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सियासी संग्राम और राजनीतिक मर्यादा

चार साल बाद अचानक किसी को हटाया जाए तो अखरना यों स्वाभाविक है। लेकिन इस कदर बागी तेवर तो न नित्यानंद स्वामी ने दिखाए थे और न भुवनचंद्र खंडूरी ने। जब इस्तीफा हुआ था, बागी तेवर तभी दिखने लगे थे त्रिवेंद्र सिंह रावत के। पत्रकारों ने हटाए जाने का कारण पूछा था तो तपाक से नाराजगी जुबान पर आ गई थी। कहा था कि हटाने की वजह दिल्ली वाले बताएंगे। दिल्ली वाले यानी आलाकमान।

RAAJPAT, Bihar, Delhiआरजेडी नेता तेजस्वी यादव और दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल। (फोटो- जनसत्ता)

सियासी संग्राम
बिहार में राजनीतिक कटुता ज्यादा ही बढ़ गई है। मंगलवार को राजद के विधायकों और समर्थकों पर विधानसभा के भीतर और बाहर हुए बल प्रयोग से नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव बौखला गए हैं। नीतीश कुमार को चचा कहने वाले तेजस्वी चिढ़कर कुर्सी कुमार कहने लगे थे। चुभने वाला भले हो पर यह संबोधन असंसदीय कतई नहीं था। अब तो उन्होंने नीतीश को निर्लज्ज कुमार कह डाला है। भीष्म प्रतिज्ञा भी कर डाली है कि जब तक राजद के विधायकों और कार्यकर्ताओं पर बर्बर लाठीचार्ज करने वाले पुलिस वालों पर कार्रवाई नहीं होगी और नीतीश कुमार माफी नहीं मांगेंगे, राजद के सभी विधायक विधानसभा का बहिष्कार करेंगे।

मंगलवार की घटना को लेकर राबड़ी देवी ने भी नीतीश कुमार की खासी आलोचना कर डाली। पर तेजस्वी ने तो उन्हें पहले निर्लज्ज कुमार कहा, फिर सी ग्रेड की पार्टी का सी ग्रेड नेता बताया। सी ग्रेड यहां द्विअर्थी ठहरा। सी आता है ए और बी के बाद। यानी तीसरे नंबर पर। जनता दल (एकी) संख्या बल के हिसाब से बिहार में इस समय तीसरे नंबर की ही पार्टी ठहरी। पर सी ग्रेड के नेता कहना अटपटा जरूर है। हद तो तब हो गई जब तेजस्वी ने यह कहा कि जद (एकी) के गुंडे जब राजद की महिलाओं का चीर हरण कर रहे थे तो नीतीश इंद्रिय रस प्राप्त कर रहे थे। नीतीश तो अपने स्वभाव के अनुरूप अभी तक तमाम आलोचनाओं पर चुप्पी साधे हैं पर उनके नए हिमायती उपेंद्र कुशवाह उनके बचाव में कूद पड़े हैं। जिन्होंने तेजस्वी को जुबान पर लगाम लगाने की नसीहत दी हैै। साथ ही निशाना भी साधा है कि तुमको मेरी सलाह है कि अपनी कब्र मत खोदो, जबान पर लगाम रखो, वरना नौवीं फेल कहने वालों को और मौका ही देते जाओगे।

कौरव कौन
त्रिवेंद्र सिंह रावत तो बगावत पर आमादा लगते हैं। वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में थे। उनसे अनुशासन की अपेक्षा अनुचित नहीं। मुख्यमंत्री पद से खुद को हटाया जाना उन्हें ज्यादा ही अखर रहा है। चार साल बाद अचानक किसी को हटाया जाए तो अखरना यों स्वाभाविक है। लेकिन इस कदर बागी तेवर तो न नित्यानंद स्वामी ने दिखाए थे और न भुवनचंद्र खंडूरी ने। जब इस्तीफा हुआ था, बागी तेवर तभी दिखने लगे थे त्रिवेंद्र सिंह रावत के। पत्रकारों ने हटाए जाने का कारण पूछा था तो तपाक से नाराजगी जुबान पर आ गई थी। कहा था कि हटाने की वजह दिल्ली वाले बताएंगे। दिल्ली वाले यानी आलाकमान।

अब एक पखवाड़े बाद अपने विधानसभा क्षेत्र डोईवाला गए तो होली मिलन के एक कार्यक्रम में खुद को पद से हटाने की तुलना महाभारत के अभिमन्यु वध से कर डाली। फरमाया कि बेटे की मौत के बाद द्रौपदी की आंखों में आंसू नहीं थे। उसने पांडवों से अभिमन्यु के छल से हुए वध का बदला लेने की बात कही थी। त्रिवेंद्र सिंह रावत ने इस प्रसंग के बहाने अपने समर्थकों को पार्टी आलाकमान से बदला लेने के लिए ही तो उकसाया। आवेश में अभिमन्यु को द्रौपदी का पुत्र भी बता दिया। जबकि अभिमन्यु थे सुभद्रा के बेटे। आलाकमान को त्रिवेंद्र सिंह ने और भी ललकारा और कहा कि राजनीति की काली सुरंग से वे साफ सुथरे और बेदाग निकले हैं। अच्छा होता कि त्रिवेंद्र सिंह अपने साथ छल करने वालों का नाम भी बता देते।

बहरहाल त्रिवेंद्र सिंह रावत के उत्तराधिकारी तीरथ सिंह रावत की जुबान भी कुछ ज्यादा ही फिसल रही है। पहले लड़कियों की फटी जींस पहनने के मिजाज की आलोचना कर विवादों में फंसे थे। लानत मलानत ज्यादा हुई तो माफी मांग ली। लेकिन उसके बाद प्रधानमंत्री की तुलना भगवान राम से कर बैठे। भविष्यवाणी भी कर डाली कि आने वाले समय में लोग राम की तरह उन्हें भी पूजेंगे। अब राशन के मामले में भी अटपटा बयान दे डाला। कहा कि जिन्होंने ज्यादा बच्चे पैदा किए उन्हें ज्यादा राशन मिल गया। जिन्हें कम मिला, वे खुद कसूरवार हैं। कम बच्चे क्यों पैदा किए। जल्दबाजी में यह भी कह गए कि भारत दो सौ साल अमेरिका का गुलाम रहा।

संकट में भाजपा
पंजाब विधानसभा के चुनाव में अब ज्यादा वक्त नहीं है। किसान आंदोलन के बाद लगता है कि भाजपा ने पंजाब की अहमियत घटा दी है। अपना खुद का तो वैसे भी इस सूबे में कभी ज्यादा वजूद रहा नहीं भाजपा का। जाहिर है कि विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी या कांग्रेस से तो भाजपा गठबंधन करेगी नहीं। आम आदमी पार्टी ने तो पिछले चुनाव में अकाली दल और भाजपा दोनों के गठबंधन को ही तीसरे नंबर पर धकेल दिया था। सियासी सर्वेक्षण अब भी कांग्रेस की स्थिति कमजोर नहीं आंक रहे पर केजरीवाल तो अपनी गोटियां फिट करने में लगे ही हैं।

कांग्रेस में अभी तय नहीं कि चुनाव कैप्टन अमरिंदर की अगुवाई में ही लड़ा जाएगा या कोई और होगा नेता। कैप्टन अब 79 वर्ष की उम्र पार कर चुके हैं। नवजोत सिंह सिद्धू से अभी तक कैप्टन की अदावत दूर नहीं हो पाई है। भाजपा दूसरे दलों की टोह ले रही है। भाजपा की वरिष्ठ नेता और सूबे में मंत्री रह चुकी लक्ष्मी कांता चावला की अमृतसर में अरविंद केजरीवाल से हुई मुलाकात को इसी नजरिए से देखा जा रहा है। चावला हालांकि काफी समय से अपनी पार्टी और केंद्र की सरकार दोनों की ही मुखर आलोचक बनी है। (प्रस्तुति : अनिल बंसल)

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