छोटे सियासी दल और सियासी आकांक्षा

ओवैसी के कारण बिहार में तेजस्वी यादव की सरकार नहीं बन पाई। कुछ सीटों पर एमआइएम के उम्मीदवार जीते तो कुछ पर उनके कारण राजद गठबंधन के उम्मीदवारों की हार हुई। बसपा और राजभर ने तो भाव दिया ही नहीं अब तो भीम आर्मी भी ओवैसी से दूरी बना रही है।

Rajpaat, Jansatta Rajpaat
एआईएमआईएम नेता असदुद्दीन औवैसी और मंडी से कांग्रेस सांसद प्रतिभा सिंह।

अंदाज वजूद का
देश के सबसे बड़े सूबे में विधानसभा चुनाव की गरमाहट जैसे-जैसे बढ़ रही है, छोटे सियासी दलों को अपनी औकात का अंदाज होने लगा है। एमआइएम के असदुद्दीन ओवैसी हों या प्रगतिशील समाजवादी पार्टी के शिवपाल सिंह यादव, गठबंधन के लिए बेचैन हैं। ओवैसी को शुरू में मुगालता था कि ओमप्रकाश राजभर, चंद्रशेखर आजाद और शिवपाल यादव की पार्टियों के साथ उनका तालमेल हो जाएगा।

पर राजभर ने माहौल को जांचने-परखने के बाद अखिलेश यादव के साथ गठबंधन का एलान कर दिया। बातचीत उनकी उसी भाजपा के साथ भी हो रही थी, जिससे उन्होंने 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले नाता तोड़ लिया था और योगी आदित्यनाथ की सरकार का मंत्रिपद भी छोड़ दिया था। शुरू में तो ओवैसी को यही भरोसा था कि जिस तरह बिहार में बसपा ने उनसे हाथ मिलाया था, उत्तर प्रदेश में भी वही अध्याय दोहराने में वे सफल हो जाएंगे।

ओवैसी के कारण बिहार में तेजस्वी यादव की सरकार नहीं बन पाई। कुछ सीटों पर एमआइएम के उम्मीदवार जीते तो कुछ पर उनके कारण राजद गठबंधन के उम्मीदवारों की हार हुई। बसपा और राजभर ने तो भाव दिया ही नहीं अब तो भीम आर्मी भी ओवैसी से दूरी बना रही है।

ओवैसी ने उत्साह दिखाते हुए पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुसलिम बहुल इलाकों में पिछले दिनों कई रैलियां की थीं। पर कहीं भी ज्यादा भीड़ नहीं जुटा पाए। भाजपा से ज्यादा हमला उन्होंने सपा पर करने का जो हथकंडा आजमाया वह मुसलमानों को ज्यादा भाया नहीं। वे मुसलमानों को रिझाने के लिए सूबे में उप-मुख्यमंत्री पद मुसलमान को दिलाने की बात करते हैं तो मुसलमान ही सवाल पूछने लगते हैं कि तेलंगाना में यह मंसूबा क्यों नहीं पूरा किया उन्होंने।

बहरहाल, सूत्रों की माने तो बेचारे ओवैसी को दमदार उम्मीदवार भी नहीं मिल रहे। लगभग यही हालत शिवपाल यादव की है। अभी तक की सभाओं और रैलियों के फीका रहने से भाषा बदली है। अब फरमा रहे हैं कि नेताजी यानी मुलायम जो कहेंगे, वही करूंगा। सपा से गठबंधन को तो पहले से ही तैयार थे, अब अपनी पार्टी के विलय तक को भी तैयार हैं।

मुलाकात और बात
प्रदेश में राज्यसभा में एक ही महिला सांसद है। जयराम सरकार में इन महिला सांसद को भाजपाइयों ने सताया भी कम नहीं था। उन्हें प्रदेश भाजपा अध्यक्ष बनाने की मुहिम चली तो जयराम ठाकुर और उनकी जुंडली ने उनकी राह रोक दी।

यह तो भला हो आलाकमान का कि इस जुंडली के विरोध के बाद उन्हें राज्यसभा का सदस्य बना दिया गया। जबकि प्रदेश भाजपा अध्यक्ष पर लोकसभा सांसद सुरेश कश्यप को बिठा दिया गया। उनको ठिकाने लगाने का काम सरकार व संगठन ने उसके बाद भी नहीं छोड़ा। प्रदेश में चार सीटों के उपचुनाव थे।

इंदु गोस्वामी को कहीं प्रचार करने तक के लिए नहीं भेजा। वह भी पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल की तरह घर में बैठी रहीं या संगठन के फालतू के कामों में उलझी रहीं। हाल ही में देश के पीठासीन अधिकारियों का राजधानी में तीन दिवसीय सम्मेलन था। उसमें भाग लेने वह शिमला पहुंची तो लौटते हुए पार्टी कार्यालय में भी चली गईं। यहां पर उनकी मुलाकात भाजपा अध्यक्ष सुरेश कश्यप से हो गई। मुलाकात हुई तो बातें भी हुई।

इस बीच उन दोनों की खिलखिलाती हुई तस्वीरें मीडिया को भी जारी कर दी गई। मीडिया के लोगों ने भी तुरंत टिप्पणी कर दी कि इंदु गोस्वामी हार पर दुख जताने आई थी या भाजपा की ओर से चार-शून्य करने, पर भाजपा अध्यक्ष सुरेश कश्यप को बधाई देने आई थीं। बधाई से ही काम चलाएंगी या पार्टी भी देंगी। इन उपचुनावों के बाद मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने प्रेस दिवस की पूर्व संध्या पर मीडिया वालों को रात्रिभोज दिया था।

भोज में उन्होंने मीडिया वालों के संग नाटी भी डाल ली। नाटी के इस वीडियो को भाजपाइयों ने वायरल भी कर दिया था। सुबह भाजपाई कहते सुने गए कि जयराम ने तो हार का भी जश्न मना डाला तो इंदु गोस्वामी की ओर से कश्यप को अगर हार की बधाई दी भी गई होगी तो उसमें बुराई ही क्या।

भोज से दिखाई भावना
मंडी संसदीय हलके के उपचुनाव में प्रतिभा सिंह की जीत के बाद उन्हें बधाई देने लोग दूर-दूर से आ रहे हैं। भले ही जीत का अंतर कम था लेकिन जीत तो जीत है। लेकिन कांग्रेस के कोई बड़े नेता अपनी विजयी नेता को बधाई देने के लिए हालीलाज नहीं पहुंचे। जब प्रतिभा सिंह के पति स्वर्गीय वीरभद्र सिंह जीतते थे, उनके समर्थक ढोल-नगाड़ों संग हालीलाज पहुंचते थे। लेकिन इस बार ऐसा कुछ नहीं हुआ।

यह देख प्रतिभा सिंह ने तमाम विधायकों व पूर्व विधायकों को दोपहर के भोज पर हालीलाज बुला लिया। इस भोज में करीब-करीब कांग्रेस के सभी गुटों के नेता शामिल भी हो गए और इससे कांग्रेस के एकजुट होने का संदेश जनता ही नहीं भाजपा को भी चला गया। इस तरह कांग्रेसियों की एकजुटता देख मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर और भाजपा परेशान हैं।

उन्हें अब डर सताने लगा है कि कांग्रेस की खेमेबंदी अगर टूट गई तो भाजपा के दोबारा सत्ता में आने की आस भी टूट जाएगी। अब तक दिल्ली की भाजपा समेत जयराम ठाकुर व प्रदेश भाजपा हालीलाज कांग्रेस को लेकर बेहद दोस्ताना रही है। लेकिन अब आगे भी भाजपा की रणनीति ऐसी ही रहेगी यह आने वाले दिनों में पता चलेगा। लेकिन प्रतिभा सिंह के इस भोज ने भाजपाइयों की नींद जरूर उड़ा रखी है।
(संकलन : मृणाल वल्लरी)

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