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गवाह सुस्त

विपक्ष ने रफाल के मुद्दे पर भी अपनी किरकिरी ही कराई थी। इस सौदे में कमीशन खोरी का सरकार पर आरोप लगाया था। संसद में कई दिन हंगामा हुआ था। अंतत: यह मुद्दा भी सुप्रीम कोर्ट में आया था। अदालत ने शुरू में ही साफ कर दिया था कि रफाल की कीमत के परीक्षण में वह नहीं पड़ेगी। सिर्फ खरीद की अपनाई गई प्रक्रिया को परखेगी।

गवाह सुस्त

पेगासस जासूसी मामले में गुरुवार को आखिर सुप्रीम कोर्ट का फैसला भी आ ही गया। अदालत की बनाई जांच समिति ने एक तरह से तो अपनी लाचारी ही जताई कि केंद्र सरकार से उसे अपेक्षित सहयोग नहीं मिला। सरकारी सहयोग के बिना जांच ही क्या कर पाएगी कोई समिति। यों सर्वोच्च अदालत ने जांच की निगरानी का जिम्मा अपने एक रिटायर जज आरवी रविंद्रन को सौंपा था।

जांच तो तकनीकी विशेषज्ञों ने ही की होगी। पेगासस से जासूसी के आरोप लगाते समय तो विपक्ष ने कितना हंगामा किया था। जांच समिति ने काम शुरू किया तो सब नदारद हो गए। जांच समिति ने विज्ञापन जारी कर लोगों से अपील की थी कि जिन्हें अपने मोबाइल फोन की जासूसी का शक हो वे समिति के पास जमा करा दें।

आरोप तो सैकड़ों लोगों के मोबाइल की जासूसी का लगा था पर जांच समिति के पास जमा हुए महज 29 मोबाइल। इनमें भी केवल पांच में ही मैलवेयर मिलने के सबूत मिले। जांच समिति यह पुख्ता तौर पर तय नहीं कर पाई कि मैलवेयर पेगासस के कारण था। अदालत के फैसले ने आरोपों से घिरी केंद्र सरकार को उल्टा हथियार दे दिया विपक्ष पर वार करने का।

विपक्ष ने जांच समिति की सरकार से सहयोग न मिलने की शिकायत को मुद्दा बनाने की कोशिश की। वैसे भी तो सरकार ने अदालत को शुरू में ही कह दिया था कि उसे राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े इस मुद्दे को सार्वजनिक बहस का मुद्दा नहीं बनाना चाहिए। अदालत ने भी सरकार को आश्वस्त कर दिया था कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए की जाने वाली किसी भी गोपनीय कार्रवाई की तह में जाने की उसकी कोई मंशा नहीं।

विपक्ष ने रफाल के मुद्दे पर भी अपनी किरकिरी ही कराई थी। इस सौदे में कमीशन खोरी का सरकार पर आरोप लगाया था। संसद में कई दिन हंगामा हुआ था। अंतत: यह मुद्दा भी सुप्रीम कोर्ट में आया था। अदालत ने शुरू में ही साफ कर दिया था कि रफाल की कीमत के परीक्षण में वह नहीं पड़ेगी। सिर्फ खरीद की अपनाई गई प्रक्रिया को परखेगी।

आरोप कमीशन का था और उसका सीधा वास्ता कीमत से था। फिर सुप्रीम कोर्ट के लिए विपक्ष का मुद्दा तय करने के लिए बचा ही कहां था। तब भी अदालत ने खरीद प्रक्रिया सही होने का फैसला सुनाया था। सत्ता पक्ष को अदालत के इस फैसले से संजीवनी मिल गई थी। विपक्षी दल खुद तो संघर्ष का माद्दा नहीं दिखाते लेकिन अदालत से मनमाफिक फैसले की उम्मीद करते हैं।

अदृश्य की खोज
हिमाचल प्रदेश लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष पद पर नए अध्यक्ष की ताजपोशी हो गई और नए अध्यक्ष का शपथ ग्रहण भी हो गया। लेकिन सप्ताह पहले जब आयोग की सबसे वरिष्ठ सदस्य रचना गुप्ता अध्यक्ष बनी थी तो उसके शपथ ग्रहण को अचानक रातों-रात क्यों स्थगित कर दिया था पर से अभी तक पर्दा नहीं उठ पाया है।

आयोग एक संवैधानिक संस्थान है। यह आयोग ही है जो प्रदेश के तमाम राजपत्रित पदों जैसे हिमाचल प्रशासनिक सेवा, प्रदेश न्यायिक सेवा प्रदेश वन सेवा, प्रदेश पुलिस सेवा के पदों पर भर्ती करता है। ऐसे में कुछ भी ऐसा घट जाए जिससे अविश्वास पैदा हो गया हो तो उसे बहाल करने के लिए राजभवन से लेकर सचिवालय तक को शपथ ग्रहण के स्थगित हो जाने से पर्दा हटाया जाना चाहिए।

मुख्यमंत्री के स्तर पर तो शपथ ग्रहण रुका नहीं था क्योंकि मुख्यमंत्री व उनकी नौकरशाही ने तो नियुक्तियों की अधिसूचना निकालने के बाद शपथग्रहण का कार्यक्रम भी तय कर दिया था। राज्य में मुख्यमंत्री से बड़ा कौन होता है। राज्यपाल ने फाइल पर दस्तखत किए होंगे तभी तो समारोह को हरी झंडी मिली होगी।

जरूर कहीं ऐसी जगह से दबाव आया जिसके आगे न मुख्यमंत्री की चली और न ही राज्यपाल की। मायने साफ है कि किसी अदृश्य ताकत ने काम किया जो मुख्ययमंत्री व राज्यपाल दोनों से ज्यादा ताकतवर है।

कयासों से परे
केशव प्रसाद मौर्य उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री हैं। वे पिछला विधानसभा चुनाव हार गए थे। पर पिछड़े तबके का होना उनकी ढाल बन गया। उपमुख्यमंत्री तो वे योगी की पिछली सरकार में भी थे। पर मुख्यमंत्री के साथ तब उनके रिश्ते सहज नहीं थे। उन्हें मलाल था कि 2017 के जिस विधानसभा चुनाव में भाजपा को पहली बार बंपर बहुमत मिला, उस चुनाव के वक्त वे ही पार्टी के सूबेदार थे। लिहाजा मुख्यमंत्री की कुर्सी उन्हें मिलनी चाहिए थी।

हालांकि, योगी न बनते तो चर्चा तबके केंद्रीय मंत्री और अब जम्मू कश्मीर के उप राज्यपाल मनोज सिन्हा के मुख्यमंत्री बनने की ज्यादा चली थी। वे काशी विश्वनाथ मंदिर में शिव की आराधना करने चले गए और पीछे योगी ने मुकुट पहन लिया। केशव मौर्य को पिछले हफ्ते भाजपा आलाकमान ने दिल्ली बुलाया तो लगा कि सरकार छोड़ वे फिर पार्टी की सूबेदारी संभालेंगे।

उनके एक ट्वीट से इसे ज्यादा बल मिला। उन्होंने लिखा कि संगठन सरकार से बड़ा होता है। लेकिन बाजी मार ले गए भूपेंद्र चौधरी। जाट भी तो सूबे में पिछड़े तबके में ही आते हैं। जिसके नाम की चर्चा फैसले से पहले हो जाए, उसके पक्ष में नहीं होता नई भाजपा के दौर में फैसला। राष्ट्रपति, उप राष्ट्रपति और अब उत्तर प्रदेश भाजपा के सूबेदार के मामले में फिर मुहर लग गई इस धारणा पर। मौर्य अपने ट्वीट पर अफसोसजदा होंगे।
(संकलन : मृणाल वल्लरी)

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First published on: 27-08-2022 at 03:10:17 am
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