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सियासी नैतिकता और राजनेता

पिछले एक महीने से चिराग ने नीतीश पर कोई हमला नहीं किया। अटकलें तो यही लग रही हैं कि उपेंद्र कुशवाह की तरह पुराने गिले शिकवे भुलाकर चिराग भी कहीं नीतीश की शरण लेने की ही तो नहीं सोच रहे। राजनीति तो खेल ही संभावनाओं का होती है।

raajpat, political partiesलोकजनशक्ति पार्टी के अध्यक्ष चिराग पासवान और उत्तराखंड के सीएम तीरथ सिंह रावत। (फोटो-जनसत्ता)

रोशनी की चाह
चिराग पासवान की दुविधा बढ़ गई है। बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों ने उनकी उम्मीदों पर पानी तो पहले ही फेर दिया था। अब नीतीश कुमार ने उनके इकलौते विधायक को अपनी पार्टी जद (एकी) में शामिल कर उनके जले पर नमक छिड़क दिया है। बेगूसराय जिले की मटिहानी सीट से विजयी हुए थे लोजपा टिकट पर राजकुमार सिंह। अब उन्होंने लोजपा विधायक दल का जनता दल (एकी) विधायक दल में विलय कर लिया। इकलौते विधायक पर दलबदल कानून भी लागू नहीं होता। यों राजकुमार सिंह मुख्यमंत्री नीतीश की तारीफ में कसीदे तो महीनों से पढ़ रहे थे। इससे पहले ही संकेत मिल गए थे उनके इरादे के। नीतीश को विकास पुरुष बता रहे हैं।

इससे पहले नीतीश ने अपने जनाधार लव कुश को मजबूत करने के लिए अपने विरोधी उपेंद्र कुशवाह को भी पार्टी में शामिल किया था। लगे हाथ उन्हें इनाम भी दे दिया। कोइरी और कुर्मी वोट बैंक को जोड़ने की चिंता नीतीश को विधानसभा चुनाव में पिछड़ जाने के बाद से ही सता रही थी। कम सीटें होने के बावजूद उन्हें मुख्यमंत्री पद देकर भाजपा ने कहने को तो अपना चुनाव पूर्व का वादा ही निभाया पर नीतीश बखूबी जानते हैं कि वे भाजपा के अहसान तले दब गए। इसीलिए अपना जनाधार बढ़ाने के लिए लगातार जतन कर रहे हैं। कुशवाह को विधान परिषद का सदस्य भी नामित करा दिया। उनके निकट भविष्य में मंत्री बनने की संभावना को भी नकारा नहीं जा सकता। पर चिराग पासवान क्या सोच रहे हैं। विधानसभा चुनाव के वक्त उन्होंने जद (एकी) उम्मीदवारों को हरवाने में अहम भूमिका अदा की थी। इस चक्कर में नीतीश के साथ तल्खी भी बढ़ी थी। तब तो चिराग भविष्यवाणी कर रहे थे कि बिहार में भाजपा-लोजपा की साझा सरकार बनेगी। खुद को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हनुमान बताते थे। लेकिन नीतीश से भी पहले उन्हें भाजपा ने झटका दिया था।

लोजपा की इकलौती विधान परिषद सदस्य नूतन सिंह को पार्टी में लेकर। एक-एक कर लोजपा के कई नेता दूसरे दलों में जा चुके हैं। चिराग ने राजकुमार सिंह के जद (एकी) में जाने पर कोई प्रतिक्रिया तो जताई ही नहीं, साथ ही पिछले एक महीने से उन्होंने नीतीश पर भी कोई हमला नहीं किया। अटकलें तो यही लग रही हैं कि उपेंद्र कुशवाह की तरह पुराने गिले शिकवे भुलाकर चिराग भी कहीं नीतीश की शरण लेने की ही तो नहीं सोच रहे। राजनीति तो खेल ही संभावनाओं का होती है।

संकट गहराया
सचिन वाझे महाराष्ट्र की साझा सरकार के गले की हड्डी साबित हो रहे हैं। अनिल देशमुख के बाद उन्होंने अब शिवसेना के एक मंत्री पर भी आरोप लगाए हैं। माना कि खुद अपराध करते पकड़े गए अभियुक्त के किसी पर लांछन लगाने का ज्यादा महत्व नहीं होता। तो भी सचिन वाझे के मामले ने सरकार का संकट तो बढ़ाया है। बची खुची कसर पूर्व पुलिस आयुक्त परमबीर सिंह के आरोपों ने पूरी कर दी है। अनिल देशमुख की भूमिका की जांच सीबीआई करेगी। अपना मंत्री पद तो गंवा ही बैठे, राष्टÑवादी कांग्रेस पार्टी की फजीहत अलग करा दी। सहायक पुलिस निरीक्षक जैसे मामूली ओहदे वाला एक पुलिस वाला सत्ता का संरक्षण पाकर किस तरह खुद अपराध की दुनिया में लिप्त था, सचिन वाझे प्रकरण ने फिर वोहरा समिति की रिपोर्ट की याद ताजा कर दी। एनआईए जांच में सचिन वाझे का असली चेहरा सामने आ गया।

इस प्रकरण ने तीस साल पहले की वोहरा समिति की रिपोर्ट की याद ताजा करा दी। बाबरी मस्जिद टूटने के बाद महाराष्टÑ में हुए दंगोें और उनमें दाऊद इब्राहीम गैंग की अहम भूमिका के मद्देनजर केंद्र सरकार ने गृह सचिव रहे एनएन वोहरा की अध्यक्षता में एक जांच समिति बनाई थी। समिति ने अपनी रिपोर्ट में खाकी (पुलिस), खादी (राजनेता) और अपराधियों के गठजोड़ का खुलासा किया था। इस गठजोड़ की पैठ न्यायपालिका तक मिली थी। बंबई हाईकोर्ट के एक जज के इस्तीफे को इस रिपोर्ट का ही अंजाम बताया गया था। लेकिन इस रिपोर्ट पर कोई कार्रवाई होना तो दूर संसद में चर्चा तक नहीं हुई थी। अलबत्ता वोहरा ने किस-किस पर उंगली उठाई थी इसे लेकर जरूर कयास लगते रहे। अब सचिन वाझे और परमबीर सिंह के कारनामों से हर कोई हैरान है।

जगहंसाई
उत्तराखंड के पिछले मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत भी टीएसआर थे और मौजूदा मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत भी टीएसआर ही हैं। टीएसआर-वन की जुबान तो पद से हटाए जाने के बाद ज्यादा फिसली थी पर टीएसआर-टू तो भाग्योदय के बाद विवादास्पद बयान दे रहे हैं। पहले लड़कियों की फटी जींस पहनने वाले बयान और फिर राशन के लिए बीस बच्चे पैदा करने वाले बयान ने उनकी जगहंसाई कराई। ब्रिटेन के बजाए भारत के अमेरिका का गुलाम रहने की बात को तो खैर जुबान फिसलना ही मानना चाहिए। कोरोना ने भी संक्रमित कर दिया। ठीक हुए तो फरमाया कि कुंभ का आयोजन हरिद्वार, उज्जैन और वाराणसी में होता है। पंडाल में मौजूद लोग हंसे। वाराणसी का कुंभ से क्या लेना। कुछ देर में ही सोशल मीडिया पर भी उड़ने लगी खिल्ली। उत्तराखंड में भाजपा की छीछालेदर उसके दूसरे नेता भी कम नहीं करा रहे। त्रिवेंद्र सिंह रावत ने अपने भाषण में लोगों को दिल बड़ा रखने की सलाह क्या दी, मंत्री हरक सिंह रावत ने नसीहत दे डाली कि मुख्यमंत्री रहते तो कभी अपना दिल बड़ा करके नहीं दिखाया। (प्रस्तुति : अनिल बंसल)

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