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राजपाट: अब पूरी ताकत से बीजेपी से हिसाब चुकता करेंगे नवजोत सिंह सिद्धू

राज्यसभा की सदस्यता छोड़ने के बाद तमाम तरह की अटकलों से घिर गए थे नवजोत सिद्धू।

Author नई दिल्ली | Updated: September 5, 2016 10:45 AM
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दुविधा में नीतीश कुमार

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार करें तो क्या करें? अपनी सहयोगी पार्टी राजद के लोगों को खुश रखना उनके लिए चुनौती बन गया है। खुश रखने की सीमा भी तो कुछ नहीं। फिर अपनी पार्टी जनता दल (एकी) के नेता और कार्यकर्ता भी तो कम नहीं हैं। लालू की पार्टी के लोग चाहते हैं कि लालबत्ती वाले ज्यादातर पद उनके हवाले कर दिए जाएं। उनकी पार्टी की सियासी हैसियत भी तो ज्यादा ठहरी। विधानसभा में जद (एकी) से ज्यादा हैं राजद के विधायक। पर यह दलील जद (एकी) के लोगों के गले नहीं उतर पा रही। वे मलाईदार पदों के बंटवारे में अपनी हैसियत इक्कीस देखने की जिद पकड़े हैं। जिन्हें चुनाव के बाद कुछ हासिल नहीं हो पाया वे अब निगम और बोर्ड की तरफ टकटकी लगाए हैं। पर नीतीश खुद को दो पाटन के बीच फंसा पा रहे हैं इस मामले में। राजद के लोगों की मंशा पूरी करें तो अपने रूठ जाएंगे। और अपनों को तरजीह दें तो ‘बड़े भाई’ यानी लालू यादव को क्या जवाब देंगे? आखिर लालू की मंशा भी तो अपनी पार्टी के लोगों से अलग होगी नहीं।

हनक बरकरार

लालू यादव खुद किसी सरकारी पद पर नहीं हैं तो क्या फर्क पड़ता है? उनके दोनों बेटे तो बिहार सरकार में मंत्री हैं ही। छोटा तो उपमुख्यमंत्री भी है। लिहाजा नीतीश कुमार जब सूबे के बाढ़ पीड़ितों का हालचाल जानने हवाई दौरे पर निकले तो लालू चैन से कैसे बैठे रहते। बेशक मुख्यमंत्री के नाते यह नीतीश की जिम्मेवारी थी। पर सरकार में तो लालू की पार्टी भी शामिल है। पार्टी के तो वे ही हैं सर्वेसर्वा। सो वे भी निकल पड़े हवाई दौरे पर। कहीं उपमुख्यमंत्री बेटे को लेकर तो कहीं सूबे के आपदा मंत्री के साथ। बाढ़ पीड़ितों के बीच पहुंचना भी एक अलग तरह की सियासत होती है। इससे नेता की लोकप्रियता तो बढ़ती ही है, चुनाव के वक्त इसे भुनाने का मौका भी मिल जाता है। लिहाजा कोई नेता नहीं चूकता ऐसे मौकों पर सियासत करने से। लालू भी नहीं चूके। बाढ़ पीड़ितों के बीच वे भी दिखे। दिखे तो चर्चित क्यों न होते।

राजसी अंदाज

अपने राज में भी उपेक्षित ही महसूस कर रहे हैं खुद को भाजपाई। राजस्थान में महारानी अपनी सरकार को अपने तौर-तरीकों से चला रही हैं तो यही होना भी था। वे जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से ही नहीं घबरातीं तो फिर अमित शाह की परवाह क्यों करें? करतीं तो भाजपाई मुख्यमंत्रियों की पिछले हफ्ते दिल्ली में शाह द्वारा ली गई बैठक से दूर क्यों रहतीं। बेशक भूटान यात्रा का बहाना अच्छा बना लिया। खैर, सूबे में संघी उनसे ज्यादा त्रस्त लगते हैं। सत्ता की रेवड़ियां जो नहीं बांटी ढाई साल बीत जाने के बाद भी। तभी तो हर जगह पार्टी के कार्यकर्ता अपनी सरकार का गुणगान करने के बजाए उसे कोसने में ही लगे हैं।

देखने में तो वसुंधरा की बनाई योजनाएं आकर्षक लगती हैं पर धरातल से नदारद हैं। इसीलिए कांग्रेसी ही नहीं खुद भाजपाई भी भविष्यवक्ता बन बैठे हैं कि अगली बार तो वसुंधरा चुनाव जीत नहीं पाएंगी। वो भ्रष्टाचार पर भी अंकुश नहीं लगा पाई हैं और अपराध भी बेकाबू हैं। भले गृहमंत्री गुलाब चंद कटारिया अफसरों के बनाए कागजी आंकड़ों के बूते अपराध घटने की बाजीगरी दिखा रहे हों। यहां तक कि मंत्री तक खुश नहीं। विधायकों की तो बात ही छोड़िए। नौकरशाही हावी है। ले-देकर मुख्यमंत्री के करीबी होने के नाते युनूस खां जरूर अपनी हनक बनाए हुए हैं।

परिवहन के साथ पीडब्लूडी जैसा अहम महकमा भी उन्हीं के हवाले कर रखा है वसुंधरा ने। अफसर भी अपनी पसंद के लगवा लिए हैं। सरकार के शुरुआती दौर में इसी तरह का जलवा स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र राठौड़ का भी दिखता था। लेकिन मुख्यमंत्री की नजर फिर गई तो अफसरों ने उनकी भी शुरू कर दी अनदेखी। विधायक कोई भी समस्या लेकर आते हैं तो संबंधित मंत्री बेबसी का रोना रोने लगते हैें। एक ही विलाप कि अफसर उनकी सुन ही नहीं रहे। संगठन की हालत भी माशा अल्लाह है। सूबेदार अशोक परनामी को मुख्यमंत्री का जेबी माना जाता है। बेचारे अब तक अपनी टीम भी नहीं बना पाए। आलाकमान जी हजूरी करने वालों को टीम में रखने की मंजूरी जो नहीं दे रहा।

सिद्धू की गुगली

सिद्धू ने तो गुगली फेंकी है। राज्यसभा की सदस्यता छोड़ने के बाद तमाम तरह की अटकलों से घिर गए थे नवजोत सिद्धू। ज्यादा संभावना अरविंद केजरीवाल की पार्टी में शामिल होने की थी। पर बात बनी नहीं तो कांग्रेस के सूबेदार कैप्टन अमरिंदर ने कांग्रेस में शामिल होने का न्योता देकर रोचक बना दिया नजारा। अब सामने आई है सिद्धू की रणनीति। न आप में जाएंगे और न कांग्रेस का दामन थामेंगे। अभी तो हॉकी खिलाड़ी परगट सिंह और बैंस बंधुओं के साथ हाथ मिलाया है। आवाज-ए-पंजाब रखा है फिलहाल अपने सियासी संगठन का नाम। नाम से राजनीतिक दल होने का अहसास बेशक न हो पर लोकसभा चुनाव में अमृतसर से अपना टिकट कटने का जख्म सिद्धू अभी तक भर नहीं पाए। खुद को पंजाब से बाहर करने की अपनी पार्टी भाजपा की चाल वे बखूबी भांप गए। अब पूरी ताकत से हिसाब चुकता करेंगे।

पंजाब में सिद्धू की लोकप्रियता को कोई नकार नहीं सकता। सिख होने का भी फायदा मिलता है उन्हें। पर खुद को मुख्यमंत्री के दावेदार के रूप में पेश कर सरकार बनाने लायक बहुमत ले आएंगे, इसमें अभी संदेह है। मोर्चे की विधिवत घोषणा अभी हुई नहीं है। हो सकता है कि त्रिशंकु विधानसभा की आस लगा रहे हों। ऐसा होने पर तो लाटरी खुल जाती है छोटे दलों की भी। यह बात भी कम मजेदार नहीं है कि अभी तक तो सिद्धू के भाजपा से इस्तीफा देने तक की किसी को जानकारी नहीं। जाहिर है कि सिद्धू के मोर्चे में अकाली दल, आप और कांग्रेस के बागियों को ही तरजीह मिलेगी। तीन विधायकों के बल पर विधानसभा चुनाव की वैतरणी पार करना हंसी खेल नहीं होगा। हां, सिद्धू को खुलासा करना पड़ेगा कि थोड़े बचे समय में कैसे बढ़ाएंगे वे अपने मोर्चे की सियासी ताकत।

तिलिस्म आग का

पश्चिम बंगाल के अस्पतालों को न जाने कौन सा शाप लग गया है। अस्पतालों में आग की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। पिछले एक हफ्ते में ही तीन अस्पताल आग की चपेट में आ गए। सुरक्षा बंदोबस्तों की भी पोल खुल गई। अपनी गलती छिपाने के लिए अब सूबे की सरकार ने आग के पीछे साजिश का आरोप जड़ दिया। खासकर मुर्शिदाबाद मेडिकल कालेज व अस्पताल की आग के संदर्भ में। आखिर कांग्रेस का गढ़ जो माना जाता है मुर्शिदाबाद जिला। पार्टी के सूबेदार अधीर चौधरी यहीं के ठहरे। साजिश का आरोप लगाने का संकेत तो चौधरी पर ही उंगली उठाना रहा होगा। ममता ने इस हादसे की जांच के लिए सूबे के स्वास्थ्य मंत्री रह चुके चंद्रिमा भट्टाचार्य की अगुआई में चार सदस्यों की समिति भी बना डाली।

मौका मुआयना करते ही भट्टाचार्य ने पत्रकारों से दूसरी ही बात कह डाली। फरमाया कि यह आग ममता सरकार की छवि पर बट्टा लगाने और उसकी विकास योजनाओं में अड़ंगा डालने की साजिश है। अधीर चौधरी ने तपाक से पलटवार कर दिया कि भट्टाचार्य का बयान सरकार की नाकामी पर लीपापोती की कोशिश से ज्यादा कुछ नहीं। तृणमूल सरकार को तो हर बात में साजिश ही नजर आती है। अब सीआइडी के हवाले भी की गई है यह आगजनी। साजिश वाले पहलू की पड़ताल वही करेगी। मुख्यमंत्री का आरोप बेदम न दिखे इसकी पूरी चिंता है सरकारी जांच एजंसियों को। तभी तो सीआइडी की टीम ने कांग्रेस के एक कार्यकर्ता को गिरफ्त में भी ले लिया। नतीजतन अधीर चौधरी को कहना पड़ा कि जांच या तो कोई रिटायर जज करे या सीबीआइ। मुख्यमंत्री जांच से पहले ही निष्कर्ष तय कर चुकी हों उनकी जांच एजंसी तो उसी दिशा में बढ़ेगी आगे। लिहाजा स्वतंत्र एजंसी से होनी चाहिए जांच। अपने कार्यकर्ता अमल गुप्ता का भी खुल कर बचाव किया है अधीर ने।

दूर की कौड़ी

तय मियाद तो अगले साल दिसंबर तक है हिमाचल विधानसभा की। पर अटकलें वक्त से पहले चुनाव हो जाने की भी लगाई जा रही हैं। पंजाब के साथ भी करा सकते हैं हिमाचल के चुनाव मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह। विपक्ष के नेता प्रेम कुमार धूमल तो पिछले चार साल से यही राग अलाप रहे हैं कि वीरभद्र सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाएगी और वक्त से पहले ही अपने बोझ से खुद गिर जाएगी। अब प्रवर्तन निदेशालय और सीबीआइ जैसी एजंसियों के जांच के चक्रव्यूह ने और बल दे दिया है ऐसी संभावनाओं को। लेकिन वीरभद्र भी हार मानने वाले नहीं। तमाम कानूनी उलझनों से जूझते हुए न केवल विपक्ष की उम्मीदों पर पानी फेर दिया बल्कि पौने चार साल से तो सरकार चला ही रहे हैं। वक्त से पहले अगर चुनाव हुआ भी तो उनकी मर्जी से ही होगा। दरअसल पिछले डेढ़ साल से वे चैन से बैठे ही नहीं। सूबे के दनादन दौरे कर अपनी सक्रियता और बुलंद हौसलों का संकेत देते रहे आ रहे हैं। तभी तो विपक्ष को समझ नहीं आ रहा कि कैसे रोके उनकी रफ्तार। वैसे भी भ्रष्टाचार को अभी तक तो कारगर मुद्दा बनाने में सफल लग नहीं रही भाजपा। इसके उलट कांग्रेस ने महंगाई को मुद्दा बना केंद्र के खिलाफ खूब तीर चलाए हैं। रही राजकाज की बात तो सरकारी कर्मचारियों को वीरभद्र ने दिल खोल कर सुख-सुविधाएं दी हैं। केंद्र में अपनी सरकार होने का भी हिमाचल में कोई फायदा उठाती नजर नहीं आ रही भाजपा। अलबत्ता वक्त से पहले चुनाव होने की आहट तक से उसकी तो बेचैनी ही बढ़ती है।

हवाई दावे

हफ्ते भर की अमेरिका यात्रा से शनिवार को अपने सूबे की राजधानी भोपाल लौट आए मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज चौहान। हवाई अड्डे पर मंत्रियों, पार्टी पदाधिकारियों और अफसरों ने ऐसे की उनकी अगवानी जैसे वे कोई जंग फतह कर लौटे हों। पत्रकारों को अपनी यात्रा का मकसद और उपलब्धियां तो बतानी ही थीं। इंदौर में होने वाले निवेशक सम्मेलन से जोड़ा इस यात्रा को। यानी वैश्विक निवेशक सम्मेलन के लिए अमेरिका की बड़ी कंपनियों को खुद न्योता देने गए थे मुख्यमंत्री। उनके दावों पर भरोसा करें तो इस बार सम्मेलन में दो सौ से ज्यादा विदेशी उद्योग समूह शिरकत करेंगे।

इंदौर में धर्मार्थ नेत्र चिकित्सालय की स्थापना में शंकर आई फाउंडेशन ने दिलचस्पी दिखाई है तो भोपाल में 950 करोड़ के निवेश से दस हजार लोगों को रोजगार मिलने का सपना देख रहे हैं चौहान। खुद ही बता दिया कि पिछले निवेशक सम्मेलन में पांच लाख करोड़ रुपए के निवेश के एमओयू हुए थे। आधी रकम के निवेश पर प्रक्रिया आगे भी खिसकी है। पर इस विदेश यात्रा पर भी कांग्रेस के सूबेदार अरुण यादव ने सवाल उठा दिया। पिछली तमाम विदेश यात्राओं पर श्वेत पत्र जारी करने की मांग कर डाली। यादव ने इतना तो ठीक ही फरमाया है कि विदेश यात्राओं पर करोड़ों फूंकने के बाद भी विदेशी निवेश तो फूटी कौड़ी नहीं आया। उनकी गैरहाजिरी में कैलाश विजयवर्गीय ने दो ट्वीट कर दिए। इंदौरवासियों के लिए जल्द मेट्रो शुरू करने के वादे का मखौल उड़ाया। इंदौर से ही विधायक हैं विजयवर्गीय। पहले चौहान सरकार में मंत्री रहे। आजकल अमित शाह की टीम में महासचिव हैं। उन्हें अपनी ही राज्य सरकार की रफ्तार पर हैरानी है। तभी तो लिख मारा कि शहर में मेट्रो नहीं बैलगाड़ी आने वाली है। मुख्यमंत्री समर्थकों ने पलटवार किया तो दूसरे ट्वीट में सुस्ती का ठीकरा नौकरशााही के सिर फोड़ दिया विजयवर्गीय ने। तो क्या विजयवर्गीय को भी शक है विदेश यात्राओं के शिवराज चौहान के घोषित मकसद और निवेश के दावों पर।

बड़बोले मंत्री

जयभान सिंह पवैया कभी बजरंग दल के विनय कटियार अवतार थे। आजकल मध्यप्रदेश सरकार में उच्च शिक्षा मंत्री हैं। ऐसा बयान दे दिया कि सत्ता और भाजपा संगठन दोनों में हड़कंप मच गया। शिक्षा माफिया को निपटाने की चेतावनी। इंदौर में पहली बार आए थे। वह भी किसी निजी विश्वविद्यालय के कार्यक्रम में। जुबान पर लगाम नहीं रख पाए। फरमाया कि जितना भ्रष्ट नेता उतनी ही बड़ी यूनिवर्सिटी और जितना भ्रष्ट अधिकारी उतना ही बड़ा कालेज। फिर लगे उपदेश देने कि वे निजी विश्वविद्यालयों और कालेजों के कार्यक्रमों में जाने से बचते हैं। राज भी खोल दिया कि भ्रष्ट नेता और अफसर अपने कालेधन को सफेद करते हैं इन शिक्षा संस्थाओं के सहारे। तभी तो शिक्षा माफिया जैसे शब्दों का चलन बढ़ गया। लेकिन वे शिक्षा को माफिया से मुक्त कराएंगे। शिक्षा माफिया जैसे शब्दों का इस्तेमाल आरएसएस के छात्र संगठन विद्यार्थी परिषद के सह संगठन मंत्री रघुनंदन ने भी किया। वे पवैया से भी इक्कीस निकले। बोले कि अब तो शिक्षा मंत्री कौन बनेगा, इसे भी शिक्षा माफिया तय करता है। काश रघुनंदन सोच कर बोलते क्योंकि मध्यप्रदेश में तो पवैया जैसे उच्च शिक्षा मंत्री खुद शिक्षा माफिया से त्रस्त लगते हैं।

कमाल का दल

राम मनोहर लोहिया ने राजनीति में वंशवाद का मुखर विरोध किया था। दलितों को सत्ता में हिस्सेदारी दिलाने के लिए अपना जीवन खपा देने वाले कांशीराम भी कभी वंशवाद के घोषित हिमायती नहीं रहे। उन्हीं की खोज थे यूपी की सियासत में कानपुर के सोनेलाल पटेल। पिछड़ी पर दबंग कुर्मी जाति के इस नेता की सियासी महत्वाकांक्षा बढ़ी तो 1995 में बसपा छोड़ अपनी अलग पार्टी अपना दल बना ली। कहने को यह दलितों, अल्पसंख्यकों और पिछड़ों के लिए बसपा का नया संस्करण थी पर पहचान बनी केवल कुर्मियों की पार्टी के नाते। सोनेलाल पटेल का दुर्घटना में निधन हो गया तो अपना दल हकीकत में उनके कुनबे का अपना दल बन कर रह गया। उनकी पत्नी कृष्णा पटेल बन गईं पार्टी की मुखिया और 2012 में बेटी अनुप्रिया को पहुंचा दिया उन्होंने विधानसभा में। उसके बाद लोकसभा चुनाव आया तो भाजपा से गठबंधन कर लिया। हिस्से में दो सीटें आई। एक पर विधायक बेटी अनुप्रिया चुनाव लड़ी तो दूसरी प्रतापगढ़ सीट उन्होंने मुंबई में बसे अरबपति हरिवंश सिंह को थमा दी। मोदी लहर में जीत भी दोनों ही गए। पर उसके बाद कुनबे में फूट पड़ गई। मां ने बेटी को पार्टी से निकाल दिया तो बेटी ने मां के अस्तित्व को ही नकार दिया। यों लोकसभा चुनाव के बाद पार्टी की हैसियत की पोल भी खुल गई। जब बेटी अनुप्रिया द्वारा खाली की गई विधानसभा सीट के उपचुनाव में खुद लड़ कर कृष्णा पटेल हार गईं। इसके बावजूद नरेंद्र मोदी ने अनुप्रिया को पिछले विस्तार में राज्यमंत्री बना दिया। फिर तो सड़क पर आ गई कुनबे की कलह। अब दूसरी बेटी पल्लवी हैं अपनी मां के साथ। जबकि दोनों लोकसभा सदस्य भी दो खेमों में बंट गए हैं। हरिवंश कृष्णा पटेल को नेता मान रहे हैं तो अनुप्रिया ने खुद को घोषित कर दिया है पार्टी का मुखिया। दोनों ही असली अपना दल होने की जंग में उलझे हैं। सयानों ने ठीक ही फरमाया है कि सियासत तो करीबी रिश्तों में भी घोल देती है जहर।

शह और मात

हिमाचल में भाजपा के भीतर गुटबाजी बढ़ गई है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जगत प्रकाश नड्डा की बढ़ती सियासी हैसियत प्रेम कुमार धूमल खेमे को हजम नहीं हो रही। मोदी के अधिकतम आयु सीमा के फार्मूले से निपटाना चाहते हैं धूमल को नड्डा। पर धूमल तो अभी 74 के भी नहीं हुए हैं। धूमल खेमा आनंदीबेन पटेल की मिसाल दे धूमल के लिए कम से कम सवा साल का कार्यकाल तो चाह भी रहा है। पर नड्डा खेमा इसी कोशिश में है कि अगला विधानसभा चुनाव धूमल को मुख्यमंत्री के तौर पर पेश करके नहीं लड़ना चाहिए। धूमल का पत्ता कटेगा तभी तो मौका मिल पाएगा नड्डा को। पहले नितिन गडकरी और अब नरेंद्र मोदी व अमित शाह की जोड़ी के दबदबे ने बढ़ा दी है नड्डा की हैसियत। तभी तो मुख्यमंत्री की कुर्सी का ख्वाब देखने लगे हैं। कभी शांता कुमार के भरोसेमंद थे नड्डा। लेकिन बाद में धूमल के दरबार में हाजिरी बजा कर अस्तित्व बचा लिया। उनकी बढ़ती हैसियत से सूबे के पार्टी विधायक भी अनजान नहीं हैं। तभी तो वे धूमल को छोड़ अब नड्डा की परिक्रमा में हित देखने लगे हैं। हालांकि धूमल खेमा भी आसानी से हार मानने वाला नहीं। धूमल की उम्र आड़े आई तो उनके बेटे अनुराग ठाकुर को उत्तराधिकारी के तौर पर स्थापित करना चाहेगा यह खेमा। साफ है कि शह और मात के खेल में दोनों खेमे अभी से जुट गए हैं। भले विधानसभा चुनाव दूर क्यों न हो।

श्रद्धा की सियासत

द्वारिका और बद्रीनाथ दोनों पीठों के शंकराचार्य हैं स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती। रविवार को उम्र के 93 साल पूरे किए तो श्रद्धालु अनुयायियों ने आयोजित कर दिया नितिन गौतम के फार्महाउस में उनका जन्मदिन समारोह। पर साधु-संतों से ज्यादा जमावड़ा कांग्रेसी नेताओं का नजर आया। भाजपाई तो अक्सर ही उन्हें कांग्रेसी संत बता उनका मखौल उड़ाते रहते हैं। बहरहाल मुख्यमंत्री हरीश रावत से लेकर मध्य प्रदेश के कद्दावर कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह, सुरेश पचौरी और रामेश्वर नीखरा सभी ने हाजिरी बजाई। दरअसल सनातन धर्म में चातुर्मास परंपरा है साधु-संतों के लिए। हरिद्वार में चल रहा है स्वरूपानंद का चातुर्मास। गो हत्या और राम मंदिर जैसे मुद्दों से लेकर काले धन और कश्मीर के सवाल सभी पर वे खुलेआम घेरते हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को। उत्तराखंड में अगले साल विधानसभा चुनाव भी होंगे। तो क्या सियासी फायदे के लिए ही बार-बार हाजिरी बजा रहे हैं स्वरूपानंद की हरीश रावत। भाजपाई उन्हें कांग्रेसी संत बताने से पहले भूल जाते हैं कि उनके अनुयायियों में भाजपाई भी कम नहीं। और तो और जन्मदिन समारोह के लिए अपना फार्महाउस मुहैया कराने वाले नितिन गौतम भी तो बजरंग दल के नेता ठहरे।

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