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कोरोना का दंश और राजनीति

त्रिवेंद्र सिंह रावत तो करीबियों से अब यही कह रहे हैं कि वे कुंभ के व्यापक आयोजन का विरोध कर रहे थे क्योंकि उन्हें कोरोना विस्फोट का अंदेशा था पर इसी चक्कर में संघ परिवार उनसे चिढ़ गया और उनके इस्तीफे की नौबत आ गई। कुर्सी तो जरूर गई पर त्रिवेंद्र सिंह रावत को इस बात का संतोष जरूर है कि उन्होंने जो आशंका जताई थी वह आखिर सही साबित हुई।

Raajpat, jansatta special storyउत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत और भाजपा नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया।

कुंभ की सियासत
उत्तराखंड में जब कुंभ के आयोजन की तैयारी चल रही थी तो मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत थे। वे साधु संतों को खुले मैदान में तंबू लगाने की इजाजत देने के पक्ष में नहीं थे। चाहते थे कि साधु संत अपने आश्रमों और अखाड़ों से ही सीधे गंगा तट पहुंचें। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरी इससे बिफर उठे थे। मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव पर जमकर भड़ास निकाली थी। तीरथ सिंह रावत ने सूबे की सरकार की कमान संभाली तो छह अप्रैल को मुख्य सचिव ओमप्रकाश के साथ हर की पैड़ी पर गंगा पूजन कर कुंभ की विधिवत शुरुआत के लिए पहुंचे थे तो महंत नरेंद्र गिरी और बौखला गए थे। मुख्य सचिव ओमप्रकाश को खरी खोटी सुनाई थी।

दो शाही स्नान निपटने के बाद हरिद्वार में कोरोना का जैसा विस्फोट सामने आया उससे त्रिवेंद्र सिंह रावत की आशंका सही साबित हो गई। बैरागी अखाड़ों के एक महामंडलेश्वर की जहां मौत हो गई वहीं खुद महंत नरेंद्र गिरी को कोरोना संक्रमण के बाद ऋषिकेश के एम्स में भर्ती होना पड़ा। उन्हीं के निरंजनी अखाड़े के और भी कई लोग संक्रमित हुए तो महंत रविंद्र पुरी और कैलाशानंद गिरी ने समझदारी दिखाई। अपने अखाड़े की छावनी को तीस अपै्रल के बजाए 17 अपै्रल से ही बंद करने का एलान कर दिया। अखाड़ों और आश्रमों में इस समय कोरोना का जैसा प्रकोप है उससे हर कोई भयभीत है। पिछले मुख्यमंत्री ने यही तो कहा था कि वे कोविड प्रोटोकाल तोड़कर हरिद्वार को वुहान नहीं बनने देंगे। महंत हरि गिरी तब उनके समर्थन में आए थे। पर नरेंद्र गिरी को हरि गिरी का यह फलसफा समझ नहीं आया था कि जान है तो जहान है। जान ही नहीं बचेगी तो कुंभ क्या मनाएंगे।

महंत नरेंद्र गिरी से यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की भी निकटता है। उनसे मिलने हरिद्वार आए थे और इसी चक्कर में खुद संक्रमित हो गए अखिलेश। त्रिवेंद्र सिंह रावत तो करीबियों से अब यही कह रहे हैं कि वे कुंभ के व्यापक आयोजन का विरोध कर रहे थे क्योंकि उन्हें कोरोना विस्फोट का अंदेशा था पर इसी चक्कर में संघ परिवार उनसे चिढ़ गया और उनके इस्तीफे की नौबत आ गई। कुर्सी तो जरूर गई पर त्रिवेंद्र सिंह रावत को इस बात का संतोष जरूर है कि उन्होंने जो आशंका जताई थी वह आखिर सही साबित हुई।

जुमलेबाजी
पंजाब में विधानसभा चुनाव तो अगले साल होंगे पर सभी सियासी दलों ने अपनी गोटियां अभी से बिछानी शुरू कर दी हैं। अब पंजाब की सियासत दो धु्रवीय नहीं रह गई है। चौतरफा होगा मुकाबला। त्रिकोणीय तो पिछली बार भी था। जब शिरोमणी अकाली दल-भाजपा गठबंधन की सरकार के सामने केवल कांग्रेस की चुनौती नहीं थी। अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने मुकाबले को रोचक बनाया था। नतीजतन सत्तारूढ़ अकाली दल-भाजपा गठबंधन की लुटिया डूब गई थी। बहुमत तो कांग्रेस को मिला था पर केजरीवाल की पार्टी ने शिरोमणी अकाली दल को तीसरे नंबर पर पहुंचा दिया था।

विवादास्पद कृषि कानूनों के कारण अकाली दल और भाजपा का दशकों पुराना गठबंधन टूट गया। अकाली दल के साथ अनबन के बाद भाजपा को यहां नए सिरे से पैर जमाने होंगे। लक्ष्मीकांता चावला जैसी पार्टी की कद्दावर नेता पहले ही बागी तेवर अपनाएं हैं। किसान आंदोलन ने भाजपा की बची खुची संभावनाओं पर पानी फेर दिया है। कैप्टन अमरिंदर सिंह 79 साल की उम्र पार कर चुके हैं। ऊपर से नवजोत सिंह सिद्धू के साथ उनका विवाद भी अभी तक हल नहीं हो पाया है।

ऐसे में अरविंद केजरीवाल भी दांव पेच आजमा रहे हैं। परेशान सुखबीर सिंह बादल की नजर अब सूबे के दलित वोट बैंक पर टिकी है। पंजाब में दलितोें की आबादी करीब 32 फीसद है। भाजपा के साथ गठबंधन के कारण पंजाब के दलित शिरोमणी अकाली दल के प्रति आकर्षित नहीं हो पाते थे। आंबेडकर जयंती के मौके पर सुखबीर सिंह बादल ने ऐलान कर दिया कि उनकी पार्टी सत्ता में आई तो दलित को उपमुख्यमंत्री बनाएगी। इसे महज जुमला बता कैप्टन अमरिंदर सिंह ने खूब तंज कसा। अपने करीबियों से तो यहां तक भी कहा कि दलितों के वाकई हितैषी होते तो जब केंद्र की राजग सरकार में शामिल थे तो अपनी पत्नी के बजाए किसी दलित को बनवा देते केंद्र में मंत्री।

भतीजा ही सही
राजस्थान की तीन विधानसभा सीटों के उपचुनाव के प्रचार का शोर गुरुवार शाम को थम गया था। सहाड़ा, सुजानगढ़ और राजसमंद में मुकाबला पहले की तरह दोतरफा न होकर त्रिकोणीय बन गया है। सांसद हनुमान बेनीवाल ने भी अपनी पार्टी रालोपा के उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं। भाजपा अपने बूथ प्रबंधन के कौशल और आरएसएस के नेटवर्क की बदौलत राजसमंद सीट को बचाने के फेर में है। गहलोत ने अगर राजसमंद भाजपा से छीन ली तो उनकी बल्ले-बल्ले हो जाएगी। कांग्रेस की तरफ से मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, सूबेदार गोविंद डोटासरा, सचिन पायलट और अजय माकन ने प्रचार किया है तो भाजपा की तरफ से सूबेदार सतीश पूनिया और केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने प्रचार का जिम्मा संभाला।

पार्टी की सबसे कद्दावर समझी जाने वाली नेता पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को प्रचार के लिए न किसी ने बुलाया और न वे खुद आई। आलाकमान ने उनकी भरपाई उनके भतीजे ज्योतिरादित्य सिंधिया की चुनावी सभाओं से करने की कोशिश जरूर की। बुआ नहीं तो भतीजा ही सही। (प्रस्तुति : अनिल बंसल)

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