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राजपाट: आग में घी

भाजपा के सूबेदार दिलीप घोष ने फरमाया है कि हालात पर काबू पाने और दोषियों को गिरफ्तार करने के बजाए सरकार के मंत्री भाजपा के पीछे पड़े हैं।

Author October 6, 2018 6:22 AM
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी

पश्चिम बंगाल में अब ममता बनर्जी की जंग वाम मोर्चे और कांग्रेस से कम भाजपा और संघ परिवार से ज्यादा हो रही है। भाजपा अध्यक्ष पिछले दिनों कोलकाता में कह भी आए थे कि अगले विधानसभा चुनाव में वे ममता को सत्ता से बेदखल कर देंगे। दुविधा यह है कि भाजपा ने अपना वोटबैंक तो जरूर बढ़ाया है पर अभी तक चुनाव में ज्यादा सीटें जीतने में कामयाब नहीं हो पाई यह पार्टी। भाजपा की आंधी के बावजूद सूबे की 42 में से महज दो सीटों पर ही कामयाबी मिली थी 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को। विधानसभा चुनाव में तो नतीजा और भी खराब आया था। बहरहाल भाजपा के उभार से ममता भी चिंतित तो लगती ही हैं। तभी तो उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस हर मामले में भाजपा और संघ को घसीट रही है। कोलकाता में हुए बम विस्फोट के बाद आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला जोर पकड़ गया। ममता सरकार के दो मंत्रियों ने विस्फोट का ठीकरा भाजपा और संघ के सिर फोड़ दिया।

भाजपा और संघ परिवार भला इस आरोप को कबूल क्यों करते? भाजपा ने तो विस्फोट को तृणमूल कांग्रेस की अंदरूनी कलह का नतीजा बताने से भी गुरेज नहीं किया। आठ साल के एक बच्चे की जान चली गई थी इस विस्फोट से। नौ लोग घायल भी हुए थे। सूबे में पिछले कई साल से विस्फोट गाहे-बगाहे हो ही रहे हैं। भाजपा के सूबेदार दिलीप घोष ने फरमाया है कि हालात पर काबू पाने और दोषियों को गिरफ्तार करने के बजाए सरकार के मंत्री भाजपा के पीछे पड़े हैं। जबकि पुलिस और प्रशासन को मुस्तैदी दिखानी चाहिए। हिंसा और आतंक के माहौल का दोष तो सरकार का ही है। ममता बनर्जी से अगर सरकार नहीं चल पा रही तो कुर्सी क्यों नहीं छोड़ देती। घोष ने तो ममता सरकार के एक मंत्री पूर्णेंदु बोस और कई तृणमूल नेताओं को पुराने नक्सली बता कर आग में घी डाल दिया है।

बदलते समीकरण

अभी तो विधानसभा चुनाव की तारीखों का भी एलान नहीं हुआ है। मगर राजस्थान में भाजपा अभी से खेमों में बंट गई है। सूबे की सरकार की खराब छवि ने भाजपा आलाकमान को भी अहसास करा दिया है कि यहां सत्ता में वापसी आसान नहीं। सो, आलाकमान अब सूबे में प्रचार अभियान की नई रणनीति बुन रहे हैं। वसुंधरा राजे के अधिकार सीमित करना भी इसी रणनीति का हिस्सा ठहरा। यानी टिकट बंटवारे में अब वसुंधरा का एकाधिकार खत्म समझो। सूबेदार की तैनाती के मामले में तो आलाकमान को वसुंधरा के आगे झुकना पड़ा था। पर टिकट बंटवारे में वैसी फजीहत नहीं होने देना चाहेंगे आलाकमान। आरएसएस की तर्ज पर सूबे को भाजपा ने भी तीन प्रांतों में बांट दिया है। हर प्रांत के लिए दो नेताओं का दल है जो उम्मीदवारों की तलाश करेगा।

जयपुर, जोधपुर और चित्तौड़ हैं तीन प्रांत। संगठन महामंत्री चंद्रशेखर, राष्ट्रीय सह-संगठन मंत्री वी सतीश और दो केंद्रीय मंत्री गजेंद्र शेखावत व अर्जुन मेघवाल। जिनके तार सीधे आलाकमान से जुड़े हैं। कोई वसुंधरा का हिमायती नहीं। ऊपर से राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और राजस्थान के निवासी ओम प्रकाश माथुर की भूमिका अलग। वसुंधरा ने अपनी गौरव यात्रा में पूर्व सूबेदार अशोक परनामी को ताकतवर दिखाने में कसर नहीं छोड़ी थी। इसीलिए आलाकमान को हस्तक्षेप बढ़ाना पड़ा। टिकटार्थियों का पहले जैसा मेला अब न परनामी के घर दिख रहा है और न जयपुर के मंदिर के महंत के दर पर। वसुंधरा के करीबी के नाते खासी धमक है महंत जी की। जो भी हो सूबे की जमीनी हकीकत से होश तो उड़े ही हैं दिल्ली दरबार के।
(प्रस्तुति : अनिल बंसल)

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