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मुफ्त पर मार

हार्दिक तो घोषित रूप से कांग्रेस से अलग हो गए लेकिन कांग्रेस में आए अन्य धाकड़ युवा नेता भी अभी तक अपनी खास पहचान नहीं छोड़ पा रहे हैं। पहले जिस तरह से टीवी चैनल की बहसों और रैलियों में कन्हैया कुमार का जलवा रहता था फिलहाल तो वे अदृश्य से हैं।

उत्तर प्रदेश सरकार के एक आदेश ने दो वर्ष से मुफ्त और सस्ता दोनों तरह का राशन ले रहे लोगों की बेचैनी बढ़ा दी है। जगह-जगह पिछले महीने भर से मुनादी की जा रही है कि जो पात्र नहीं हैं और राशन ले रहे हैं, वे अपने राशन कार्ड वापस कर दें। 20 मई तक वापस नहीं किए तो उनके खिलाफ राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के तहत कानूनी कार्रवाई होगी। उनसे गेहूं के दाम 24 रुपए किलो और चावल के दाम 32 रुपए किलो के हिसाब से वसूले जाएंगे। दरअसल कोविड-19 को देखते हुए सरकार ने सस्ते और मुफ्त दोनों तरह के अनाज की योजना लागू की थी। कोविड-19 संक्रमण खत्म हो जाने के बाद भी योजना को बंद नहीं किया गया।

पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में फायदा जो उठाना था। पांच में से चार राज्यों में भाजपा को मिली जीत के पीछे मुफ्त राशन को बड़ी वजह माना गया। बीच में कुछ दिन मुफ्त नमक और खाने का तेल भी बंटा था। कई लोगों ने खुद कबूला कि उन्होंने जिसका नमक खाया है, उसी को वोट देंगे। वे नमक को हलाल करेंगे। अब सरकार बन गई तो तीन महीने और बढ़ा दी मुफ्त राशन की योजना। लेकिन गेहूं की फसल आई तो सरकार की चिंता बढ़ गई। इस बार उत्पादन कम होने से गेहूं का बाजार भाव न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से भी ऊपर चल रहा है। सरकारी खरीद के लक्ष्य पूरे नहीं हो पा रहे। अंतरराष्ट्रीय बाजार में गेहूं की कीमत बढ़ गई और भारत का गेहूं विदेश जाता दिखा तो केंद्र सरकार ने इसके निर्यात पर पाबंदी लगा दी।

किसानों ने कहा भी कि उन्हें ज्यादा दाम मिलता तो सरकार को क्या परेशानी थी। बहरहाल सरकार को अपना खाद्यान्न का बफर स्टाक भी तो सुरक्षित रखना है। जो पात्र नहीं हैं वे भी ले रहे थे मुफ्त का राशन। पात्रता की कसौटी पर कसेंगे तो आधे रह जाएंगे राशन लेने वाले। जिसके पास चौपहिया वाहन हो, अपना पक्का घर हो, घर में कोई आयकर दाता हो, ग्रामीण क्षेत्र में परिवार की सालाना आय दो लाख रुपए और शहरी क्षेत्र में तीन लाख रुपए से ज्यादा हो या परिवार में किसी के पास शस्त्र का लाइसेंस हो, वह किसी भी तरह का सस्ता व मुफ्त राशन ले ही नहीं सकता। अनेक लोगों ने जगह-जगह अपने राशन कार्ड वापस भी किए हैं। कुछ नाक-भौं सिकोड़ रहे हैं कि मतलब निकल गया तो ऐसा सलूक कर रहे हैं। वोट की जरूरत थी तो राशन कार्ड के बिना और किसी भी दुकान से दे रखी थी राशन लेने की छूट।

जाने के बाद
पूर्व संचार मंत्री चले गए। इन दिनों उनके मंडी के गांव बाड़ी स्थित घर पर शोक जताने वालों का मेला लगा हुआ है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा तक यहां शोक जताने पहुंच चुके हैं। मुख्यमंत्री जय राम ठाकुर भी तीन-चार बार उनके परिवार से मिल चुके हैं। कांग्रेस की प्रदेशाध्यक्ष प्रतिभा सिंह, नेता विपक्ष मुकेश अग्निहोत्री समेत सभी बड़े नेता विधायक पहुंचे। भाजपा की ओर से प्रदेश प्रभारी अविनाश खन्ना, सह प्रभारी संजय टंडन समेत तमाम बड़े नेता गांव बाड़ी जाकर अफसोस जता आए हैं। सुख राम के पुत्र अनिल शर्मा वर्तमान में भाजपा विधायक हैं और उनके पोते आश्रय शर्मा कांग्रेस पार्टी में ओहदे पर हैं।

अब शोक जताने की जिस तरह से होड़ लगी है उससे सुख राम परिवार की अगले राजनीतिक कदम को लेकर असमंजस बन गया है। यह परिवार जिस पर हर चुनाव में मौका देख कर रंग बदलने का आरोप लगता है आने वाले विधानसभा चुनावों में किसके साथ जाएगा, यह किसी को नहीं पता। भाजपा-कांग्रेस बराबर डोरे डाल रही है कि सुख राम का जो एक बड़ा वोट बैंक मंडी क्षेत्र में है वह इस परिवार यानी अनिल शर्मा और आश्रय शर्मा की मार्फत उनके हाथ लग जाए। उनके परिवार ने अपने राजनीतिक पत्ते नहीं खोले हैं। अब क्या जिस तरह से वीरभद्र के निधन के बाद प्रतिभा की मार्फत कांग्रेस ने मंडी लोक सभा की सीट सहानुभूति के सहारे ही हथिया ली, क्या सुख राम की सहानुभूति भी कोई करिश्मा करेगी इस पर सबकी नजरें हैं।

फिक्र में युवा शिविर
हार्दिक पटेल ने जिस तरह से कांग्रेस छोड़ी वह कोई आश्चर्य की बात नहीं है। उन्होंने अभी तक यह भी साफ नहीं किया है कि वे किस पार्टी में जाएंगे। लेकिन उनके सारे बयान जिस तरह भाजपा के पक्ष में आ रहे हैं उससे इशारा साफ है। हालांकि शुरुआत से ही हार्दिक पटेल की भाषा उसी तरह की थी, जिसे आज राहुल गांधी भाजपा की विचारधारा मानते हैं। हार्दिक कभी भी कांग्रेस की विचारधारा से जुड़ते हुए नहीं दिखे। हार्दिक तो घोषित रूप से कांग्रेस से अलग हो गए लेकिन कांग्रेस में आए अन्य धाकड़ युवा नेता भी अभी तक अपनी खास पहचान नहीं छोड़ पा रहे हैं। पहले जिस तरह से टीवी चैनल की बहसों और रैलियों में कन्हैया कुमार का जलवा रहता था फिलहाल तो वे अदृश्य से हैं।

हिंदी पट्टी में जलवा बिखेरने के बावजूद उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में भी उनकी छवि ठीक तरह से नहीं उभरी। कांग्रेस जिस धूमधाम से युवा नेताओं को पार्टी में लेकर आई थी उससे लगा था कि हिंदी पट्टी से लेकर गुजरात तक पार्टी कुछ बेहतर कर सकेगी। लेकिन हुआ इसका उल्टा ही। हालांकि उदयपुर शिविर में कांग्रेस के वरिष्ठों के बरक्स कन्हैया कुमार और गुजरात के निर्दलीय विधायक जिग्नेश मेवाणी को तवज्जो दी गई थी। जिग्नेश मेवाणी अभी तक कांग्रेस की छवि के साथ जुड़े हुए हैं। वे नियम-कानून के कारण कांग्रेस में शामिल नहीं हो सकते। देखना यह है कि इन दोनों युवाओं से पार्टी बेहतर हो पाती है या नहीं।

(संकलन : मृणाल वल्लरी)

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