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राजपाट: सियासी पैंतरे

शहाबुद्दीन हों या रघुवंश प्रसाद सिंह या राजद में और कोई नेता, नीकु के खिलाफ कुछ भी बोलने की हिम्मत नहीं कर सकते।

Author Updated: September 19, 2016 3:55 AM
भागलपुर जेल से जमानत पर छूटे आरजेडी के पूर्व सांसद शहाबुद्दीन।

सियासी पैंतरे 

नीकु करें तो क्या करें। राजद के शहाबुद्दीन और रघुवंश प्रसाद सिंह के बयान के बाद जद (एकी) के नेता भी पलटवार की तैयारी में आगे आए, तब राजद के नेता ठंडा पड़े। राजद के नेता जो जतलाना चाहते थे। वे उसमें कामयाब भी हो गए। सूबे में यह संदेश गया कि नीकु यानी नीतीश कुमार भले ही मुख्यमंत्री के पद पर हों, लालू प्रसाद जो चाहेंगे, वही होगा। सरकार तब तक है, जब तक लालू प्रसाद चाहेंगे। नीकु अभी तक वही करते आए हैं, जो लालू प्रसाद को भाया। इसके बावजूद राजद नेताओं ने नीकु पर उंगली उठाई। शहाबुद्दीन हों या रघुवंश प्रसाद सिंह या राजद में और कोई नेता, नीकु के खिलाफ कुछ भी बोलने की हिम्मत नहीं कर सकते। जब उन्हें यह आभास हो जाता है कि वे नीकु के खिलाफ जो बोलेंगे, उन्हें उसका खमियाजा नहीं भुगतना पड़ेगा, तो वे वह बोल जाते हैें। खमियाजा का मतलब लालू प्रसाद की फटकार। लालू प्रसाद ने अभी तक तो शहाबुद्दीन को नहीं फटकारा और न ही रघुवंश प्रसाद सिंह को। चुप रहे। नीकु भी क्या करते, किसी तरह अपनी प्रतिष्ठा का बचाव किया।

जानकार तो यह बताते हैं कि विरोधी पार्टियों की ओर से शहाबुद्दीन का ज्यादा से ज्यादा विरोध करने से नीकु को ही फायदा होगा। शहाबुद्दीन के विरोध का मतलब लालू प्रसाद और उनकी पार्टी का विरोध। नीकु और उनकी पार्टी तो लालू प्रसाद और उनकी पार्टी के खिलाफ चूं तक नहीं बोल सकते। बंदरघुड़की की बात अलग है। विरोधी पार्टियों की ओर से शहाबुद्दीन का विरोध करने पर नीकु और उनकी सरकार को भी यह बहाना मिलेगा कि ऐसा कदम उठाना जरूरी है, जिससे विरोधी पार्टियों को फायदा उठाने का मौका नहीं हो। नीकु सत्ता में रहते काफी खट्टे-मीठे अनुभव देख चुके हैें। जब उनकी अकेले अपनी पार्टी की सरकार थी, तो एक बार अपनी कुर्सी पर जीतन राम मांझी को बैठा दिया। लेकिन फिर उन्हें हटाना पड़ा। कई साथियों को गंवाना पड़ा। मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे। उसके बाद ही तो लालू प्रसाद मददगार के रूप में सामने आए। उस समय से उनकी लालू प्रसाद और राजद पर जो निर्भरता हुई, वह धीरे-धीरे बढ़ती गई है। अब तो हाल यह है कि कुर्सी छोड़ भी नहीं सकते। यह भी नहीं बोल सकते कि लोगों की सेवा के लिए राजनीति करते हैं, कुर्सी के लिए नहीं। उनकी निर्भरता जिन पर है, उनकी निगाह तो नीकु की कुर्सी पर है ही।
अंधेर नगरी

राजस्थान में मंत्रियों के हाल खराब होने से पूरी भाजपा सरकार की छवि ही बिगड़ रही है। मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के करीबी मंत्रियों के विभागों में ऐसा काम हुआ कि अब जनता पूरी सरकार को कोसने लग गई है। भाजपा की ही केंद्र सरकार अपने मंत्रियों के कामकाज का पूरी तरह से आकलन करने में लगी है और खराब काम वाले मंत्रियों को प्रधानमंत्री और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह की फटकार सुनने को मिलती है। राजस्थान के कामकाज की रिपोर्ट भी आलाकमान तक पहुंच रही है। इसमें सबसे ज्यादा सड़क, स्वास्थ्य, शहरी विकास में खासतौर पर साफ सफाई आदि के मामलों की जानकारी भाजपा आलाकमान भी अपने स्तर पर जुटा रहा है। विकास और जनहित के मामलों में अपनी ही राजस्थान सरकार के फिसड्डी रहने की पूरी जानकारी अमित शाह तक लगातार पहुंच रही है। मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के सामने तो प्रदेश के तमाम मंत्री बौने ही हैं, पर जब केंद्रीय नेतृत्व ने हिसाब-किताब जानने का संदेश भिजवाया तो पूरी सरकार ही चकरा गई। इसमें सबसे ज्यादा परेशानी वसुंधरा राजे के करीबी मंत्रियों को हो रही है। मुख्यमंत्री कई बार मंत्रियों को हड़का चुकी हैं पर उन पर कोई असर ही नहीं होता। मंत्रियों का सीधा सा जवाब होता है कि हम क्या करें अफसर सुनते ही नहीं हैं। प्रदेश में नौकरशाही किसी मंत्री की नहीं सुन रही है। प्रदेश भाजपा मुख्यालय में मंत्रियों की नाकामियों के किस्से अपने चरम पर पहुंच गए है।

पार्टी के प्रभारी के तौर पर संगठन मंत्री वी सतीश भी अब हार मान चुके हैं तभी तो राजमहल पैलेस मामले में आलाकमान ने सौदान सिंह को भेज कर मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे पर दबाव बनाया था। प्रदेश में राजे के करीबी मंत्रियों युनूस खान, राजपाल सिंह शेखावत, प्रभुलाल सैनी, गजेंद्र सिंह खींवसर आदि के महकमों में तो हालात बेहद खराब है। मुख्यमंत्री का खास होने का तमगा लगा कर घूमने वाले पीडब्ल्यूडी और परिवहन मंत्री युनूस खान के विभाग का कामकाज जमीन पर पूरी तरह से जीरो ठहर रहा है। प्रदेश में सड़कों की हालत खराब है और परिवहन विभाग में भ्रष्टाचार का बोलबाला है। इसी तरह नगरीय विकास मंत्री राजपाल सिंह शेखावत के महकमे में तो सबसे बुरी हालात है। शेखावत खुद जयपुर शहर से ही विधायक हैं पर स्मार्ट सिटी घोषित गुलाबी नगरी में सफाई व्यवस्था पूरी तरह से चरमरा गई है। जयपुर के मेयर के खिलाफ नगर निगम के तमाम पार्षद मैदान में हल्ला मचा रहे हैं पर मंत्री से लेकर पार्टी सूबेदार अशोक परनामी तक चुप बैठे हंै। शेखावत की किरकिरी तो राजमहल पैलेस मामले में ऐसी हुई कि पूरी सरकार की कार्यशैली ही कठघरे में खड़ी हो गई। स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र राठौड़ के महकमे की हालत तो बदतर हो गई है। सरकारी अस्पतालों की दुर्दशा से आम आदमी खासा परेशान हो उठा है। राठौड़ जब प्रदेश में किसी तरह के मलेरिया, वायरल, डेंगू, चिकनगुनिया आदि की बीमारी नहीं फैलने का दम भर रहे थे तो दूसरे दिन ही खुद ही चिकनगुनिया की चपेट में आ गए। प्रदेश में हालत बदतर होने और शासन में भाजपा की किसी भी तरह की छवि नहीं झलकने से राष्ट्रीय नेतृत्व ने अब अपना दखल बढ़ाने का संदेश जरूर दिया है। इससे ही भाजपा के जमीनी कार्यकर्ता थोडेÞ उत्साहित हैं वरना उनमें निराशा ही निराशा छाई हुई है।
आंख का कांटा

सुक्खू अब मुख्यमंत्री वीरभद्र्र सिंह के राडार पर हैं। सुखविंदर सिंह सुक्खू हिमाचल कांग्रेस के सूबेदार हैं। सुक्खू वीरभद्र सिंह की कभी पसंद नहीं रहे। वीरभद्र सिंह के मुख्यमंत्री बनने पर सुक्खू आलाकमान के आशीर्वाद से कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष बने तो किसी के एतराज नहीं था। पर चुनाव निकट आने के कारण सुक्खू वीरभद्र सिंह को खटकने लगे हैं। खूब चर्चा रही कि अब सुक्खू बदले जाएंगे। आलाकमान से लेकर सार्वजनिक मंचों तक वीरभद्र सिंह समर्थक सुक्खू के खिलाफ बोलने लगे। सुक्खू को भी विरोध बढ़ते देख फरमाना पड़ा कि अध्यक्ष बदलने या न बदलने का काम आलाकमान करता है। ऐसे में मुख्यमत्री के भी विरोधाभास पूर्ण बयान आए। पर कुल मिला कर वीरभद्र्र सिंह ने सुक्खू की कार्यशैली पर प्रश्नचिह्न उठाए हैं।

करीब एक सौ सचिवों की तैनाती वीरभद्र सिंह को खल रही है। सुक्ख्ूा कह रहे हैं कि इतने सचिव नहीं हैं जितने वीरभद्र सिंह बता रहे हैं। जो भी तैनातियां हुई हैं, वे आलाकमान की मंजूरी के बाद की है। पर सुक्खू को समझाने की कोशिश की जा रही है कि भाई नियुक्तियांं कांग्रेस के संविधान के अनुसार होती हैं। इतनी नियुक्तियांं करने की संविधान कहां इजाजत देता है। पर सुक्खू अपने विरोध होने के बाद अब गरज रहे हैं। पर मुख्यमंत्री का सामना वे कहां कर सकते हैं। जब हिमाचल कांग्रेस में वीरभद्र सिंह निरंतर मजबूत हो रहे हैं। पिछले विधानसभा के चुनावों से ठीक पहले भी कांग्रेस ने कौल सिंह ठाकुर जैसे अध्यक्ष को हटा कर यह ताजपोशी वीरभद्र सिंह को सौंप दी थी। ऐसे में सुक्खू भी मुख्यमंत्री के गुस्से का शिकार हो जाएं तो बड़ी बात नहीं होगी।

चुनावी चुहल

वीरभद्र सिंह सरकार के चार साल पूरे होने पर भाजपा कांग्रेस के खिलाफ राजनीतिक चार्जशीट तैयार करेगी। भाजपा ने शिमला के विधायक सुरेश भारद्वाज को चार्जशीट कमेटी का संयोजक बना कर इसे तैयार करने की तरफ एक कदम आगे बढ़ा दिया है। अभी चार्जशीट बनाने का काम ठीक से शुरू नहीं हुआ है। भाजपा ने इसे बनाने से पहले ही खलबल सी मचा दी है। भाजपा के प्रवक्ताओं की टीम ने कांग्रेस सरकार पर हल्ला सा बोल दिया है। कहा है कि कांग्रेस सरकार में धड़ल्ले से सिफारिशी पर्चियों पर भर्ती हो रही है। यानी औपचारिक अवेदन पत्र की की जरूरत महसूस नहीं की जा रही है। ये प्रवक्ता दावा भी कर रहे हैं कि उनके पास इस सिलसिले में वीडियो क्लीपिंग से लेकर सिफारिशी पत्र तक हैं। कहा गया है कि यह सब चार्जशीट कमेटी को सौंप दिया जाएगा। इससे वीरभद्र सिंह सरकार के मंत्रियों तक पलटवार के रूप में बयान आ रहे हैं।

भाजपा को उनकी सरकार के मंत्रियों के खिलाफ बनी चार्जशीट को याद करवा कर कांग्रेस के मंत्री गड़े मुर्दे उखाड़ने की कोशिश कर रहे हैं। पर यह तय है कि अगला साल हिमाचल में चुनावी वर्ष होगा जिसके कारण भाजपा अपनी कुंद हुई धार को तेज करने की कोशिश में लगी है। और वीरभद्र सिंह सरकार भी भाजपा के हर हमले का जवाब आगे आकर देना चाहती है। दोनों में यह मलयुद्ध और तेज होगा, इस बात की संभावना अधिक लगती है। भाजपा इस मामले में तो विफल हो ही गई है कि वीरभद्र सिंह के आय से अधिक संपत्ति के मामले में प्रदेश में कोई संवैधानिक संकट खड़ा हो जाएगा। मध्यावधि चुनाव की अटकलें तो थम ही गई हैं। अगर मध्यावधि चुनाव पांच सात महीने पहले हो तो वे वीरभद्र सिंह की मर्जी से होंगे।
रिश्तों का फेर

उत्तराखंड में कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष किशोर उपाध्याय ने हरीश रावत के खिलाफ खुलेआम मोर्चा खोल दिया है। किशोर उपाध्याय के निशाने पर टिहरी विधानसभा क्षेत्र के निर्दलीय विधायक और रावत सरकार में कैबिनेट मंत्री दिनेश धनै है। दिनेश धनै ने पिछले विधानसभा चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में किशोर उपाध्याय को हराया था। उपाध्याय कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लडेÞ थे, जबकि निर्दलीय उम्मीदवार धनै को विजय बहुगुणा का समर्थन हासिल था। 2012 के विधानसभा चुनाव में दिनेश धनै विजय बहुगुणा के खासमखास थे। और किशोर उपाध्याय हरीश रावत के सगे थे। किशोर को हराने के लिए बहुगुणा ने धनै को आजाद उम्मीदवार के रूप में विधानसभा चुनाव लड़वाया था। धनै को विधानसभा चुनाव जितवा कर बहुगुणा ने हरीश रावत को पटखनी दी थी। रावत के विरोध के चलते धनै को बहुगुणा अपने मंत्रिमंडल में मंत्री नहीं बना सके। परंतु मुख्यमंत्री बनने के बाद हरीश रावत ने सतपाल महाराज की पत्नी अमृता रावत को मंत्री पद से हटा कर धनै को कैबिनेट मंत्री बना दिया। धनै के कहने पर ही रावत ने किशोर उपाध्याय को राज्यसभा का टिकट नहीं लेने दिया। अब रावत उपाध्याय को नाकों चने चबाने के लिए टिहरी के बजाय ऋषिकेश से अगला विधानसभा चुनाव लड़वाना चाहते हैं। दिनेश धनै और हरीश रावत ठाकुर हैं। दोनों ठाकुर नेताओं ने ब्राह्मण किशोर उपाध्याय के खिलाफ खुलेआम मोर्चा खोल लिया है।

 

स्याही के पीछे का दर्द

मध्यप्रदेश में स्थित एक मात्र एम्स अस्पताल के हाल बेहाल है। 2003 में तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री सुषमा स्वराज के भूमि पूजन के बाद अब तक चार केंद्रीय मंत्रियों ने इस अस्पातल का दौरा किया और सभी ने छह महीने में बेहतर सुविधाओं का वादा किया। उसके बाद किसी ने भी भूल कर इसकी सुध नहीं ली। आज भी एम्स के 42 विभागों में से 31 विभागों के ताले भी नहीं खुले हैं। पिछले हफ्ते भोपाल पहुंचे केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री नड्डा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन के अवसर पर भाजपा मुख्यालय में रक्तदान शिविर का शुभारंभ किया और इसके बाद एम्स पहुंचे। आरोप है कि केंद्रीय मंत्री के आने की जानकारी मिलते ही एम्स प्रबंधन ने एक ही दिन में जर्जर सड़क को दुरुस्त करवा दिया और आठ घंटे में गायनोकोलोजी विभाग का एक डिलेवरी वार्ड भी बना डाला। अलबत्ता यह बात और है कि यहां अभी तक एक भी डिलेवरी नहीं हुई है। एम्स में व्याप्त अव्यवस्थाओं और असुविधाओं से गुस्साए करीब तीन सौ छात्रों ने अस्पताल परिसर में केंद्रीय मंत्री और प्रबंधन के खिलाफ नारेबाजी की। यही नहीं, इस बीच किसी ने मंत्री जेपी नड्डा पर स्याही फेंक दी। वाकया उस वक्त हुआ जब नड्डा की कार का घेराव भी किया। इसी बीच ड्राइवर ने कार चला दी, इससे दो छात्राएं जख्मी हो गईं।

हालांकि निरीक्षण के दौरान नड्डा ने एमआरआई, सीटी स्कैन के अलावा दो वार्डों के साथ अस्पताल परिसर में दवा दुकान अमृत फार्मेसी का लोकार्पण भी किया। हालात को भांप चुके नड्डा मीडिया से बचते रहे। निरीक्षण के बाद एम्स संचालक द्वारा दिए गए प्रजेंटेशन के बाद अपने संबोधन में नड्डा ने एक शेर के जरिए अपनी पीड़ा व्यक्त की। उन्होंने कहा- ‘लम्हों ने खता की थी, सदियों से सजा पाई।’ उन्होंने कहा कि भोपाल एम्स से सबक लेते हुए दूसरी जगहों पर गलत निर्णयों से बचा जा रहा है। वहीं नड्डा ने यह तर्क भी दिया कि एम्स दिल्ली को बनने में तीस साल लगे थे, भोपाल को तो तेरह साल ही हुए हैं, अभी हमारे पास सत्रह साल हैं। मंत्रीजी की यह बात लोगों को हजम नहीं हुई। यहां नड्डा ने फीते तो काटे लेकिन हकीकत में अभी कुछ समय तक सुविधाएं नहीं मिल पाएंगी क्योंकि जहां एमआरआई व सिटी स्कैन के टेक्नीशियन नहीं हैं, तो अमृत फार्मेसी में कैंसर व हृदय रोग संबंधी दवाओं का टोटा है। अभी केवल डेढ़ सौ बिस्तर हैं जबकि नौ सौ बिस्तर होने चाहिए। यहां पढ़ने छात्रों का दर्द सुनकर सचमुच चिंता होती है। उनके मुताबिक इलाज तो दूर की बात हमें तो सही से इंजेक्शन लगाना भी नहीं आता है। यहां पर कोई प्रैक्टिकल नहीं कराया जाता है। काबिल डॉक्टर बनने आए थे यहां। लेकिन हकीकत कुछ और है। एक नवंबर को एमबीबीएस का पहला बैच निकलने वाला है। किताबी ज्ञान तो मिल गया लेकिन प्रैक्टिकल नदारद।
सिद्धू की दुविधा
आखिर नवजोत सिंह सिद्धू ने भाजपा से इस्तीफा दे दिया। भले अपना मोर्चा बनाने के बाद सवाल उठने पर कि क्या भाजपा से संबंध रखते हुए ही वे अपना मोर्चा चलाएंगे। दिलचस्प यह जरूर है कि उनकी पत्नी नवजोत कौर सिद्धू न केवल अभी भाजपा में ही हैं बल्कि बादल सरकार में मुख्य संसदीय सचिव भी हैं। ऐसे में कांग्रेस और दूसरे विरोधियों का यह सवाल उठाना बाजिव ही है कि कहीं सिद्धू भाजपा से बिगाड़ नहीं करके अपने लिए वापसी का राह बनाए रखना चाहते हैं। या यह कि वे सिर्फ विधानसभा चुनाव तक भाजपा के विरोधी हैं। वैसे कौर का कहना है कि वे निश्चित तौर पर इस्तीफा देंगी। उनका कहना है कि वे केवल अपने क्षेत्र की विधायक हैं और वक्त का इंतजार कर रही है। उनका यह भी कहना है कि भाजपा वाले उनसे अच्छा बर्ताव नहीं कर रहे। शुरुआत में, उनके आप में शामिल होने की बात हो रही थी और अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में इसके चेहरा बनने की चर्चा हो रही थी। लेकिन दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के खिलाफ उनके तीखे हमले से इसकी संभावना समाप्त हो गई है।

इस महीने की शुरुआत में ‘आवाज-ए-पंजाब’ फोरम गठित करने के बावजूद उन्होंने भाजपा से इस्तीफा नहीं दिया था। वैसे उनके मोर्चे को अभी ज्यादा समर्थन नहीं मिल पाया है। चर्चित नेता उनके साथ नहीं जुड़े हैं। हां, इसी हफ्ते आप से अलग हुए सुच्चा सिंह छोटेपुर ने जरूर उन्हें समर्थन देने की बात कही है। दिक्कत यह है कि सिद्धू का मोर्चा पंजाब में कोई गंभीर विकल्प नहीं दिख रहा। मोर्चे की घोषणा के हफ्ते बाद भी राजनीतिक स्तर पर कोई प्रगति नहीं दिख रही। ऐसे में कहना मुश्किल है कि सिद्धू सच में ही अकाली-भाजपा गठबंधन को हराने के इच्छुक हैं। आने वाले समय में देखना दिलचस्प होगा कि आप की पंजाब में क्या स्थिति रहती है और कौन बड़े नेता सिद्धू के मोर्चे के साथ जुड़ते हैं!

 

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