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सूबों की सियासत और केंद्र से टकराव

हिमाचल विधानसभा में एक ही वामपंथी विधायक हैं राकेश सिंघा। जब से वह विधानसभा पहुंचे हैं कुछ न कुछ ऐसा करते हैं कि दूसरे दलों के विधायकों को न चाहते हुए भी अपना चेहरा बेहतर दिखाने के लिए उनका अनुसरण करना पड़ता है।

उत्तराखंड के सीएम तीरथ सिंह रावत और हिमाचल प्रदेश के वामपंथी विधायक राकेश सिंघा।

सलाहकार की बात
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत ने अपने मुख्य सलाहकार के रूप में राज्य के पूर्व मुख्य सचिव शत्रुघ्न सिंह को नियुक्त किया है। शत्रुघ्न सिंह की छवि साफ-सुथरी है। अच्छे प्रशासक के साथ वे ईमानदार अधिकारी माने जाते हैं। वे अब तक राज्य के मुख्य सूचना आयुक्त थे। मुख्यमंत्री रावत ने मुख्य सूचना आयुक्त के पद से इस्तीफा दिलवा कर उन्हें अपना मुख्य सूचना सलाहकार नियुक्त किया ताकि सरकार की छवि निखर सके वरना अब तक मुख्यमंत्री के विवादास्पद बयानों के चलते राज्य सरकार की छवि विवादास्पद बन रही थी।

शत्रुघ्न सिंह के मुख्य सलाहकार बनने से राज्य में नौकरशाही में सत्ता के दो केंद्र बन गए हैं। एक केंद्र जो शक्तिशाली उभर कर सामने आया है वह है मुख्यमंत्री के मुख्य सलाहकार शत्रुघ्न सिंह का खेमा और दूसरा केंद्र राज्य के मुख्य सचिव ओमप्रकाश का। ओमप्रकाश का दुर्भाग्य रहा है कि जब त्रिवेंद्र सिंह रावत मुख्यमंत्री थे तब वे मुख्य सचिव तो बन गए परंतु सचिवालय में सत्ता की चाबी तब मुख्यमंत्री की सचिव राधिका झा के हाथों में रही। राधिका झा ने त्रिवेंद्र सिंह रावत के समय ओमप्रकाश की एक नहीं चलने दी।

जब तीरथ सिंह रावत की सरकार आई तो माना जा रहा था कि ओम प्रकाश की मुख्य सचिव पद से छुट्टी हो सकती है क्योंकि उन्हें त्रिवेंद्र सिंह रावत ने मुख्य सचिव बनाया था। लेकिन रावत ने उन्हें हटाने के बजाए उनके ऊपर पूर्व मुख्य सचिव शत्रुघ्न सिंह को अपना मुख्य सलाहकार बनाकर बैठा दिया। अब सबसे ताकतवर पूर्व नौकरशाह शत्रुघ्न सिंह हो गए हैं और राज्य के नौकरशाह उनके ही चक्कर काट रहे हैं। त्रिवेंद्र सिंह रावत के मुख्यमंत्री रहते हुए उनके कैबिनेट मंत्री हरक सिंह रावत, यशपाल आर्य, सतपाल महाराज की एक नहीं चल पा रही थी। ये मंत्री ओमप्रकाश से खुंदक खाए हुए थे।

पंजाब की जमीन
किसानों के मुद्दे पर पंजाब में पुराने साथी शिरोमणि अकाली दल से दोस्ती क्या खत्म हुई, भाजपा अब अपने दम पर सूबे में खुद को खड़ा करने की कोशिश में जुटी है। विधानसभा के चुनाव को अब एक साल भी नहीं रह गया। भाजपा अब तक जो भी सीटें जीतती रही, उसमें उसके अकाली दल से गठबंधन का बड़ा असर रहा था। अब अकाली दल तो साथ नहीं, लिहाजा भाजपा पंजाब में अगली बार दलित मुख्यमंत्री बनाने की बात कह रही। यह शिगूफा छोड़ा तो पूर्व मुख्यमंत्री और शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर बादल ने था। उनकी सोच थी कि इससे पिछले चुनाव में ठिठक गई उनकी राजनीति को कुछ गति मिलेगी।

वैसे भी किसान आंदोलन ने पंजाब में यदि किसी को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया है तो वह भाजपा के साथ अकाली दल भी है। पुराने साथी अकाली दल के दलित मुख्यमंत्री के फार्मूले को भाजपा ने अपना बना लिया है। भाजपा आजकल जमकर दलित मुख्यमंत्री का राग ही नहीं अलाप रही, बाकायदा गुरुद्वारों में अरदासें करवा रही है। पहले तो भाजपा समर्थित एक मीडिया घराने ने गुरुद्वारे में ऐसी अरदास करवा कर चिंगारी को हवा दी। हालांकि, कैप्टन सरकार ने कथित तौर पर जब जांच और कार्रवाई का कड़ा संदेश दिया तो कथित रूप से भाजपा ने झट एक और गुरुद्वारे में वैसी ही अरदास करवा दी।

कैप्टन सरकार ने संबंधित ग्रंथियों के खिलाफ कार्रवाई शुरू की तो भाजपा अनुसूचित जाति सेल के अध्यक्ष विजय सांपला ने बिना देरी किए एक बयान देकर कैप्टन सरकार की निंदा ही नहीं की, पंजाब में अगली बार दलित मुख्यमंत्री के ‘अज्ञात चेहरे’ को अपना आशीर्वाद तक दे डाला। बंगाल विधानसभा चुनाव में भाजपा के सांप्रदायिक कार्ड ने धोखा दे दिया था और वहां उसके दो सौ सीटें आने के दावे का गुब्बारा भी फूट गया। पंजाब में किसान आंदोलन के चलते वैसे भी भाजपा की छवि को बहुत ज्यादा नुकसान पहुंचा है। उसे वहां किसी ऐसे मुद्दे पर जमीन तलाशनी है कि दम-खम के साथ चुनाव लड़ सके। इसलिए उसने दलित मुख्यमंत्री की बात को आगे बढ़ा कर सियासी माहौल को अपनी तरफ करने की कोशिश की है।

सियासत में सिंघा
हिमाचल विधानसभा में एक ही वामपंथी विधायक हैं राकेश सिंघा। जब से वह विधानसभा पहुंचे हैं कुछ न कुछ ऐसा करते हैं कि दूसरे दलों के विधायकों को न चाहते हुए भी अपना चेहरा बेहतर दिखाने के लिए उनका अनुसरण करना पड़ता है। ऐसे में कांग्रेस और भाजपा के विधायक न तो विरोध कर पाते हैं और न ही उनके मंसूबे पूरे हो पाते हैं। मंत्रियों-विधायकों के वेतन-भत्तों को बढ़ाने का मामला हुआ तो सिंघा सीधे इसके विरोध में खड़े हो गए। कोरोना काल में वह अपना एक साल का वेतन दान करने के लिए आगे आए। ऐसे में बाकी विधायक क्या करते। मजबूरन उन्हें भी वेतन दान की घोषणा करनी पड़ी।

निजी सुरक्षा कर्मी सिंघा ने पहले ही नहीं रखा है। विधायकों की गाड़ियों में झंडी लगाने का प्रस्ताव विधानसभा की एक समिति ने मंत्रिमंडल को भेजा था। मंत्रिमंडल ने इसे हरी झंडी दे दी। सिंघा यहां भी विरोध में कूद गए। ऐसे में कुछ विधायक उनकी मनुहार भी करने लगे हैं कि आपको अगर अपने लिए कुछ नहीं लेना है तो न लीजिए। कम से कम हमारे वाहनों में तो झंडी लगने दीजिए। लेकिन सिंघा दूसरे दलों पर कृपा बरसाने को तैयार नहीं दिख रहे।

(संकलन : मृणाल वल्लरी)

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