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चुनाव में वोट की जुगत और टिकट का चक्कर

अरविंद केजरीवाल ने पिछले दिनों प्रदूषण की रोकथाम के लिए पूरी दिल्ली को जिस तरह पोस्टरों से पाट दिया तो लगा कि पोस्टरों से हुए प्रदूषण का क्या किया जाएगा। केजरीवाल सरकार ने मास्क पहनने की शिक्षा देते हुए नया पोस्टर जारी किया है।

Rajpaat, UP Election
राष्ट्रीय लोकदल के नेता जयंत चौधरी और दिल्ली में लगे आम आदमी पार्टी के पोस्टर।

आपदा में अवसर
पश्चिमी उत्तर प्रदेश को लेकर भाजपा कुछ ज्यादा ही चिंतित दिख रही है। तमाम बड़े नेता गली मोहल्ले में वोट मांगते घूम रहे हैं। शुरुआत खुद गृह मंत्री अमित शाह ने की। वह भी कैराना से। भाजपा ने 2014 के लोकसभा चुनाव में कैराना से हिंदुओें के पलायन को मुद्दा बनाया था।

मुजफ्फरनगर के 2013 के सांप्रदायिक दंगों के कारण हुए ध्रुवीकरण ने पार्टी की राह ऐसी आसान बनाई कि न केवल 2014 बल्कि 2017 के विधानसभा और फिर 2019 के लोकसभा चुनाव में भी इस इलाके के मतदाताओं ने भाजपा को छप्पर फाड़ सीटें दे दी। पर ध्रुवीकरण के मुद्दे की आड़ में कोई सरकार अपने खराब प्रदर्शन पर पर्दा कब तक डाल सकती है।

महंगाई, बेरोजगारी, किसानों की तकलीफ और कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर में सरकार की नाकामी जैसे मुद्दों से लोग ध्यान हटाते भी तो दिल्ली की सीमाओं पर 13 महीने तक चले किसान आंदोलन ने ग्रामीण इलाकों में हिंदू मुसलमान भाईचारे की इबारत लिख दी तो नेताओं को परेशानी होनी ही थी।

जाट और मुसलमान दोनों ही यहां चरण सिंह का साथ देते थे। जयंत चौधरी ने भी यही दांव खेला है। पर भाजपा की पुरजोर कोशिश इन दोनों जमातों के बीच बने भाईचारे में विघ्न डालने की है।

जाटों पर डोरे डालने के लिए दिल्ली के सांसद प्रवेश वर्मा के घर पर अमित शाह ने गणतंत्र दिवस को इलाके के अपनी पार्टी के जाट नेताओं को बुलाया। उनकी समस्याएं सुनी।

किसी ने चौधरी चरण सिंह को भारत रत्न नहीं देने का दुखड़ा रोया तो किसी ने योगी राज में किसानों की दुर्गति का। किसी ने केंद्रीय सेवाओं में जाट आरक्षण का वादा पूरा न करने की तोहमत लगाई तो अवसर देख संजीव बाल्यान ने अपने चेलों से केंद्र में कैबिनेट स्तर का एक भी जाट मंत्री न होने का मुद्दा उठवा दिया।

बाल्यान पिछली बार भी राज्य मंत्री थे और इस बार भी। भाजपा नेता ने यह तो जरूर कहा कि जाट बिरादरी का उन पर ऋण है पर शिकवे-शिकायत से किनारा कर गए।

सफाई दी कि हरियाणा के चौधरी बीरेंद्र सिंह को कैबिनेट मंत्री बनाया था पर वे 75 के हो गए तो हटाना पड़ा। बेचारे बाल्यान ने आपदा में अवसर तलाशने की कोशिश तो खूब की पर अमित शाह जैसे सियासी खिलाड़ी उनकी चाल में नहीं फंसे।

सीटों पर सितम
उत्तराखंड कांग्रेस में विधानसभा चुनाव के टिकटों को लेकर भाजपा से ज्यादा घमासान मचा हुआ है। कांग्रेस की चुनाव अभियान समिति के प्रदेश अध्यक्ष हरीश रावत और उनके पूर्व चेले रणजीत सिंह रावत में रामनगर विधानसभा सीट को लेकर इतनी जबरदस्त जुबानी जंग हुई कि पार्टी हाईकमान को दोनों रावतों को मनाने के चक्कर में पांच विधानसभा क्षेत्रों के टिकट बदल डालने पड़े।

इस खींचातानी में हरीश रावत एक ही झटके में अपनी बेटी अनुपमा रावत को हरिद्वार ग्रामीण विधानसभा सीट से टिकट दिलवाने में कामयाब हो गए और पार्टी हाईकमान ने एक परिवार से एक व्यक्ति को टिकट देने के सिद्धांत को तिलांजलि दे दी।

अपनी बेटी अनुपमा को टिकट दिलवाने के चक्कर में हरीश रावत ने हरिद्वार जनपद के ज्वालापुर सुरक्षित सीट से कांग्रेस की सबसे मजबूत उम्मीदवार बरखा रानी का टिकट ही कटवा दिया और उनकी जगह वाल्मीकि समाज के रवि बहादुर को टिकट दिलवा दिया जो ज्वालापुर विधानसभा सीट में बाहरी उम्मीदवार है।

इस सीट पर दलित मतदाताओं में वाल्मीकि समाज के लोग नाम मात्र के हैं। रवि बहादुर को टिकट देने का दलित समाज के अन्य लोग विरोध कर रहे हैं। रवि बहादुर कांग्रेस के सफाई कर्मियों के आयोग के पूर्व अध्यक्ष किरण बाल वाल्मीकि के बेटे हैं जो हरीश रावत के खास हैं। अनुपमा रावत को टिकट देने पर हरीश रावत के परिवार में भी आपस में विवाद छिड़ गया है।

हरीश रावत के बेटे वीरेंद्र रावत हरिद्वार जिले की खानपुर विधानसभा सीट से टिकट मांग रहे हैं। वीरेंद्र रावत के समर्थन में हरीश रावत के दूसरे बेटे आनंद रावत खुलकर आ गए हैं।

मुखड़े पर मास्क न सोहे
हर अवसर पर अपने चेहरे के प्रचार का मोह रखने वाले नेताओं की मानसिकता कोरोना भी नहीं बदल सका है। राजनीतिज्ञों के पोस्टर उनकी आत्ममुग्धता की निशानी होते हैं।

अरविंद केजरीवाल ने पिछले दिनों प्रदूषण की रोकथाम के लिए पूरी दिल्ली को जिस तरह पोस्टरों से पाट दिया तो लगा कि पोस्टरों से हुए प्रदूषण का क्या किया जाएगा। केजरीवाल सरकार ने मास्क पहनने की शिक्षा देते हुए नया पोस्टर जारी किया है।

इस पोस्टर में एक स्त्री की तस्वीर है, जिसने मास्क पहन रखा है। लेकिन इस पोस्टर में अरविंद केजरीवाल के चमकते चेहरे को मास्क से दूर ही रखा गया है। शायद उन्हें लगा होगा कि मास्क पहनने के बाद पोस्टर पर किया गया खर्च व्यर्थ चला जाएगा। लेकिन कम से कम दिल्ली में तो अरविंद केजरीवाल को इस बात का भरोसा होना चाहिए था कि उन्हें लोग मास्क के साथ भी पहचान लेंगे।

दुखद यह है कि जिस पोस्टर का संदेश ही मास्क लगाना था वहां राज्य के मुखिया ही मास्क नहीं लगा रहे हैं। कुछ चीजों का प्रतीकात्मक महत्व होता है। अगर अरविंद केजरीवाल इस मास्क में फोटो के साथ दिखते तब तो स्वास्थ्य जागरूकता की बात समझ में आती। अरविंद केजरीवाल के इस पोस्टर को देख कोई नटखट बच्चा स्कूल में टीचर से कह सकता है, सीएम अंकल ने मास्क नहीं पहना तो मैं क्यों पहनूं? (संकलन : मृणाल वल्लरी)

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