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राजपाट: तीन तिगाड़ा-खेल बिगाड़ा

पश्चिम बंगाल में भाजपा को उम्मीद के मुताबिक सफलता नहीं मिली तो क्या? अपने दो धुर विरोधियों का तो उसने बेड़ा गर्क करा ही दिया। एक तरह से तृणमूल कांग्रेस के लिए संजीवनी साबित हुई मोदी की पार्टी।

नई दिल्ली | Updated: October 31, 2017 9:42 PM
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। (पीटीआई फोटो)

पश्चिम बंगाल में भाजपा को उम्मीद के मुताबिक सफलता नहीं मिली तो क्या? अपने दो धुर विरोधियों का तो उसने बेड़ा गर्क करा ही दिया। एक तरह से तृणमूल कांग्रेस के लिए संजीवनी साबित हुई मोदी की पार्टी। वोट कटवा भूमिका से कांग्रेस और माकपा दोनों का भट्ठा बैठा दिया। कम से कम 70 विधानसभा सीटों के समीकरणों को प्रभावित कर दिया। लोकसभा चुनाव में पार्टी को सूबे में सीटें भले दो ही मिल पाई थी पर वोट की हिस्सेदारी बढ़ कर साढ़े सत्रह फीसद तक जा पहुंची थी। विधानसभा चुनाव में इस कसौटी पर उसे घाटा ही हुआ। वोट घट कर 10.2 फीसद रह गई और सीटें भी तीन ही मिल पाई। पिछले विधानसभा चुनाव की बात करें तो उसकी तुलना में पार्टी फायदे में ही रही है। तब तो उसे महज चार फीसद वोट ही मिल पाए थे। सूबे की 294 में से 262 सीटों पर उसे दस हजार से ज्यादा वोट मिलना उम्मीद जगाने वाला है। भाजपाई सीना तान कर कह रहे हैं कि इस सूबे में अब भाजपा की अनदेखी नहीं की जा सकती। माकपा के सचिव सूर्यकांत मिश्र तभी तो रो रहे हैं कि भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के बीच नूरा-कुश्ती थी।

खलनायक हुआ नायक
खुद को तुर्रम खां समझते हैं आइएएस अफसर। पर राजस्थान में घबराए हुए हैं। वसुंधरा राजे के दूसरे कार्यकाल में भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो का शिकंजा कसने का नतीजा है यह बेचैनी। अशोक सिंघवी के गिरफ्त में आने का असर ज्यादा दिखा। सबसे मोटी मलाई वाले खनिज विभाग के मुखिया थे सिंघवी। ऊपर से मुख्यमंत्री की आंख के तारे। ब्यूरो ने दबोचा तो हर कोई हैरान रह गया। हालांकि एलसी असवाल उनसे भी पहले फंस गए थे जाल में। असवाल के हुनर का तो सभी लोहा मानते थे। किसी का भी राज रहा हो वे सत्ता के करीब ही बने रहे। तीसरे तीसमार खां थे जीएस संधू। उन्हें तो ब्यूरो ने रिटायर होने के बाद भी नहीं छोड़ा। गिरफ्तार कर जेल की हवा खिला दी। ताजा मामला राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन की घूसखोरी का पकड़ में आया है। अभी आइएएस पवन की गर्दन तक हाथ नहीं पहुंचा है ब्यूरो का। अलबत्ता उनके कई मातहत अफसर और एक दलाल चक्रव्यूह में फंस चुका है। ब्यूरो में जब से आइजी दिनेश एमएन ने काम संभाला है, आइएएस लाबी में खलबली मची है। सोहराबुद्दीन मुठभेड़ मामले में सात साल अमदाबाद की जेल में बिताए थे दिनेश ने। जिस समय मुठभेड़ हुई थी वे उदयपुर के पुलिस कप्तान थे। लेकिन केंद्र और राजस्थान दोनों जगह सत्ता परिवर्तन हुआ तो दिनेश के दिन भी फिर गए। आइएएस लाबी को अपने बचाव में कोई ठोस तर्क नहीं दिखा तो आरोप जड़ दिया कि ब्यूरो आइपीएस अफसरों पर हाथ क्यों नहीं डाल रहा। कार्रवाई के मामले में दोहरे मापदंड का आरोप लगा मुख्यमंत्री से उनके तबादले की मांग कर चुकी है आइएएस लाबी। यह बात अलग है कि दिनेश को अमित शाह का चहेता होने का लाभ मिल रहा है। भ्रष्ट आइएएस अफसरों पर कार्रवाई कर लोगों के बीच अपनी लोकप्रियता भी बढ़ा ली दिनेश ने। सोशल मीडिया ने तो नायक ही बना डाला है उनको।

सियासी खिलाड़ी
नीकु की चाल होती ही है ऐसी कि विरोधी देखते रह जाए। नीकु यानी नीतीश कुमार। एक तो मुख्यमंत्री, दूसरे जद (एकी) के राष्ट्रीय अध्यक्ष। सरकार की बागडोर एक हाथ में और दूसरे हाथ में पार्टी की बागडोर। जब शरद यादव पार्टी के अध्यक्ष पद से विदा हुए, तो यह खूब चर्चा हुई कि अब उनके राजनीतिक भविष्य का समापन है। शरद यादव के भविष्य को लेकर ऐसे नेता चिंतित दिखे, जिनकी बदौलत नीकु मुख्यमंत्री हैं। बात यही नहीं, शरद यादव की मियाद राज्यसभा में पूरी होते देख यह भी चर्चा शुरू हुई कि राज्यसभा में वे रह पाएंगे या नहीं। उनका राज्यसभा में जाना नीकु की मर्जी पर। शरद यादव के समर्थक हों या विरोधी, सभी की निगाह नीकु पर। नीकु कम अनुभवी नहीं हैं। उनको स्थिति को भांपने में देर नहीं लगती। शरद यादव पुराने नेता हैं। बिहार से लोकसभा या राज्यसभा में पहुंचते रहे हैं। केंद्र की राजनीति में उनकी अच्छी पैठ है। नीकु ने जार्ज फर्नांडीज को दरकिनार कर शरद यादव को पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद सौंपा। इस बावत नीकु को कम विरोध नहीं झेलना पड़ा। किसी तरह जार्ज फर्नांडीज को मना पाए और आखिर में अपने करीब ले आए। राज्यसभा भेज कर अपने को उनके करीब जता पाए। शरद यादव को पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर बनाए रखने के लिए पार्टी के संविधान में फेर बदल किया। इस बीच राजनीतिक स्थिति में भी काफी फेर बदल आया। नीकु भाजपा से अलग हो कर लालू प्रसाद के साथ हो लिए। पहले से ज्यादा ताकतवर भी हो गए। शरद यादव की स्थिति यह हुई कि उन्हें ज्यादा से ज्यादा नीकु पर ही निर्भर होते रहना पड़ा। ऐसी स्थिति भी आ गई कि उन्हें राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद से भी हटना पड़ा। राज्यसभा की सदस्यता खत्म हो रही है। नीकु ने शरद यादव को फिर से राज्यसभा भेजने का फैसला किया। उन्होंने यह संदेश दिया कि वे अपनी पार्टी के बड़े-बूढ़े नेताओं की कद्र करते हैं। जार्ज की वजह से उन पर विरोधियों ने अपनी पार्टी के बड़े बूढ़े की क द्र नहंीं करने का आरोप लग चुका था। इस बार इस आरोप से बच गए। शरद यादव को दिल्ली में रहने का मौका मिल गया। नीकु के बगल में खड़े मिलेंगे।

निशाने पर भाजपा
लालू प्रसाद ने कोलकाता से लौटते ही पटना में फेडरल फ्रंट की बात कर दी। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की ओर से दूसरी बार मुख्यमंत्री पद का शपथ ग्रहण लेने के मौके पर आयोजित समारोह में वे हिस्सा लेने गए थे। ममता बनर्जी के शपथ ग्रहण समारोह में भाजपा विरोधी कई मुख्यमंत्री और नेता जुटे थे। लालू प्रसाद शुरू से ही भाजपा के घोर विरोधी रहे हैं। भाजपा विरोधी मुख्यमंत्रियों और नेताओं को देख कर उनका उत्साहित होना अस्वाभाविक नहीं था। उसी वजह से भाजपा के विरोध में फेडरल फ्रंट की बात कर दी। पिछले कई सालों से भाजपा और कांग्रेस के विकल्प में तीसरी ताकत के उभरने की चर्चा होती रही है। लेकिन उसका आज तक कोई नतीजा नहीं निकला। लालू प्रसाद अब केवल भाजपा के विरोध और विकल्प में तीसरी ताक त को उभारने पर जुटे हैं। कांग्रेस को भी साथ लेकर चलना चाहते हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में बिहार में उन्हें जो कामयाबी मिली, उससे भी उन्हें यह लगने लगा है कि भाजपा के खिलाफ विरोधी पार्टियों के एकजुट करने की सफल पहल कर सकते हैं। अपने राज्य में नीतीश कुमार को वापस लाने का श्रेय मिल चुका है। वे यह जताना चाहते हैं कि वे भाजपा को केंद्र से उखाड़ विरोधी पार्टियोें को सत्ता में वापस ला सकते हैं।

भाजपाई रंग
युवा सांसद चिराग पासवान हैं तो लोजपा के नेता, लेकिन वे काम ऐसे कर रहे हैं, जो भाजपा के नेता भी नहीं कर पा रहे हैं। चिराग अपनी पार्टी के संसदीय बोर्ड की नेता भी हैं। दलित नेता रामविलास पासवान के पुत्र तो हैं ही। पहली बार बिहार के जमुई से चुनाव लड़े और लोकसभा पहुंच गए। जब रामविलास पासवान यह तय नहीं कर पा रहे थे कि वे भाजपा के साथ जाएं या राजद के साथ। तब चिराग ने ही दबाव डाला कि लोजपा भाजपा के साथ हाथ मिला ले। नतीजतन लोजपा के छह सांसद हैं। चिराग बिगड़ी कानून व्यवस्था को लेकर नीतीश सरकार पर लगातार प्रहार कर रहे हैं। सूबे में राष्ट्रपति शासन की भी मांग कर रहे हैं। अब तो यह भी सवाल उठाना शुरू कर दिया है कि नीतीश कुमार अब क्यों नहीं अपराध और अपराधी पर नियंत्रण कर पा रहे हैं। जबकि भाजपा के साथ थे, तो राज्य में अपराध और अपराधी पर नियंत्रण करने में कामयाब थे। उनका संकेत है कि अब तो नीतीश कुमार के साथ भाजपा नहीं, लालू प्रसाद हैं यानी लालू प्रसाद की वजह से ही नीतीश कुमार अपराध और अपराधी पर नियंत्रण नहीं कर पा रहे हैं। भाजपा जिस बात को जुबान पर नहीं ला सकती थी, चिराग उस बात को डंके की चोट पर बोल रहे हैं। अपने मकसद में उनकी कामयाबी यह है कि लालू प्रसाद भी बौखला गए हैं। लालू प्रसाद बोल रहे हैं कि चिराग राजनीति में बच्चा है।

कंटीली डगर
जम्मू कश्मीर में मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती को कुर्सी संभाले एक महीने से ज्यादा हो गया है। लेकिन माना जा रहा है कि उनका काम पटरी पर नहीं बैठ पाया है। फिलहाल अफसरशाही हावी है जो महबूबा के पिता मुफ्ती सईद के मुख्यमंत्री रहते नहीं था। चूंकि पीडीपी का भाजपा से गठबंधन है, इससे आने वाले समय में दोनों के रिश्तों में खटास आ सकती है। भाजपा ने अभी तक महबूबा के कामकाज को लेकर एक बार भी किसी भी तरह की राय व्यक्त नहीं की है। यह माना जा रहा है कि भाजपा जैसा सुविधाजनक खुद को मुफ्ती सईद के साथ मानती थी वैसा अब नहीं मान रही है। महबूबा वैसे भी अपने पिता से इतर सूबे की राजनीति में थोड़ा सख्त मिजाज लाइन पर चलने वाली मानी जाती हैं। महबूबा को खतरा पार्टी के बीच उन लोगों से भी जो पीडीपी के बीच अपने पांव मजबूत करना चाहते हैं। पिता की अचानक मौत के बाद एक मौके पर महबूबा ने अपने भाई को अपनी मदद के लिए राजनीति में सक्रिय करने की कोशिश की थी लेकिन फिलहाल वे भी पर्दे के पीछे ही दिख रहे हैं। हो सकता है वे उन्हें अपनी खाली होने वाली सीट पर लोकसभा का चुनाव लड़ाएं। छह महीने के भीतर महबूबा को विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य बनना होगा। जानकारों की माने तो मुख्यमंत्री बनने से पहले कभी किसी प्रशासनिक ओहदे पर काम का अनुभव न रखने वाली महबूबा मुफ्ती पूरी ताकत से काम नहीं कर पा रहीं। भाजपा का अलग से सरकार पर दबाव रहता है। पार्टी के बीच भी विभिन्न मत रखने वालों का दबाव उन पर है। ऐसे में उन्हें किसी मजबूत सलाहकार की दरकार है। कुछ दिन पहले ही उन्हें कहना पड़ा कि यदि अपने किए वादे करने में सफल नहीं होती हैं तो अपने पद से इस्तीफा दे देंगी। किसी भी मुख्यमंत्री के पद ग्रहण करने के दो महीने के भीतर ही ऐसी बातें करने से, जाहिर है पार्टी काडर पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। वैसे भी सूबे की राजनीति को समझने वाले मानते हैं कि महबूबा आने वाले समय में नए चुनाव की कोशिश कर सकती हैं हालांकि पिछले चुनाव को अभी एक ही साल हुआ है। ऐसे में अगले दो साल के बीच भाजपा-पीडीपी गठबंधन की इस सरकार को कई इम्तिहानों से गुजरना होगा।

बागी का वार
वीरभद्र सिंह सरकार के पुलिस महानिदेशक आईडी भंडारी के निशाने पर हैं। पी मित्रा तो इस महीने के आखिर में मुख्य सचिव पद से रिटायर हो रहे हैं। पर सेवानिवृत्ति के समय ऐसी छिछालेदर किसी की नहीं होती जैसी मित्रा की भंडारी ने की है। मुख्यमंत्री के प्रधान निजी सचिव सुभाष आहलुवलिया से लेकर कुछ अपने जूनियर रहे आइपीएस अधिकारियों पर भंडारी ने निशाना साधा है। उन्होंने फरमाया है कि वीरभद्र सिंह भ्रष्ट अधिकारियों से घिरे हैं और जो उन्हें निरंतर गुमराह करते हैं। आइडी भंडारी पर आरोप था कि उन्होंने धूमल सरकार के समय एक हजार से ऊपर फोन अवैध रूप से टैप करवाए। उन्हें पुलिस निदेशक से हटा दिया गया। यही नहीं प्राथमिकी दर्ज करके उनके खिलाफ चालान भी अदालत में पेश कर दिया गया। दो साल से रिटायर होने के बाद भी भंडारी को न पेंशन मिली और न ऐरियर। सरकार की एजंसी ने जो चालान पेश किया उसमें कहा गया कि महज दो टेलीफोन अवैध रूप से टैप हुए हैं। जबकि बाद में पता चला कि यह फोन भी वैध तरीक से टैप हुए। लिहाजा भंडारी के खिलाफ पेश चालान को एक अदालत ने खारिज कर दिया। फिर क्या था भंडारी का स्वाभिमान जाग उठा। उन्होंने प्रेस कांफ्रेंस करके मुख्य सचिव से लेकर आइपीएस अधिकारियों तक घेरे में ले लिया। उन्होंने कहा कि मुख्य सचिव से लेकर एक कुछ अधिकारी तो ऐसे हैं जिन्हें उन्होंने आय से अधिक संपत्ति या फिर रिश्वत खोरी के आरोप में बुक किया था। इन अधिकारियों को उन्होंने अपने खिलाफ साजिशकर्ता बताया है। मुख्यमंत्री से इन अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने की चेतावनी दे डाली। सरकार के कुछ लोगों के खिलाफ मानहानि का मामला भी दर्ज करेंगे। पर उनकी घुड़की का खास असर तो अभी भी वीरभद्र्र सिंह सरकार पर होता नजर नहीं आ रहा है। असर हो रहा होता तो पिछले हफ्ते शुक्रवार की केबिनैट बैठक में मुख्य सचिव पी मित्रा की सेवाओं को सराहा नहीं जाता।


लाज बची

पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल का परिवार अब संकट से उबरता नजर आ रहा है। सासंद पुत्र अनुराग ठाकुर के बीसीसीआइ का अध्यक्ष बनने से इस परिवार की प्रतिष्ठा बहाल हो गई है। अनुराग के केंद्र में मंत्री न बनने के कारण इस परिवार को झटका लगा था। भाजपा के प्रदेश में सत्ता में न आने के कारण धूमल मुख्यमंत्री बनने से रह गए। धूमल विरोधी रहे जगत प्रकाश नड्डा केंद्र में ताकतवर मंत्री बन कर उभरे तो धूमल परिवार संकट में आ गया। चर्चाएं शुरू हो गई कि अब हिमाचल प्रदेश में अगर भाजपा सरकार बनीं तो जगत प्रकाश नड्डा ही मुख्यमंत्री बनेंगे। पर एक ही झटके में समीकरण बदल गए हैं। हवा का रुख धूमल की तरफ मुड़ा है। कहा जाने लगेगा कि अब अनुराग ठाकुर नड्डा के रुतबे के बराबर आ गए हैं। अब कभी मुख्यमंत्री को लेकर प्रतिस्पर्धा हुई तो अनुराग ठाकुर और जगत प्रकाश नड्डा में मुकाबला होगा। पहले मैच एकतरफा यानी नड्डा की तरफ ही बताया जाता था। अब धूमल परिवार की फिर से स्पर्धा है तो धूमल समर्थक नेता काफी खुश नजर दिख रहे हैं। तभी तो कहा है कि राजनीति में पता नहीं चलता कि ऊंट किस करवट बैठेगा।

नीयत में फितूर
आइएएस अधिकारी अजय गंगवार को अपनी फेसबुक पर नेहरू-गांधी परिवार की तारीफ व मोदी सरकार पर कटाक्ष करना काफी महंगा पड़ा। मध्यप्रदेश सरकार ने जिस ढंग से कार्रवाई कर बड़वानी कलेक्टर पद से हटाया उससे अन्य अफसरों को सिविल सेवा आचरण नियम के दायरे में रहने का संदेश जरूर गया है। इसी विवाद के बीच गंगवार की फेसबुक पर 23 जनवरी की एक और टिप्पणी भी गुरुवार को दिनभर चर्चा में रही। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरोध में लिखे एक अखबार में लेख को लाइक कर गंगवार ने लिखा था- मोदी के खिलाफ जनक्रांति होनी चाहिए। इसके बाद सरकार ने गंगवार को कलेक्टरी से हटा कर राज्य मंत्रालय में उपसचिव पदस्थ कर दिया। मालूम हो कि गंगवार आइएस कैडर से पदोन्नत होने से पहले पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के विशेष सहायक थे। सूत्रों के मुताबिक प्रदेश में सोशल मीडिया पर टिप्पणी को लेकर अधिकारी को हटाए जो शायद पहली घटना है। इससे पहले नरसिंहपुर के कलेक्टर सीबी चक्रवर्ती ने तमिलनाडु विधानसभा में दोबारा जीत दर्ज करने पर जयललिता को ट्वीट कर बधाई दी थी। तब भी चक्रवर्ती के खिलाफ कार्रवाई की बात उठी, लेकिन सरकार ने कोई कदम नहीं उठाया। बाद में विवाद बढ़ा तो ट्वीट को हटा लिया गया। गंगवार को हटाने के बाद सरकार उन्हें नोटिस थमाने की तैयारी में है। गंगवार का कहना है कि महापुरुषों की तारीफ करना अपराध नहीं है। तबादले से कोई समस्या नहीं, लेकिन नोटिस मिला तो उसका जवाब दूंगा। गंगवार पर कार्रवाई के बाद प्रमोटी और डायरेक्ट आइएएस के बीच फर्क करने का मामला भी गहराने लगा है। नरसिंहपुर कलेक्टर सीबी चक्रवर्ती जो डायरेक्ट आइएएस हैं को नोटिस दिया गया जबकि गंगवार जो प्रमोटी आइएएस हैं को सीधे हटा दिया गया है। इस विवाद ने अभिव्यक्ति की आजादी जैसे बहस के मुद्दों के साथ-साथ कांग्रेस ने भी तूल दे दिया। कांग्रेस के मुख्य प्रदेश प्रवक्ता केके मिश्रा के मुताबिक राज्य सरकार अभिव्यक्ति की आजादी रोक रही है। यदि गंगवार को हटाना ता तो सीबी चक्रवर्ती और कृषि विभाग के प्रमुख सचिव राजेश राजौरा जिन्होंने भाजपा दफ्तर जाकर राजनीतिक मंच से भाषण दिया था, उन्हे क्यों छोड़ दिया गया।

सर्कस के भोंपू
देश में मोदी सरकार के दो साल पूरे होेने पर उपलब्धियां गिनाने के मकसद से केंद्रीय मंत्रियों, पार्टी के वरिष्ठ पदाधिकारियों व सांसदों का देशभर में 27 मई से दो सौ स्थानों पर पत्रकार वार्ताएं कराने का लक्ष्य रखा है भाजपा ने। इसी शृंखला में मध्यप्रदेश में लगभग डेढ़ दर्जन मंत्रियों और सांसदों को दस स्थानों पर योजनाओं का बखान करने का जिम्मा मिला है। सभी पूरी ताकत लगाएंगे सरकार की ब्रांडिंग में। भोपाल में एक संगोष्ठी में ग्रामीण विकास मंत्री चौधरी बीरेंद्र सिंह प्रधानमंत्री के स्तुति गायन में ऐसे डूबे कि उनकी तुलना शंकराचार्य से कर डाली। फरमाया कि आदि शंकराचार्य ने संस्कृति की रक्षा करना सिखाया और दूसरे सरदार पटेल ने देश को एक किया। और एक मोदी हैं जिनमें शंकराचार्य और पटेल दोनों के गुण हैं। दूसरे आयोजन अंत्योदय सम्मेलन का समय सुबह दस बजे का था, लेकिन जब तक बीरेंद्र सिंह के बोलने की बारी आई ठेठ दुपहरी में सूरज तमतमा रहा था। तब तक अधिकांश महिलाएं अपने बच्चों के साथ चली गईं। दो तिहाई से ज्यादा कुर्सियां खाली हो गई थीं। प्रदेश कांग्रेस ने भी अपने विरोध का धर्म निभाया। राष्ट्रीय प्रवक्ता गिरिजा व्यास ने पोल-खोल अभियान के तहत पत्रकार वार्ता में मोदी की खूब लानत-मलानत कर डाली। देश को गुमराह करने का आरोप भी लगा दिया। ऊपर से तंज अलग कसा कि दो साल बीत गए अभी न तो कालाधन आया और न ही हरेक खाते में पंद्रह-पंद्रह लाख रुपए। ऊपर से महंगाई अलग बढ़ गई। क्या खाक फायदा हुआ मोदी की विदेश यात्राओं से देश का।

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