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ढीली अकड़

कोरोना अभी कहर बरपा रहा है, लेकिन शासन-प्रशासन से जुड़े शीर्ष के लोग भी इसे लेकर लापरवाही बरत रहे हैं। जब किसी सूबे के अगुआ ही कोरोना के नियम-कायदों का पालन ठीक से नहीं करेंगे तो आम लोगों से क्या उम्मीद की जा सकती है।

ढीली अकड़
विजय कुमार सिन्हा (बाएं) और बनवारी लाल (दाएं)

नीतीश कुमार के पलटी मार जाने से बिहार में भाजपा सदमे की स्थिति में है। आरोप जड़ने के लिए राज्यसभा सदस्य सुशील मोदी को ही मैदान में उतार दिया। सुशील मोदी ने फरमाया कि उपराष्ट्रपति बनाने की नीतीश की मांग भाजपा ने स्वीकार नहीं की, जिससे वे खफा हो गए। नीतीश ने खुद तो इसे मजाक बताकर खारिज कर दिया पर मोदी पर पलटवार किया उनके पार्टी अध्यक्ष राजीव रंजन सिंह ने। हमदर्दी जताते हुए कहा कि मोदी को तो उपमुख्यमंत्री पद से ही हटा दिया था उनकी पार्टी ने नीतीश का हमदर्द होने के कारण।

नीतीश को उम्मीद थी कि विधानसभा अध्यक्ष विजय कुमार सिन्हा खुद इस्तीफा दे देंगे, जो भाजपा के हैं। भाजपा अब विपक्ष में है इस नाते अध्यक्ष को नैतिकता का पालन करना चाहिए। लेकिन अध्यक्ष मौन हैं। दोनों दलों के बीच टकराव की एक वजह सदन के भीतर अध्यक्ष का मुख्यमंत्री विरोधी आचरण भी रहा। अध्यक्ष ने राजद, कांगे्रस और वामपंथी विधायकों के खिलाफ पुरानी अनुशासन की कार्यवाही की रिपोर्ट में दिलचस्पी दिखाई तो नीतीश खेमा चौकन्ना हो गया। जिस धोबी पाट से भाजपा ने महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे को बेबस बनाया था, वही धोबी पाट जद (एकी) ने भाजपा पर चल दिया। सिन्हा सदस्यों को अयोग्य घोषित करें इससे पहले ही उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दे दिया।

सदन की बैठक में अब सरकार के विश्वास प्रस्ताव से भी पहले अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर मतदान होगा। सत्तारूढ़ गठबंधन के पास सदन में जितना संख्याबल है उसे देखते हुए विधानसभा अध्यक्ष को जाना ही होगा। सदन की कार्यवाही उपाध्यक्ष चलाएंगे जो जद (एकी) के हैं। अच्छा होता कि सिन्हा खुद इस्तीफा दे देते। पर वे भी अपने आलाकमान के इशारों पर ही तो चलेंगे।

इस बीच नीतीश ने विधान परिषद के अध्यक्ष अवधेश नारायण सिंह पर भी इस्तीफे का दबाव बनाया है। अवधेश नारायण सिंह भी भाजपा के ठहरे। जद (एकी) में उनसे हमदर्दी रखने वाले नेता उन्हें सलाह दे रहे हैं कि विजय कुमार सिन्हा की तरह वे अपने खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव की नौबत आने से पहले इस्तीफा दे देंगे तो उनकी गरिमा बनी रहेगी।

विचलित अविश्वास
हिमाचल प्रदेश विधानसभा के अंतिम सत्र के दौरान कांग्रेस विधायक और एकमात्र वामंपथी विधायक राकेश सिंघा जयराम सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव ले आए। इस प्रस्ताव को लाने के लिए एक तिहाई विधायकों की जरूरत थी। कांग्रेस के विधानसभा में 22 ही विधायक थे। ऐसे में कांग्रेस को इस प्रस्ताव को लाने के लिए 23 विधायकों की जरूरत थी तो उन्होंने सिंघा से बात की। प्रस्ताव में महंगाई, भ्रष्टाचार, कानून व्यवस्था के अलावा दो निर्दलीय विधायकों की ओर से भाजपा में जाने का मसला भी शामिल किया गया था। लेकिन सिंघा ने कहा कि इन विधायकों के मसले को प्रस्ताव से निकाल देना चाहिए। अब कुछ ही महीने बचे है चुनावें के लिए।

ऐसे में इस मसले पर बात करने से कुछ ज्यादा फायदा भी नहीं है। कांग्रेस विधायकों ने उनकी बात मान भी ली और प्रस्ताव पर सिंघा के दस्तखत हो गए। इन सब विधायकों की रणनीति थी कि आखिरी सत्र है और इसके बाद सबको चुनाव में जाना है। ऐसे में सरकार को जितना घेरा जा सकता है घेर लो। यह रणनीति कामयाब भी रही। लेकिन निजी तौर पर एक-दूसरे को निशाना बनाने से सभी बचते रहे।

सभी को खतरा था कि व्यक्तिगत तौर पर निशाना बनाया गया तो कइयों की पोल खुल जाएगी। लेकिन सदन में तब सारे भाजपा विधायक मंद-मंद मुस्कराते नजर आए जब भाजपा विधायकों ने चर्चा के दौरान कहा कि सिंघा ने कांग्रेसियों का साथ तो दे दिया लेकिन चुनावों में कांग्रेसी इनका साथ कभी नहीं देंगे। ठियोग विधानसभा हलके में पिछली बार सिंघा कांग्रेसियों के मतों से ही जीते थे। इस बार पता नहीं उन्हें कांग्रेसियों का साथ मिलेगा या नहीं?

संक्रमित अतिथि
कोरोना अभी कहर बरपा रहा है, लेकिन शासन-प्रशासन से जुड़े शीर्ष के लोग भी इसे लेकर लापरवाही बरत रहे हैं। जब किसी सूबे के अगुआ ही कोरोना के नियम-कायदों का पालन ठीक से नहीं करेंगे तो आम लोगों से क्या उम्मीद की जा सकती है। पंजाब के राज्यपाल व केंद्र शासित प्रदेश के प्रशासक बनवारीलाल पुरोहित की तबीयत नासाज हुई। उन्होंने कोरोना जांच के लिए नमूना भेजा। जाहिर सी बात है कि जांच में वे कोरोना संक्रमित भी आ सकते थे। कोरोना जांच के लिए नमूना भेजने के बाद वे सुबह साढ़े दस बजे से लेकर साढ़े बारह बजे तक चंडीगढ़ के सेक्टर-18 स्थित टैगोर थिएटर में विद्यालय की ओर से आयोजित कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के तौर पर पहुंचे।

इस दौरान वे भारतीय विद्या भवन चंडीगढ़ के पदाधिकारियों के साथ बैठे दिखाई दिए थे। शाम में जांच की रिपोर्ट आई और राज्यपाल कोरोना से संक्रमित पाए गए। इसके बाद जनसंपर्क विभाग से जुड़े प्रशासन ने राज्यपाल के संपर्क में आए लोगों से एकांतवास में जाने की अपील की। इस घटना के बाद आम लोगों के बीच भी सवाल उठे कि कोरोना का अंदेशा होने के बाद भी राज्यपाल सार्वजनिक कार्यक्रम में क्यों पहुंचे। बाद में लोगों से एकांतवास में जाने की अपील के बजाय राजनिवास प्रशासन राज्यपाल से ही जांच नतीजे आने तक एकांत में रहने की अपील करता तो बेहतर होता।
(संकलन : मृणाल वल्लरी)

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