ताज़ा खबर
 

सियासी गुटबाजी और राजपाट

राजस्थान में 17 अप्रैल को सहरा, सुजानगढ़ और राजसमंद के लिए मतदान होगा। इनमें सुजानगढ़ और सहरा आम चुनाव में कांग्रेस ने जीती थी जबकि राजसमंद भाजपा ने।

Raajpat, Karnataka, Rajasthan, Uttarakhandकर्नाटक के सीएम बीएस येदियुरप्पा और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत। (फोटो- जनसत्ता)

भगवा अंतर्कलह
कर्नाटक में भाजपा की गुटबाजी और अंतरकलह थमने का नाम ही नहीं ले रही। पिछले तीन महीने के दौरान सूबे में मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा विपक्षी कांग्रेस के प्रहारों से उतने परेशान नहीं हैं, जितने अपनों के घातक हमलों से। लेकिन आलाकमान ने उनके हाथ बांध रखे हैं। वे 78 साल की उम्र पार कर जाने पर भी अपने दम पर आलाकमान को अपने मुख्यमंत्री बने रहने के लिए मजबूर तो जरूर कर पाए हैं पर फैसले सारे अपने मन माफिक नहीं कर सकते। तभी तो पार्टी के नेता ही उनकी खुलेआम टांग खींच रहे हैं। विधायक बासनगौड़ा पाटिल यतनाल ने उन पर वंशवाद को बढ़ावा देने और उनके बेटों पर परोक्ष रूप से सरकार के फैसलों को प्रभावित कर भ्रष्टाचार करने के आरोप लगाए।

आलाकमान ने बमुश्किल उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी कर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ ली। उसके बाद उनके एक मंत्री रमेश जरखीहोली एक सेक्स सीडी कांड में ऐसे फंसे कि पद से इस्तीफा देना पड़ा। उन पर एक युवती को सरकारी नौकरी देने का झांसा देकर उसका यौन उत्पीड़न करने का आरोप भी लगा है। इससे विपक्षी कांग्रेस को तो एक मुद्दा मिल ही गया। येदियुरप्पा हालांकि अपनी कुर्सी बचाने की रणनीति में अभी तक सफल हैं। पार्टी के महामंत्री (संगठन) बीएल संतोष कर्नाटक के ही ठहरे। वे येदियुरप्पा को ज्यादा पसंद नहीं करते। लेकिन येदियुरप्पा ने जनता दल (एस) के एचडी देवगौड़ा और उनके बेटे कुमार स्वामी को पटाकर आलाकमान को यह संदेश पहले ही दे दिया था कि उनकी मर्जी के बिना उन्हें मुख्यमंत्री पद से कोई नहीं हटा सकता। अतीत में भी येदियुरप्पा ने भाजपा से बगावत कर अपनी अलग पार्टी बनाई थी। बहरहाल ताजा सिरदर्द तो येदियुरप्पा का उनके मंत्री केएस ईश्वरप्पा ने बढ़ाया है।

अपने ग्रामीण विकास व पंचायती राज विभाग में येदियुरप्पा के बेजा हस्तक्षेप का आरोप लगाते हुए शिकायत राज्यपाल वजू भाई वाला से कर डाली है। कोई पूछे कि अपने ही मुख्यमंत्री के खिलाफ राज्यपाल से शिकायत कर भला कोई मंत्री पद पर कैसे बना रह सकता है। लेकिन आलाकमान का रवैया देखिए। दिल्ली में सूबे के प्रभारी महासचिव अरुण सिंह ने बस यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि मंत्री जी को अपनी बात उचित फोरम पर रखनी चाहिए थी। राज्यपाल से शिकायत नहीं करनी चाहिए थी। ईश्वरप्पा और येदियुरप्पा की यह अदावत किस करवट बैठेगी, यह तो जेपी नड्डा ही तय कर सकते हैं। येदियुरप्पा जानते हैं कि उनके खिलाफ असंतोष को हवा दिल्ली से ही मिल रही है।

कौरव कौन
राजस्थान में 17 अपै्रल को सहरा, सुजानगढ़ और राजसमंद के लिए मतदान होगा। इनमें सुजानगढ़ और सहरा आम चुनाव में कांग्रेस ने जीती थी जबकि राजसमंद भाजपा ने। राजसमंद की भाजपा विधायक किरण माहेश्वरी पार्टी की कद्दावर नेता थीं। उदयपुर की महापौर और सांसद भी रह चुकी थीं। वसुंधरा राजे की पिछली सरकार में वे मंत्री भी रही थीं। भाजपा ने सहानुभूति वोट के चक्कर में उन्हीं की बेटी दीप्ति माहेश्वरी को उम्मीदवार बनाया है। सहानुभूति वोट का मोह कांग्रेस भी नहीं छोड़ पाई इसीलिए सुजानगढ़ में अपने दिवंगत विधायक भंवर लाल मेघवाल की सीट पर उनके बेटे मनोज मेघवाल को और सहरा सीट पर कैलाश त्रिवेदी की जगह उनकी पत्नी गायत्री देवी को मैदान में उतारा है।

भाजपा ने सुजानगढ़ में पूर्व मंत्री खेमाराम मेघवाल और सहरा में दो बार विधायक रहे रतन लाल जाट को उम्मीदवार बनाया है। कांग्रेस ने दीप्ति माहेश्वरी के मुकाबले राजसमंद में तनसुख बोहरा को टिकट दिया है। जो विधानसभा अध्यक्ष सीपी जोशी के करीबी माने जाते हैं। भाजपा के सामने एक तरफ तो अपनी सीट राजसमंद को बचाने की चुनौती है तो दूसरी तरफ अशोक गहलोत के खिलाफ हवा बनाने के लिए पार्टी चाहेगी कि वह कांग्रेस की दो में से कम से कम एक सीट जरूर छीन ले। उसके बाद ही वह कह पाएगी कि गहलोत सरकार लोकप्रियता खो रही है। उपचुनाव के नतीजे गहलोत सरकार की स्थिरता पर भी असर डालेंगे। ज्यादा बहुमत नहीं है उनके पास। ऊपर से सचिन पायलट की बगावत की तलवार अभी तक पूरी तरह हटी नहीं है।

कुपित अखाड़े
मुख्यमंत्री तो बदल दिया पर कुंभ की व्यवस्था में तो खास सुधार नहीं कर पाई है भाजपा। मेले की सरकारी अधिसूचना मेले की शुरुआत के साथ ही एक अप्रैल को जारी हो गई। लेकिन एक दिन पहले बैरागी साधुओं ने जमकर हंगामा कर दिया। मेले की व्यवस्था देखने गए अपर मेला अधिकारी सरदार हरबीर सिंह के साथ न केवल बदसलूकी की बल्कि मारपीट भी कर डाली। अपर मेला अधिकारी के कपड़े फाड़ उन्हें निर्वस्त्र करने का प्रयास किया। उनके सुरक्षाकर्मी की भी वर्दी फाड़ दी। इस घटना से बैरागी अखाड़े अलग-थलग पड़ गए हैं। इन अखाड़ों की नाराजगी की असल वजह कुछ और बताई जा रही है। पिछले मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने इन्हें जमीन आबंटित करने से इनकार कर दिया था। अपने आश्रमों में रहकर ही कुंभ मनाने की सलाह दी थी। कोरोना का संक्रमण नए सिरे से फैलने की खबरों के बीच एक तरफ तो श्रद्धालुओं पर कोरोना जांच की शर्त लगाने से मेला पहले ही फीका पड़ गया था। कुछ उल्लास बैरागी अखाड़ों के साधुओं की हरकत से कम हो गया। (प्रस्तुति : अनिल बंसल)

Next Stories
1 सियासी संग्राम और राजनीतिक मर्यादा
2 सियासत और सियासी गतिविधियां
3 राजपाट और सियासी तेवर
ये पढ़ा क्या?
X