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राजपाट : भज आनंदम

गुजरात को सोचा था किसी जमाने में भाजपा और आरएसएस ने हिंदुत्व, सुशासन और विकास की प्रयोगशाला बनाना। पर पहले शंकर सिंह वघेला और फिर केशु भाई पटेल की बगावत व बाद में नरेंद्र मोदी के एकाधिकार ने पानी फेर दिया इस सपने पर।
Author नई दिल्ली | July 18, 2016 00:11 am
जग्गी वासुदेव सदगुरु ईशा फाउंडेशन नाम की संस्था चलाते हैं। इसमें योग के कई कार्यक्रम करवाए जाते हैं। (फोटो-फेसबुक)

गुजरात को सोचा था किसी जमाने में भाजपा और आरएसएस ने हिंदुत्व, सुशासन और विकास की प्रयोगशाला बनाना। पर पहले शंकर सिंह वघेला और फिर केशु भाई पटेल की बगावत व बाद में नरेंद्र मोदी के एकाधिकार ने पानी फेर दिया इस सपने पर। लगता है कि मध्यप्रदेश में खूब छन रही है संघ परिवार की भांग। तभी तो शिवराज चौहान की मंत्रिपरिषद ने हाल में नया ‘आनंद विभाग’ गठित करने का फैसला कर दिखाया। आनंद के विषय पर ज्ञान संसाधन केंद्र के रूप में काम करेगा यह भूतो न भविष्यति महकमा। इसके तहत राज्य आनंद संस्थान भी बनेगा। कोई भी विभाग बिना सरकारी अमले के भला कैसे चलेगा। सो- एक अध्यक्ष, एक सीईओ, एक अनुसंधान निदेशक और एक समन्वय निदेशक समेत कुल बीस पद भी लगे हाथ बना दिए चौहान की मंत्रिपरिषद ने। तीन करोड़ 60 लाख का बजट भी मंजूर कर डाला। अध्यक्ष को हर महीने मिलेंगे डेढ़ लाख तो सीईओ उनसे पंद्रह हजार कम पाएंगे। सुझाव के लिए 11 सदस्यों की विशेषज्ञ समिति भी फौरन बना दी।

जग्गी वासुदेव मताराज, स्वामी रामदेव, श्रीश्री रविशंकर, स्वामी अवधेशानंद आदि रहेंगे इसमें। बड़े विलक्षण हैं चौहान के विचार। पहुंचे हुए दार्शनिक के अंदाज में उपदेश दिया है कि दुनिया में सुख-सुविधाएं भले बढ़ रही हों पर आनंद का टोटा है। आनंद की व्याख्या भी कर डाली कि हमारी सहज और स्वाभाविक अवस्था है यह पर मनोविकारों ने दबा दिया है इसे। अपनी ही सरकार की इस मुद्दे पर हड़बड़ी चौहान की सहयोगी मंत्री यशोधरा राजे को अटपटी लगी। सो कैबिनेट की बैठक में टोक दिया कि नया विभाग गठित करने से पहले केंद्र की मंजूरी जरूरी होती है। शिवराज को अखरी उनकी टोका-टाकी। सो तपाक से बोले कि मंजूरी की जरूरत नहीं। यशोधरा भी हार मानने वाली कहां थीं। फिर फरमाया कि पहले पता कर लिया जाए। रही विपक्षी कांग्रेस की बात तो उसे यह फैसला क्यों भाता? उसने तुरंत गिना दी चौहान सरकार की विफलताएं। ऊपर से यह तुर्रा अलग कि प्रशासनिक व्यवस्था को ही दुरुस्त कर लेते तो आनंद विभाग की जरूरत ही न पड़ती। सवा लाख करोड़ कर्ज में पहले से डूबे सूबे पर इस फैसले को और बोझ मान रही है कांग्रेस। यानी राजनीति का मुद्दा बनेगा यह फैसला। भ्रष्टाचार, लाल फीताशाही, महिला अत्याचार, कुपोषण और सरकारी नाकामी से तो मुक्ति दिला नहीं पा रही चौहान सरकार पर टोटकों से फिर भी गुरेज नहीं।


माशाअल्लाह
मोदी मंत्रिपरिषद में राजस्थान की हिस्सेदारी बढ़ जाने का भी कोई सकारात्मक असर नहीं दिख रहा राजस्थान भाजपा में। अलबत्ता बड़े नेता चुनावी जीतों की खुमारी से बाहर ही नहीं आ रहे। छोटे नेताओं को भाव देने के बजाए दुत्कारते हैं पार्टी के ज्यादातर बड़े नेता। पर सत्ता सुख भोग रहे नेताओं की नींद अब उड़ने लगी है। पार्टी ने दावा किया था कि सूबे में उसके 80 लाख से ज्यादा सदस्य हैं। पर हैरानी की बात है कि राज्यसभा सदस्य तक पार्टी के सदस्य बनना गवारा नहीं कर रहे। पिछले दिनों जिन चार नेताओं को राज्यसभा भेजा उनमें से ओम प्रकाश माथुर और वेंकैया नायडू ही हैं भाजपा सदस्य। बाकी दोनों तो प्राथमिक सदस्य तक नहीं। तभी तो जमीनी कार्यकर्ता कटाक्ष कर रहे हैं कि 80 लाख में से राज्यसभा के लिए कोई नहीं मिला पार्टी को। सरकार पर नौकरशाही के हावी होने का रोना अलग रो रहे हैं भाजपा कार्यकर्ता। गुटबाजी तो खैर हर स्तर पर मौजूद है पार्टी में। कोटा में पार्टी के विधायक ही एक दूसरे की टांग खींच रहे हैं। मुख्यमंत्री का दरबारी विधायक इस कदर गुमान में है कि वरिष्ठ विधायकों और सांसद तक को ठेंगा दिखा रहा है। घनश्याम तिवाड़ी और नरपत सिंह राजवी जैसे तो अघोषित तौर पर मार्गदर्शक मंडल के लिए छोड़ दिए गए हैं। पार्टी के प्रभारी वी सतीश और राष्ट्रीय संगठन मंत्री भी रोज-रोज की कलह से आजिज आ गए हैं। और तो और भूपेंद्र यादव ने भी तौबा कर ली है पार्टी के झगड़ों से। कहने को अमित शाह की टीम के महासचिव भी हैं और अच्छे संगठनकर्ता भी माने जाते हैं।


दब्बू आलाकमान
कांग्रेस और माकपा के रिश्ते दोनों पार्टियों की अंदरूनी गुटबाजी की वजह बन गए हैं। कांग्रेस के साथ को लेकर माकपा में तो हर स्तर पर घमासान है। चुनाव में समझौता करने के प्रदेश समिति के फैसले की केंद्रीय समिति ने पिछले महीने जमकर खिंचाई की थी। इसे पार्टी की नीति का उल्लंघन भी बता दिया था। प्रदेश समिति के सियासी नजरिए के शुद्धिकरण की जरूरत अलग बताई थी। इसके बावजूद राज्य समिति कांग्रेस के साथ गठजोड़ जारी रखने की ही वकालत कर रही है। महासचिव सीताराम येचुरी की मौजूदगी में राज्य समिति की बैठक में सूबे के नेताओं ने खुलकर कहा कि तृणमूल कांग्रेस के बढ़ते हमलों और भाजपा की सांप्रदायिक नीतियों के खिलाफ लड़ने के लिए यह गठबंधन जरूरी है। अकेले तो कमजोर पड़ जाएगी माकपा। गठजोड़ का विरोध करने वाले केंद्रीय नेताओं की सियासी समझ पर भी सवाल उठा रहे हैं अब सूबे के माकपा नेता। पार्टी की घोषित नीति का उल्लंघन होना उन्हें कतई नहीं अखर रहा। अलबत्ता वे गठजोड़ को विकल्पहीनता की देन मान रहे हैं। राज्य समिति की बैठक में केंद्रीय समिति के नेताओं की बोलती बंद करने के लिए सूबे के माकपा नेता सारी हदों को पार कर गए। यहां तक कि सोमनाथ चटर्जी के निष्कासन और ज्योति बसु को प्रधानमंत्री नहीं बनने देने के पोलित ब्यूरो के फैसले को सूबे के पार्टी काडर की भावनाओं की अनदेखी बताने से भी नहीं झिझके।


उलटा पड़ा दांव
शक्तिमान के जरिए सियासी शक्ति पाने की कोशिश उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत को महंगी पड़ गई। जी का जंजाल बन गया है दुनिया से विदाई के बाद भी शक्तिमान। इस पर हमला करने के आरोप में जेल जाना पड़ा था भाजपा के विधायक गणेश जोशी को। रावत ने शक्तिमान घोड़े की मौत का सियासी फायदा उठाने के लिए पहले तो इस घटना को जरूरत से ज्यादा तूल दिया। फिर कैबिनेट से शक्तिमान के नाम पर रिस्पना पुल के पास शक्तिमान चौराहा बनाने का प्रस्ताव पारित करा लिया। हरिद्वार के जयराम आश्रम के परमाध्यक्ष ब्रहमस्वरुप ब्रहमचारी भी मैदान में कूद पड़े। अपनी तरफ से घोड़े की प्रतिमा बनवा देहरादून भिजवा दी। राज्य सरकार ने आनन-फानन में उसी प्रतिमा को चौराहे पर लगा भी दिया। पर कुछ ज्योतिषियों ने हरीश रावत को अपशकुन का खतरा बता डरा दिया। बेचारे मुख्यमंत्री ने जिस मूर्ति को उत्साह से लगवाया था उसी को रात के अंधेरे में चुपचाप उतरवा भी दिया। दरअसल घोड़े की यह प्रतिमा ढाई चाल की थी और घोड़े की ढाई चाल सत्ता में बैठे मुख्यमंत्री के लिए अशुभकारी मानी जाती है। कहीं सत्ता फिर से हाथ से ना निकल जाए, इसी डर से हटवाई हरीश रावत ने घोड़े की प्रतिमा। मजे की बात यह है कि प्रतिमा को हटवा कर भी पीछा नहीं छूटा हरीश रावत का। ज्योतिषियों का क्या, वे तो अच्छे भले को डरा देते हैं। किसी ने हटाने की सलाह दी थी तो कोई हटाने के दुष्परिणाम की व्याख्या करने आ धमका। घोड़े की प्रतिमा हटाने को उसने और ज्यादा अशुभ बता दिया। बेचारे रावत और डर गए। फौरन एलान कर दिया कि घोड़े की प्रतिमा तो अवश्य लगेगी। पर यह काम चुनाव बाद सत्ता में आने वाली सरकार करेगी। हरीश रावत अगर घोड़े के बहाने सियासी तीर चला रहे थे तो उनके विरोधी भाजपाई भी कसर क्यों रखते? पार्टी के सूबेदार अजय भट्ट ने रावत को घेरते हुए तीर छोड़ दिया कि प्रतिमा हटाकर रावत ने शक्तिमान का अपमान किया है। वे शक्तिमान के शुभचिंतक होते तो न उसका अपमान करते और न उसे राजनीति का औजार बनाते। यानी शक्तिमान के नाम पर राजनीतिक रोटियां सेंकना महंगा साबित हो गया रावत को। न ज्योतिषियों के चक्कर में पड़ते और न जगहंसाई कराते अपनी।


राग नीकु
नीकु यानी बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार फिर उधेड़बुन में हैं कि सूबे को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने की मांग को कैसे और कब उठाएं। नमो पर भारी पड़ने के लिए कोई न कोई मुद्दा तो जरूरी है भी। रणनीति भी नमो को लगातार घेरे रखने की अपनाई है। नमो यानी नरेंद्र मोदी एक बार कमजोर पड़ जाएं तो भाजपा अपने आप लड़खड़ा जाएगी। वैसे विशेष राज्य के दर्जे की मांग नई तो है नहीं। एक दशक पहले जब सूबे की सत्ता संभाली थी तो साल भर बाद ही लगे थे विशेष राज्य का राग अलापने। तब केंद्र में थी यूपीए की सरकार। दो साल पहले दिल्ली में मोदी की सरकार आई तो विरोधी खेमे में थे नीकु। लिहाजा और जोर से उठाया विशेष दर्जे का मुद्दा। अब तक तो कोई नतीजा निकलना नहीं। यूपीए ने भी अनसुना किया था और रवैया राजग का भी कोई ज्यादा उत्साहजनक नहीं दिख रहा। हां, उसने तो नीतीश के मुद्दे को ही यह कह कर नकार दिया कि इस मांग का कोई औचित्य ही नहीं। पर नीकु तो अपनी राह चलेंगे। केंद्र कुछ भी कहे वे चुप रहने वाले नहीं हैं। अपनी मांग उठाते रहेंगे। मांग न भी मने पर विरोध के लिए तो मुद्दा रहेगा ही। यों भी वे हठी माने जाते हैं। एक बार जिस मुद्दे को पकड़ लिया, उसे अंजाम तक पहुंचा कर ही दम लेते हैं। फिर यह तो मुद्दा भी ऐसा है कि जब चाहे तब टकराव पैदा कर सकता है।


दलित नेता की व्यथा
रामविलास पासवान बेचैन हैं। केंद्र सरकार का मंत्री पद रास नहीं आ रहा। अपनी सियासी हैसियत और पार्टी की मजबूती को लेकर चिंता बढ़ी है। ऐसा मंत्रालय हिस्से आ गया कि लाख जतन करके भी लोकप्रियता नहीं बढ़ने वाली। खाद्य पदार्थों की कीमतें कम होने से रहीं। कम होना तो दूर वे तो बढ़ती महंगाई पर भी अंकुश नहीं लगा पा रहे। दालों का विदेश से आयात भी कारगर नहीं रहा। लोग तो मोदी सरकार से नाराज ही हैं। पर पासवान की तो मजबूरी है नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार की प्रशंसा करना अपनी सरकार की विफलता की बात सुनते ही बिफर उठते हैं। तोहमत राज्य सरकारों पर मढ़ देते हैं। मकसद नीतीश सरकार को निकम्मा ठहराना होता है। अपनी पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं को भी यही गुरूमंत्र दे रहे हैं। लोगों के बीच रहने और कार्यकर्ताओं की सुनने की अपने नेताओं को लगातार सलाह मजबूरी है। हां, बेटे पर पूरा भरोसा है। बेटा अब उनके बोझ को अपने कंधों पर उठाने लगा है। सूबे का लगातार दौरा व पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं की बैठकें कर चिराग पासवान ने लोक जनशक्ति पार्टी की धमक अभी तक तो बरकरार रखी है।


आशंका-अविश्वास
जम्मू-कश्मीर की समस्या अबूझ पहेली बन गई है भाजपा के लिए। हिजबुल आतंकी बुरहान वानी की सुरक्षा बलों के हाथों मौत के बाद मचे बवाल की न महबूबा मुफ्ती को उम्मीद रही होगी और न केंद्र सरकार को। 2010 के बाद छह साल तक तो कमोबेश शांत ही था यह सीमाई सूबा। लेकिन इस समय तो घाटी उबाल पर है। एक तो महबूबा के साथ हाथ मिलाना ही भाजपा के लिए 440 वोल्ट के करंट जैसा है। ऊपर से ताजा घटनाक्रम ने गठबंधन पर तलवार लटका दी है। अंजाम सियासी अस्थिरता हुआ तो अच्छा नहीं होगा। अब तक पचास से ज्यादा लोगों की जान जा चुकी है हिंसा में। घाटी और दिल्ली के बीच अविश्वास अलग बढ़ा है। आतंकवादी अगर घाटी में फिर सिर उठा रहे हैं तो यह भाजपा के लिए देशभर में मुश्किल बढ़ाने वाला पहलू है। उधर पीडीपी भी इस आशंका की चपेट में दिख रही है कि कहीं भविष्य में सूबे में राष्ट्रपति शासन न लग जाए। बदले हालात ने नेशनल कांफ्रेंस को बैठे बिठाए सत्तारूढ़ गठबंधन पर वार करने का अवसर दे दिया है। महबूबा को नादान और नौसीखिया साबित करने पर उतारू हैं उमर अब्दुल्ला। वैसे फिलहाल हालात लग भी नहीं रहे महबूबा के नियंत्रण में।


भानुमति का पिटारा
पंजाब को लेकर भाजपा के भीतर एक राय नहीं लग रही। पार्टी के कई नेता विधानसभा चुनाव में अकाली दल से मिल कर उतरने को जोखिम मान रहे हैं। इसमें दो राय है भी नहीं कि जनता के निशाने पर सबसे ऊपर अकाली दल ही रहेगा। भाजपा उसके साथ रहेगी तो नुकसान उसे भी भुगतना पड़ेगा। चुनाव में अब सात महीने का वक्त ही बचा है। चुनाव पूर्व संकेत सत्तारूढ़ गठबंधन के लिए बेचैन करने वाले हैं। मुकाबला कांग्रेस से ही होता तो समझ आता पर अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने जुझारू तेवरों से लड़ाई को रोचक बना दिया है। भाजपा की फूट का अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि नवजोत सिद्धू की पत्नी नवजोत कौर ने बयान दे दिया कि सूबे में मादक पदार्थों की सप्लाई लालबत्ती वाली कारों और निजी बसों के जरिए होती है। खुद सूबे की सरकार में मंत्री जैसे पद पर हैं नवजोत कौर। जाहिर है कि नाम लिए बिना उन्होंने निशाना बादल परिवार को बना दिया। नवजोत कौर और उनके पति कब से पार्टी पर दबाव बना रहे हैं अकाली दल से गठबंधन तोड़ने का। रही कांग्रेस की बात तो अंदरूनी कलह के बावजूद अब वह पहले जैसी कमजोर नहीं दिख रही। हां, केजरीवाल की पार्टी ने अकाली दल और कांग्रेस दोनों की ही सिट्टी-पिट्टी गुम कर रखी है। लोकसभा चुनाव में चार सीटें हासिल कर अपनी उपस्थिति तो पहले ही दर्ज करा दी थी इस पार्टी ने।


पीर पराए की
बीरेंद्र सिंह मायूस हैं। करीबियों पर भरोसा करें तो मायूसी विभाग बदलने का अंजाम है। लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस छोड़ कर मोदी की शरण में आए थे हरियाणा के कद्दावर जाट नेता। विधानसभा चुनाव में खूब उपयोग किया उनका पार्टी ने। लेकिन पत्नी को मंत्री पद नहीं दिया। अलबत्ता केंद्र के पिछले फेर बदल में ग्रामीण विकास मंत्रालय छीन कर इस्पात मंत्री बना दिया उन्हें। ऊपर से इस्पात से जुड़ा खनन मंत्रालय नहीं दिया। बेचारे आए थे हरियाणा का मुख्यमंत्री बनने का सपना संजो कर। पर मोदी ने अरमानों पर पानी फेर दिया और मुख्यमंत्री बना दिया नौसीखिए संघी प्रचारक मनोहर लाल को। अब बीरेंद्र सिंह के नजदीकी शिकायत कर रहे हैं कि कद के हिसाब से पद नहीं दिया मोदी ने उनके नेता को। भूल रहे हैं कि बीरेंद्र सिंह खांटी भाजपाई तो थे नहीं। वे तो कांग्रेस छोड़ कर आए थे भाजपा में। यानी भाजपा के लिए तो पराए ही थे। अब पराए तो पराए ही होते हैं।


बैकफुट पर कांग्रेस
हिमाचल सरकार पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। प्रवर्तन निदेशालय और सीबीआइ मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह को जितना उलझा रहे हैं वीरभद्र उतना ही कानूनी रूप से मुखर हो रहे हैं। इसी चक्कर में उनके ज्यादातर मंत्रियों और अफसरों का अधिकांश समय दिल्ली में गुजर रहा है। सूबे के विकास की गति रुके तो रुके। इस चक्कर में मध्यावधि चुनाव की अटकलें भी खूब लग रही हैं। वीरभद्र के अनेक समर्थक उन पर आई बला टालने के लिए जगह-जगह यज्ञ भी कर रहे हैं। वीरभद्र के साथ-साथ उनके बेटे से भी घंटों पूछताछ की है सीबीआइ ने। बारी उनकी पत्नी की भी आ जाए तो हैरानी नहीं होगी। उनके एलआईसी एजंट को तो गिरफ्तार कर लिया है प्रवर्तन निदेशालय ने। ऊपर से उनके आढ़ती को सरकारी गवाह बनाने की कोशिशें जारी है। फिर भी वीरभद्र यही फरमा रहे हैं कि वे डरने वाले नहीं। वे स्ट्रांग मैन हैं। केंद्र को यह कह कर कोस रहे हैं कि आयकर के एक मामले की जांच केंद्र की तीन एजंसियों द्वारा किया जाना ही केंद्र की उनके खिलाफ साजिश का सबूत है। हर जांच के बाद अपने दामन के पाक-साफ साबित होने की दुहाई अलग दी है। भाजपाई उनसे पूछ रहे हैं कि इतने ही निडर हैं तो आनन-फानन में कैबिनेट की आपात बैठक क्यों बुलाई? मंत्रियों से यह हलफ क्यों उठवाया कि वे वीरभद्र के साथ हैं। जो भी हो अभी तो वीरभद्र को लेकर बैकफुट पर लग रही है कांग्रेस।


जुलाहों की लट्ठम-लट्ठ
हिमाचल में भाजपा के भीतर भी हलचल बढ़ी है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जगत प्रकाश नड्डा के विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट होने की अटकलों ने धूमल परिवार की नींद उड़ा दी है। धूमल और उनके दोनों बेटों ने अब कांग्रेस पर हमला बोल दिया है। यानी यह साबित करने की पुरजोर कोशिश शुरू कर दी है कि धूमल के कुनबे के बिना कुछ किस्सा नहीं भाजपा का हिमचाल में। धूमल तो अब सोशल मीडिया पर भी सक्रिय हो गए हैं। मुख्यमंत्री और उनकी पुलिस को ललकार रहे हैं। वीरभद्र के घपलों का खुलासा धूमल के छोटे बेटे अरुण धूमल ने ही किया था। हालांकि बड़े अनुराग ठाकुर न केवल पार्टी के सांसद हैं बल्कि युवा मोर्चे के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं। नड्डा की राह रोकना ही लगता है फिलहाल तो कुनबे का असली मकसद। पार्टी ने उम्र का बहाना बना धूमल को किनारे करना चाहा तो सांसद पुत्र सामने आएगा। हालांकि विरोधी खेमा उनके बीसीसीआई अध्यक्ष बनने को उनकी राह का रोड़ा मान रहा है।

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