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राह-ए-नौकरशाह

नौकरशाह अक्सर खुद को लेकर गलतफहमी पाल बैठते हैं कि राजनीतिक दल उन्हें सिरमाथे बिठाएंगे। जमीन से जुड़े नेता बखूबी जानते हैं कि जनाधार के मामले में तो सिफर ही होते हैं ज्यादातर नौकरशाह।

राह-ए-नौकरशाह
आरसीपी सिंह (बाएं) और अखिलेश यादव (दाएं)।

रामचंद्र प्रसाद सिंह नौकरशाह के नाते भले चतुर सुजान रहे हों पर सियासत में गलत आकलन कर बैठे। आरसीपी सिंह है उनका चर्चित नाम। इसी हफ्ते केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा देने को मजबूर हो गए। मजबूर किया उनके आका नीतीश कुमार ने। राज्यसभा का कार्यकाल ही खत्म हो गया तो फिर मंत्रिपद कैसे बचता? उत्तर प्रदेश काडर के 1984 बैच के आइएएस आरसीपी सिंह मूल रूप से बिहार के हैं। नीतीश कुमार के जिले नालंदा के तो हैं ही, नीतीश की जाति के है

नीतीश कुमार जब केंद्र में रेल मंत्री बने तो कुर्मी होने के नाते बेनी प्रसाद वर्मा ने सिफारिश कर आरसीपी को उनका निजी सचिव बनवा दिया। नीतीश मुख्यमंत्री बने तो आरसीपी उनके प्रधान सचिव बनकर बिहार सरकार में डेपुटेशन पर चले गए। फिर तो नीतीश बाबू के आंख-कान वे ही कहे जाने लगे। नीतीश ने 2010 में राज्यसभा भेज दिया। जल्द आरसीपी सिंह नीतीश के लिए उनके सबसे खास सखा राजीव रंजन सिंह से भी ज्यादा अहम बन गए।

पार्टी का अध्यक्ष बनाया तो निहितार्थ निकाले गए कि वही होंगे नीतीश के सियासी वारिस। लेकिन केंद्र में मंत्री बनने के बाद नीतीश के साथ उनके रिश्तों में खटास शुरू हो गई। नीतीश ने पिछले महीने उन्हें जब राज्यसभा का तीसरी बार उम्मीदवार नहीं बनाया तो आरसीपी ने नीतीश पर कटाक्ष करने से भी गुरेज नहीं किया।

उन्हें भरोसा रहा होगा कि भाजपा उन्हें राज्यसभा जरूर दे देगी। केंद्रीय मंत्री के नाते प्रधानमंत्री द्वारा की गई अपनी प्रशंसा से भी पाल लिया होगा उन्होंने ऐसा भ्रम। पर भाजपा उन्हें गले लगाकर नीतीश को नाराज कैसे कर सकती थी। आखिर गठबंधन धर्म का सवाल ठहरा।

नीतीश ने भी तो भाजपा के कहने से मुकेश सहनी की अपने मंत्रिमंडल से छुट्टी की थी। आरसीपी ने गुप्तेश्वर पांडे के अनुभव से भी सबक नहीं लिया। जिन्होंने राजनीति के मोह में वक्त से पहले डीजीपी का पद और आइपीएस की नौकरी छोड़ी थी। पर जद (एकी) ने चुनाव लड़ने का मौका ही नहीं दिया था।

नौकरशाह अक्सर खुद को लेकर गलतफहमी पाल बैठते हैं कि राजनीतिक दल उन्हें सिरमाथे बिठाएंगे। जमीन से जुड़े नेता बखूबी जानते हैं कि जनाधार के मामले में तो सिफर ही होते हैं ज्यादातर नौकरशाह।

काम और इल्जाम
हिमाचल प्रदेश में विधानसभा चुनाव आने वाले हैं। चुनाव के पहले जनकल्याणकारी योजनाओं को लागू करने का सिलसिला शुरू हो जाता है। इसी परंपरा को ध्यान में रखते हुए मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर इन दिनों तरह-तरह की योजनाओं के उद्घाटन व शिलान्यास में व्यस्त हैं।

उनकी ओर से की जा रही घोषणाओं को देख कर कांग्रेसी भी रंज खा रहे हैं कि अगर घोषणाओं की रफ्तार यूं ही बढ़ती रही तो पिछली सरकार में पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह की और आचार संहिता लगने से पहले आखिर के छह महीनों में की गई घोषणाओं का भी जयराम रेकार्ड तोड़ देंगे।

जबकि उपचुनावों के दौरान की गई घोषणाओं पर कुछ को छोड़ कर अभी तक अमलीजामा नहीं पहनाया जा सका है। मुख्यमंत्री इन दिनों कहीं भी जाते हैं तो कहीं तहसील, कहीं डिग्री कालेज, कहीं बीडीओ आफिस तो कहीं उप-तहसील खोलने की घोषणाएं करते जा रहे हैं। मंत्रिमंडल की बैठकों में भी इसी तरह का चलन चलन है। बड़ा सवाल वहीं आकर खड़ा हो जाता है कि घोषणाएं तो जितनी मर्जी कर लो लेकिन बजट तो कहीं है ही नहीं।

पिछली वीरभद्र सिंह सरकार में भी ऐसा ही इल्जाम भाजपा सरकार पर लगाती थी। अब कांग्रेस वही इल्जाम जयराम सरकार के खिलाफ दोहराने पर आ गई है। जाहिर है, सरकार चाहे कांग्रेस की हो या भाजपा की, तौर-तरीके तो दोनों के एक ही हैं। कर्ज लेते जाओ, घोषणाएं करते और जाओ और विकास को लेकर भ्रम फैलाते जाओ। प्रदेश में वैसे भी कोई तीसरा विकल्प तो अभी तक मजबूती से उभरा ही नहीं हैं।

संकट में सपा
उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी संकट में दिख रही है। उसका गठबंधन बिखर रहा है। विधानसभा चुनाव के बाद महान दल के केशव देव मौर्य ने नाराज होकर सपा से नाता तोड़ा था। चाचा शिवपाल यादव के साथ तो खैर कभी उनका मन ठीक से मिला ही नहीं था। लिहाजा प्रगतिशील समाजवादी पार्टी को टिकट भी कोई नहीं दिया सपा ने। खुद शिवपाल यादव भी समाजवादी पार्टी के चुनाव निशान से ही लड़े थे विधानसभा चुनाव।

चुनाव बाद से खासे मुखर रहे हैं अपने भतीजे के प्रति। अब ओमप्रकाश राजभर रूठ गए हैं। वजह बेटे के लिए एमएलसी की सीट नहीं मिलना है। केशव देव मौर्य की तरह ही राजभर ने भी यही फरमाया है कि सपा ने जयंत चौधरी के रालोद को ज्यादा अहमियत दी है। जबकि रालोद ने 34 सीटें लेकर भी केवल आठ ही जीती।

सुभासपा ने तो 14 सीटों में छह जीतकर रालोद से कहीं बेहतर प्रदर्शन किया। तो भी रालोद को राज्यसभा मिल गई, हमें विधानपरिषद सीट भी नहीं दी। विपक्ष के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार यशवंत सिन्हा लखनऊ आए तो सपा और रालोद के ही विधायकों को अखिलेश यादव ने उनसे मिलवाया।

इस पर राजभर से सवाल किया तो कटाक्ष भरे अंदाज में कह दिया कि सपा अध्यक्ष को अब मेरी जरूरत नहीं है, लिहाजा मुझे बुलाया ही नहीं। उन्हें तो बस जयंत चौधरी की जरूरत है।

(संकलन : मृणाल वल्लरी)

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