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राजपाट- सियासी तवा

किसानों के बहाने अपनी राजनीति चमकाने की होड़ लगी है। कांग्रेस में अलबत्ता इस मुद्दे पर भी गुटबाजी उभरी है। जबकि भाजपा इस रोग से फिलहाल तो मुक्त दिखती है।

Author July 24, 2017 05:50 am
उत्तराखंड के सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत (PTI Photo)

आयाराम गयाराम
नगालैंड ने भी कितने इतिहास रच दिए। आयाराम गयाराम की राजनीति की प्रयोगशाला बन चुका है पूर्वोत्तर का उग्रवाद से प्रभावित यह सूबा। पांच महीने के भीतर फिर हो गया सत्ता परिवर्तन। बेचारे सुहराजेली लेजित्सु तो सदन के सदस्य तक नहीं बन पाए थे। इसी महीने 29 तारीख को उप चुनाव लड़कर सदस्य बनते वे। लेकिन मुख्यमंत्री की कुर्सी पहले ही खिसक गई। जिसने हटाया वही टीआर जेलियांग बन गए हैं नए मुख्यमंत्री। लेजित्सु ने उन्हें हटाकर ही संभाली थी नगालैंड की सत्ता। फरवरी में जेलियांग ने शहरी निकायों में महिलाओं को 33 फीसद आरक्षण देने का फैसला क्या किया कि नगालैंड के तमाम नगा संगठनों ने अपने वर्चस्व पर प्रहार मान लिया था उसे। जेलियांग सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतर गए थे ये संगठन। आगजनी और हिंसा की चपेट में रहा पूरा सूबा लगातार दो हफ्ते। नतीजतन आंदोलनकारियों के आगे घुटने टेकने पड़े जेलियांग को। मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। मजेदार पहलू यह है कि सूबे की नगा पीपुल्स फ्रंट के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार में भाजपा भी शामिल है। बेचारे जेलियांग ने किसी तरह पांच महीने काटे तो जरूर लेकिन मौके की तलाश में फिर भी जुटे रहे। बेशक लेजित्सु सरकार ने उन्हें कैबिनेट मंत्री जैसी हैसियत देते हुए सरकार का वित्तीय सलाहकार बना रखा था।

पर सत्ता का स्वाद चख चुके जेलियांग भला इतने भर से कैसे संतुष्ट हो जाते। लिहाजा इस महीने की शुरुआत में ही दावा पेश कर दिया सरकार बनाने का। 59 सदस्यों वाली विधानसभा में 41 सदस्यों के समर्थन के बूते पहुंच गए राजभवन। राज्यपाल पीबी आचार्य ने देर नहीं लगाई। लेजित्सु को हिदायत दी कि 15 जुलाई तक सदन में साबित करें अपना बहुमत। लेजित्सु भी आसानी से हार क्यों मानते। राज्यपाल के निर्देश के खिलाफ दस्तक दे दी। गुवाहाटी हाईकोर्ट की कोहिमा पीठ में। अदालत ने मंगलवार यानि 18 जुलाई को याचिका खारिज कर दी। उसके बाद 19 को साबित करना था बहुमत। लेकिन न वे खुद सदन में पहुंचे और न उनका समर्थक कोई विधायक। लिहाजा राज्यपाल ने उन्हें बर्खास्त कर जेलियांग को दिला दी मुख्यमंत्री पद की उसी दिन शपथ। लगे हाथ अगले दिन बहुमत दिखाने की हिदायत भी दे दी। जेलियांग ने साबित कर दिखाया सदन में अपना बहुमत। रही लेजित्सु की बात तो वे यों भी सदन में मौजूद रह नहीं सकते थे क्योंकि सदन के सदस्य थे ही नहीं। सूबे में विधानसभा चुनाव अगस्त में होंंगे। जाहिर है कि सियासी अस्थिरता से शायद ही मुक्ति मिल पाएगी नगालैंड को।
कौन बनेगा मंत्री
कहने को तो वेंकैया नायडू तेलंगाना के ठहरे। पर राज्यसभा में तो राजस्थान ने भेजा था भावी उपराष्ट्रपति को। केंद्रीय मंत्री से वे अब देश के उपराष्ट्रपति बनेंगे तो राजस्थान की भाजपाई सियासत पर भी असर तो पड़ेगा ही। राजस्थान से दूसरा कोई कैबिनेट मंत्री है नहीं। जाहिर है कि प्रधानमंत्री जब अगला फेरबदल करेंगे तो कैबिनेट में सूबे की नुमाइंदगी जरूर होगी। कम से कम अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनजर तो यह लाजिमी माना जा रहा है। पिछले चुनाव में कांग्रेस का सूपड़ा साफ कर राजस्थान के लोगों ने सारी पच्चीस लोकसभा सीटें भाजपा की झोली में डाल दी थी। फिलहाल अर्जुन मेघवाल, राज्यवर्धन सिंह राठौड़, सीआर चौधरी और पीपी चौधरी सभी केंद्र सरकार में राज्यमंत्री ठहरे। एक और राज्यमंत्री विजय गोयल भी बेशक सियासत चाहे दिल्ली की करते हों पर राज्यसभा में तो नुमाइंदगी राजस्थान की करते हैं। वेंकैया चूंकि बड़े नेता थे सो, चाह कर भी राजस्थान के तमाम केंद्रीय मंत्री उन्हें बाहरी नहीं बता पाए। विजय गोयल को वे अलबत्ता इसी श्रेणी में रखते हैं। इस बार मुमकिन है कि भूपेंद्र यादव या ओपी माथुर की लाटरी खुल जाए। दोनों राज्यसभा में हैं। फिलहाल संगठन में अहम जिम्मा है दोनों के पास। माथुर तो देश के सबसे बड़े सूबे यूपी के प्रभारी ठहरे।

सरकार बनी थी तो चर्चाएं यहां तक सुनाई पड़ी थी कि मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे खुद नहीं चाहतीं कि उनके सूबे का कोई केंद्र में कैबिनेट मंत्री हो। उनकी इच्छा तो अपने सांसद पुत्र दुष्यंत को मंत्री बनवाने की रही होगी। नायडू के इस्तीफे के बाद राज्यसभा की खाली होने वाली सीट के लिए उपचुनाव भी होगा। उसके लिए भी दावेदार लाबिंग में जुट गए हैं। पार्टी की गुटबाजी पर अंकुश लगाने के लिए आलाकमान यह सीट असंतुष्ट नेता घनश्याम तिवाड़ी को सौंप दे तो हैरत नहीं होनी चाहिए। तिवाड़ी तो डंके की चोट पर कहते आ रहे हैं कि उनका विरोध वसुंधरा राजे से है, अपनी पार्टी से नहीं। विधायक किरोड़ीलाल मीणा भी इसी सुर में सुर मिलाते हैं। उनका जातीय आधार मजबूत होने के चलते भाजपा नेतृत्व अगले विधानसभा चुनाव की चिंता में उन्हें पटा सकता है। वसुंधरा राजे ने तो घनश्याम तिवाड़ी को अनुशासनहीनता की जद में फंसाने का ताना-बाना बुना था। पर वे आरएसएस की बदौलत बचे हुए हैं। जाहिर है कि राजस्थान में आने वाले दिन सियासी हलचल तेज करेंगे।
सियासी तवा
किसानों के नाम पर जमकर राजनीति चल रही है आज कल उत्तराखंड में। भाजपा और कांग्रेस दोनों ही एक दूसरे के खिलाफ बयानबाजी में कसर नहीं छोड़ रहे। किसानों के बहाने अपनी राजनीति चमकाने की होड़ लगी है। कांग्रेस में अलबत्ता इस मुद्दे पर भी गुटबाजी उभरी है। जबकि भाजपा इस रोग से फिलहाल तो मुक्त दिखती है। उलटे सरकार और संगठन दोनों ही एक सुर में कांग्रेस की लानत-मलानत कर रहे हैं। कांग्रेस में हाशिए पर जा चुके पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत किसानों के बहाने अपनी पकड़ फिर पुख्ता करने के चक्कर में लगे हैं। पहले देहरादून और फिर हरिद्वार में धरना देने की और कोई वजह तो हो नहीं सकती। यह बात अलग है कि उनके धरने में न तो पार्टी के सूबेदार प्रीतम सिंह दिखे और न विधायक दल की नेता इंदिरा हृदेश ने शिरकत करना जरूरी समझा। अलबत्ता प्रीतम सिंह ने तो डोईवाला में अपना अलग धरना दिया। जाहिर है कि उससे हरीश रावत खेमे को दूरी बनानी ही थी। इंदिरा हृदेश और प्रीतम सिंह ने तो अपने विधायकों और नेताओं के साथ मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को किसान हित में ज्ञापन भी थमा दिया। पर एक चूक कर बैठे। ज्ञापन देते वक्त एक तो मुख्यमंत्री को बुके देने की जरूरत क्या थी? शिष्टाचार का तकाजा भी रहा हो तो भी ठहाके लगाने का औचित्य किसी को समझ नहीं आया। इससे तो जगहंसाई ही कराई अपनी। प्रीतम सिंह औ

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