड़े पदाधिकारियों पर लग गई हैं कि क्या उड़नखटोले में जो कोई और उड़ते हैं, वह कौन हैं उनका पता आलाकमान तक पहुंचाएंगे या नहीं। सभी जानते है कि संघ परिवार के लोग हर राज्य में जहां पर भाजपा की सरकार होती है उसकी कारगुजारी को लेकर निगाह रखते हैं। हिमाचल में भी संघ की ओर से पदाधिकारी नियुक्त किए हुए हैं। देखते हैं जनता के पैसे पर मौज के इस मामले का आगे क्या होता है।

उम्मीदों से परे उम्मीदवार
राष्ट्रपति चुनाव ने विपक्ष की एकता की फिर पोल खोल दी। राष्ट्रपति का उम्मीदवार कौन बने, इसकी कवायद विपक्ष को चुपचाप करनी चाहिए थी। गोपाल गांधी और शरद पवार की सहमति के बिना उनके नाम सामने क्यों आए। जबकि वे इसके लिए राजी नहीं थे। आखिर चली ममता बनर्जी की। यशवंत सिन्हा को ही उतारना था तो इसके लिए रणनीति पहले से बनाना बेहतर होता। राजग की तरफ से किसी को भनक तक नहीं लगी और द्रौपदी मुर्मू का नाम घोषित हो गया। दरअसल विपक्ष की एकता नहीं हो पाने का असली कारण तो कांग्रेस की कमजोरी है। क्षेत्रीय दल 1996 में एकजुट तो जरूर हुए थे पर यह एकता टिक पाई महज दो साल। इस अवधि में भी दो प्रधानमंत्री देखने को मिले।

ममता की बैठक से टीआरएस, वाइएसआर कांग्रेस और बीजू जनता दल ने तो पहले ही किनारा कर रखा था। विपक्ष को भरोसा था कि तेलंगाना के केंद्र से नाराज चल रहे मुख्यमंत्री उनका साथ देंगे। पर ऐसा हुआ नहीं। उल्टे नीतीश कुमार ने समर्थन देकर भाजपा के साथ अपने बढ़ते मतभेदों को लेकर लगाई जा रही अटकलों को खारिज कर दिया। सियासी गणित से नतीजा साफ दिख रहा है। मुर्मू की जीत में अब किसको संदेह हो सकता है। इससे तो बेहतर होता कि विपक्ष राजग के उम्मीदवार के समर्थन के बदले उपराष्ट्रपति पद पर अपने उम्मीदवार को आम राय से जितवाने की सौदेबाजी कर लेता। (संकलन : मृणाल वल्लरी)

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